<p style="text-align: justify;">महिलाओं का सशक्तिकरण एक बहुआयामी अवधारणा है। यह एक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से महिलाओं की संसाधनों तक अधिक पहुंच संभव हो पाती है। सशक्तिकरण, शक्तिहीनता की स्थिति से अधिक आत्मनिर्भरता की ओर इशारा करता है। जलीय कृषि क्षेत्र में महिलाओं के योगदान पर वैश्विक विचार-विमर्श जारी है। समग्र कार्प मछलीपालन, बीज पालन और एकीकृत मछलीपालन सहित जलीय कृषि उत्पादन गतिविधियों में ग्रामीण महिलाओं को शामिल करने के लिए उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान और स्वरोजगार पर चर्चा की गई है। सांस्कृतिक और सामाजिक बाधाएं, प्रशिक्षण एवं सशक्तिकरण में महिलाओं की भागीदारी को सीमित करती हैं। उन्नत तकनीकों के साथ जलकृषि विस्तार में उपयुक्त तरीके, ग्रामीण महिलाओं को जलकृषि अपनाने की ओर आकर्षित कर सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="268" height="164" /></p> <p style="text-align: justify;">केन्द्रीय मीठाजलजीवपालन अनुसंधान संस्थान, भुबनेश्वर ने पिछले 30 वर्षों (1987-2016) में कई प्रौद्योगिकी परियोजनाएं संचालित की हैं। महिला सशक्तिकरण के लिए संस्थान द्वारा संचालित प्रौद्योगिकी परियोजनाओं का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया हैः </p> <h3 style="text-align: justify;">वर्ष 1987 </h3> <p style="text-align: justify;">मछलीपालन में 50 महिलाओं के लिए पांच विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकियों का संचालन किया गया। वर्षभर निश्चित आय के लिए जलकृषि का विकास हुआ।</p> <h3 style="text-align: justify;">वर्ष 1992 </h3> <p style="text-align: justify;">ओडिशा के क्योंझर जिले के चार गांवों में 300 आदिवासी महिलाओं द्वारा मछली स्पॉन को सात छोटे तालाबों में (0.05-2.0 हैक्टर) पालन किया गया। जलकृषि में इन महिलाओं को शामिल करना सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारने में फायदेमंद साबित हुआ। </p> <h3 style="text-align: justify;">वर्ष 1999 </h3> <p style="text-align: justify;">कृषि अनुसंधान पर प्रौद्योगिकी मूल्यांकन के लिए संस्थान के आसपास के 11 गांवों में संस्थान विलेज लिंकेज प्रोग्राम (आईवीएलपी) संचालित किया गया। महिलाओं को मछली प्रजनन और मछलीपालन सिखाया गया। इस कार्यक्रम के माध्यम से, महिलाओं ने प्रदर्शित किया कि अगर एक सहायक वातावरण प्रदान किया जाता है, तो उनके द्वारा आसानी से बीज उत्पादन गतिविधि की जा सकती है।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 98.6043%;"> <p style="text-align: justify;"><strong>उत्तर-पूर्वी राज्यों में <a href="../../../../../social-welfare/92a90291a93e92f924940-93093e91c-93594d92f93593894d92593e/91794d93093e92e-92a90291a93e92f92494b902-92e947902-92a93694192a93e932928-2013-90f915-92e93e93094d91792693094d93693f91593e/92e92494d93894d92f-92a93e932928">मत्स्य पालन</a> </strong></p> <p style="text-align: justify;">उत्तर पूर्व पहाड़ी राज्यों में जलकृषि के विकास के लिए असोम, <a href="../../../../../e-governance/93093e91c94d92f/90593094192393e91a932-92a94d930926947936">अरुणाचल प्रदेश</a>, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा में कार्य किए गए। कार्प मछलीपालन, समन्वित मछलीपालन, सजावटी मछली प्रजनन और तकनीकी का प्रदर्शन किया गया। कार्प और मांगुर के लिए हैचरी स्थापित की गई। पिंजरे में मछलीपालन का प्रदर्शन किया गया। इसके माध्यम से बड़ी संख्या में महिलाएं लाभान्वित हुईं।