परिचय प्राय: मत्स्य पालकों एवं मत्स्य बीज उत्पादकों द्वारा मछली पालन एवं मत्स्य बीज उत्पादन में आनेवाली कठिनाइयों के संबंध में समाधान हेतु प्रश्न पूछे जाते हैं | इन प्रश्नों के क्रम में दिए गये प्रश्नोत्तर को मत्स्य पालकों की सुविधा हेतु संकलित किया गया है, जो निम्न प्रकार है | आर्थिक दृष्टिकोण से झारखण्ड के तालाबों में पालने के लिये सबसे बढ़िया मछली कौन सी है ? झारखण्ड के पोखरों के लिए अपने देश की प्रमुख कार्प मछलियाँ कतला, रोहू, मृगल तथा विदेशी कार्प मछलियाँ सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प और कॉमन कार्प मछलियाँ पाली जानी चाहिए | इन मछलियों की भोजन संबंधी आदतें अलग-अलग हैं और साथ ही ये मछलियाँ तालाब के विभिन्न स्तरों में रहने की आदि होती है | अत: भोजन को लेकर इनके बीच आपस में कोई रगड़ा-झगड़ा नहीं होता है | यही कारण है कि इन मछलियों को एक साथ पाला जाता है ताकि तालाब के प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध खाद्य सामग्रियों का उपयोग हो तथा मछलियों की अधिक से अधिक पैदावार प्राप्त की जा सके | मछली पालन की इस प्रणाली को कार्प मछलियों की मिश्रित खेती कहते हैं | एक एकड़ के तालाब में कितना चूना पड़ेगा और साल भर में कितनी बार चूना पड़ेगा, बतलाइये ? चूना तालाब में क्या काम करता है, इसकी भी जानकारी दें | तालाब में चूना का प्रयोग कई प्रकार से लाभकारी साबित होता है जैसे – इसका प्रयोग तालाब के जल के अतिआवश्यक पोषक तत्व कैल्सियम उपलब्ध कराता है | यह जल की अम्लीयता को सुधारने में सहायक होता है | यह तालाब की मिटटी को उर्वरक अवशोषण हेतु अधिक सक्षम बनाता है | यह तालाब के नितलीय जैविक पदार्थों के विघटन में तेजी लाता है | यह तालाब में विभिन्न प्रकार के परजीवियों के प्रभाव से संचित मछलियों को मुक्त करता है | यह तालाब के जल में घुले हुए आक्सीजन के स्तर को ऊंचा उठता है | चूने के प्रयोग से तालाब के जल की स्वच्छता भी कायम रहती है | चूने का प्रयोग करने से पहले तालाब की मिटटी की पी.एच. का जांच कर लेना चाहिए और पी.एच. मान के आधार पर नीचे दिये गये तालिका के अनुसार चुने का प्रयोग करना चाहिए | मिटटी का पी.एच. मिटटी के प्रकार चूने का प्रयोग दर (कि.ग्रा./हे.) 4.0 से 5.0 अति अम्लीय 800 5.1 से 6.0 माध्यम अम्लीय 480 6.1 से 6.5 हल्का अम्लीय 400 6.6 से 7.5 उदासीन (न अम्लीय न क्षारीय) 200 7.6 से 8.5 हल्का क्षारीय 80 अपने तालाब की मिटटी के पी.एच. की जांच करा कर आप स्वयं निश्चित कर लें कि आपको अपने तालाब के लिए किस मात्रा में चूने का प्रयोग करना होगा | बाजार में चूना निम्नलिखित तीन रूपों में उपलब्ध होता है : रोड़ेदार चूना (कैल्शियम कार्बोनेट) भाखरा चूना (कैल्शियम हाईड्रोक्साइड) तथा कली चूना (कैल्शियम आक्साइड) | तालाब के जल में उपरोक्त तीनों प्रकार के चूने का प्रयोग किया जा सकता है लेकिन रोड़ेदार चूना की तुलना में भखरा या कली चूने का प्रयोग अधिक तीव्र और प्रभावकारी होता है | तालाब में चूने का प्रयोग खाद डालने के पूर्व करना चाहिए | तालाब में मछली पालन तो करते हैं | परन्तु तालाब का भिंड (मेड़, बाँध) का क्या उपयोग हो सकता है ? तालाब में भिंड (मेड़, बाँध) पर मौसम के अनुसार सब्जी उगाएं | दलहनी, तिलहन फसल उगाएं | केला पपीता आदि फलदार वृक्ष लगाएँ | साधारणत: 200 वर्गमीटर का प्लाट 5-6 सदस्यों के एक परिवार की सब्जी तरकारी संबंधी आवश्यताएँ पूरी करने के लिए यथेष्ट होता है | तालाब के भिन्डों पर तरकारी उगाने के लिए इससे कहीं अधिक स्थान उपलब्ध होता है, इसलिए भिन्ड़ो पर तरकारी उगाने से न केवल घर की जरुरत पूरी हो सकती है बल्कि अतिरिक्त सब्जियों की बिक्री से अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है | तालाबों के भिन्ड़ो पर दलहनी एवं तिलहन फसलों की अच्छी खेती होती है | भिन्ड़ो की नई मट्टी पर अरहर की फसल लहलहा उठती है | इसी प्रकार तरह-तरह के फूलों जैसे – गेंदा, गुलाब रजनीगंधा आदि खेती के लिए भी तालाब का भिंड काफी उपयुक्त होता है | केला पपीता, नींबू, अमरुद इत्यादि फलदार पौधे जल्दी तैयार होकर फल देते हैं | पौधों से तालाब की खूबसूरती भी बढ़ जाती है | पपीता की खेती अक्टूबर में हर 15-20 दिनों पर और मार्च में हर 8-10 दिनों पर सिंचाई की जाती है | केला एवं पपीता आदि के पत्तों का प्रयोग ग्रास कार्प के भोजन के रूप में किया जा सकता है | तालाब के भिन्डों पर तरकारी तथा फल-फूल की काश्तकारी करते समय पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी भिन्डों को सब्जियों के लिये तथा उत्तरी तटबंधों को फलों की खेती के लिये इस्तेमाल करना चाहिये | साधारणत: यही देखने में आया है कि मछली पालन और बागवानी के समन्वयन से कृषकों को प्राय: 25 से 35 प्रतिशत तक अतिरिक्त मुनाफा प्राप्त हो जाता है | मुर्गी/ बत्तख / गाय / सूकर पालन के लिए भी भिंड का उपयोग किया जा सकता है | मछलियाँ क्या खाती है ? प्लवक क्या है ? तालाब में मछली के सांस लेने हेतु आक्सीजन कहाँ से आता है ? इसे कैसे बढाया जा सकता है ? तालाब में मछलियों का मुख्य भोजन जल में उपलब्ध प्लवक हैं | सूक्षम जलीय वनस्पति एवं जन्तु को प्लवक कहते हैं |(सिल्वर कार्प वनस्पति प्लवक, भोजी, कतला जन्तु प्लवक भोजी मछली है) | जन्तु प्लवक का भोजन भी वनस्पति प्लवक है | वनस्पति प्लवक ही सूर्य की रोशनी में कार्बन-डाई-आक्साइड गैस एवं पानी के संयोजन से भोजन (कार्बोहाइड्रेट) का निर्माण करती है एवं एस प्रक्रिया में आक्सीजन गैस भी बनता है, जो पानी में घुलकर सभी जलीय वनस्पति एवं जीव की श्वसन के लिये उपलब्ध होता है | सूर्य की रौशनी सभी जलीय वनस्पति प्लवक द्