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">वर्ष 2000 </h3> <p style="text-align: justify;">जय विज्ञान मिशन के तहत, पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में मीठे जल में <a href="../../../../../agriculture/fisheries/92e93992494d93592a94293094d923-91c93e92891593e930940/92e92494d93894d92f-92a93e932928-91c93e92891593e930940-935-92e93e93993593e930-91593e93094d92f/fish-production">मछली उत्पादन</a> मूल लक्ष्य था। बस्तर आदिवासी महिलाओं के एक समूह ने 1.4 हैक्टर क्षेत्रफल से लगभग 2.0 टन मछली का उत्पादन किया, जहां पहले कुछ भी पैदा नहीं होता था। </p> <h3 style="text-align: justify;">वर्ष 2006 </h3> <p style="text-align: justify;">ओडिशा के दो आदिवासी बहुल जिलों क्योंझर और केंद्रपाड़ा में कृषि तकनीकों के माध्यम से अनुसूचित जाति-जनजाति आबादी का आर्थिक और आजीविका विकास किया गया। तकनीकों यानी कार्प बीज उत्पादन, समन्वित मछलीपालन और कार्प मछलीपालन को बढ़ावा दिया गया। क्योंझर में तालाबों में मछली की उपज में चार गुना वृद्धि हुई। </p> <p style="text-align: justify;">वर्ष 2008 ओडिशा के दो पिछड़े जिलों मयूरभंज और नयागढ़ में अनुसूचित जाति-जनजाति की आजीविका के विकास के लिए मोबाइवल हैचरी में कार्प बीज उत्पादन लागू किया गया। कार्प बीज उत्पादन के लिए दस एफआरपी कार्प हैचरी स्थापित और संचालित की गईं। </p> <h3 style="text-align: justify;">वर्ष 2009 </h3> <p style="text-align: justify;">बौध और पुरुलिया जिले में अनुसूचित जाति-जनजाति महिलाओं के बीच प्रदर्शन के माध्यम से समग्र कार्प पालन की तकनीक की जानकारी दी गई। यह परियोजना पुरुलिया (<a href="../../../../../e-governance/93093e91c94d92f/92a93694d91a93f92e-92c90291793e932">पश्चिम बंगाल</a>) के काशीपुर ब्लॉक और बौध (ओडिशा) के कांटामल ब्लॉक में चलाई गई थी। इससे दो जिलों की 200 आदिवासी महिलाएं लाभान्वित हुईं। तालाबों में मछली की पैदावार, पूर्व-उत्पादन स्तर 378.79 कि.ग्रा./ हैक्टर से बढ़कर 2010-11 में 6-8 महीनों में 795.98 कि.ग्रा./हैक्टर और आय 42,513.47 रुपये प्रति हैक्टर हो गई। </p> <h3 style="text-align: justify;">वर्ष 2011 </h3> <p style="text-align: justify;">ओडिशा में क्योंझर जिले के जोन्झारा गांव में बाराखण्डापत एसएचजी में 10 महिला सदस्यों को सजावटी मछलीपालन सिखाया गया था। गरीबों महिलाओं की स्थायी आजीविका में सुधार के लिए एनएआईपी और संस्थान द्वारा एक संयुक्त प्रयास किया गया था। सजावटी मछलीपालन के लिए कौशल प्रशिक्षण, शैक्षणिक भम्रण औ प्रोत्साहित करने के लिए प्रदर्शन आयोजित किए गए। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 98.6043%;"><strong>जल कृषि, मुर्गीपालन और बागवानी </strong> <p style="text-align: justify;">वर्ष 2009 में ओडिशा के मयूरभंज, क्योंझर और संबलपुर जिलों में आजीविका में सुधार के लिए, समेकित मीठे पानी की जलीय कृषि, बागवानी और पशुधन विकास एक कंसोर्शिया मोड में किया गया। जल कृषि, मुर्गीपालन और बागवानी को शामिल करते हुए एक एकीकृत विकास दृष्टिकोण अपनाया गया। मछलीपालन, सजावटी मछली प्रजनन और पालन, मुर्गीपालन और रसोई बागवानी में महिला लाभार्थी सक्रिय रूप से शामिल थीं। आजीविका विकास के लिए <a href="../../../../../agriculture/best-practices/92893594092892492e-91594393793f-92a939932/agri-based-enterprises">कृषि आधारित व्यवसाय</a> को अपनाने के लिए कई महिला गोष्ठियों का आयोजन किया गया। इससे 3000 परिवार लाभान्वित हुए।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">वर्ष 2012 </h3> <p style="text-align: justify;">एक परियोजना के तहत खोरधा की 160 महिलाओं को मत्स्य बीज उत्पादन और समग्र कार्प मछलीपालन की प्रौद्योगिकियों का प्रशिक्षण दिया गया। ओडिशा के खोरधा जिले की एक ग्रामीण महिला श्रीमती रानुलता भोई मछली हायड्रोलायसेट उत्पादन में सफल रहीं। वर्तमान में वे 200 लीटर जैव उर्वरक उत्पादन करके वर्ष में 16,000 रुपये आय अर्जित कर रही हैं। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="202" height="177" /></p> <h3 style="text-align: justify;">वर्ष 2016 </h3> <p style="text-align: justify;">फार्मर फर्स्ट परियोजना ओडिशा के खोरधा जिले के 4 गांव में संचालित की जा रही है, जिसमें, 400 से अधिक लाभार्थी शामिल हैं। गांव में वैज्ञानिक तरीके से कार्प बीज उत्पादन, मछलीपालन, और छोटी कार्प के पालन को बढ़ावा दिया गया है। जलकृषि वृद्धि के लिए वैज्ञानिक तरीके से मत्स्य पालन प्रशिक्षण दिया गया। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 98.6043%;"> <h3 style="text-align: justify;">सजावटी मछलीपालन</h3> <p style="text-align: justify;">वर्ष 2011 में दो सजावटी मछली गांव विकसित करने में संस्थान ने महत्वपूर्ण भूमिका निर्भाइ । लंढिहारी (ओडिशा के देवगढ़ जिला) में 60 सीमेंट टैंक का उपयोग करके महिलाओं ने सजावटी मछलीपालन (ब्लैक मौली, रेड मौली, एंजल फिश, गोल्ड फिश आदि) किया था। स्थानीय मत्स्य अधिकारी ने महिलाओं के बीच आय के इस नए तरीके की शुरूआत की। कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) ने भी वित्तीय सहायता प्रदान करके रियरिंग टैंक का निर्माण किया। क्षमता निर्माण और संस्थान द्वारा अवसर प्रदान किया गया। सभी परिवारों द्वारा सजावटी मछलीपालन करने हेतु यह गांव ‘सजावटी मछली गांव’ के रूप में जाना गया।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">पिछले 33 वर्षों के दौरान भाकृअनुप- केन्द्रीय मीठा जलजीवपालन अनुसंधान (सीफा) द्वारा महिलाओं के सामाजिक-आथिर्क विकास पर काफी ध्यान दिया गया है। जलीय कृषि प्रौद्योगिकियों की एक विस्तृत श्रृंखला, जैसे-कार्प प्रजनन, बीज पालन, समग्र पालन, सजावटी मछली प्रजनन और पालन, एकीकृत मछलीपालन आदि को महिलाओं द्वारा अपनाने के लिए प्रोत्साहन दिया गया है। हाल के वर्षों में भी सीफा के प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है। इन पहलों ने उन्हें सरकार के करीब लाने में भी मदद की है। मछलीपालन से होने वाली अतिरिक्त आय के परिणामस्वरूप महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ है। यदि महिलाएं मछलीपालन को एक छोटे उद्यम के रूप में अपनाती हैं तो इससे घरेलू पोषण, खाद्य सुरक्षा, बेहतर आय और रोजगार के बेहतर अवसर पैदा होंगे।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccdownlod.jpg" width="210" height="184" /></p> <p style="text-align: justify;"> <strong>स्त्रोत </strong>: खेती पत्रिका, एच.के. डे, जी.एस. साहा', ए.एस. महापात्र, यू.एल. महांती' और एस.के. स्वाई, भाकृअनुप-केन्द्रीय मीठाजलजीवपालन अनुसंधान संस्थान, कौशल्यागंगा, भुबनेश्वर-751002, (ओडिशा)</p>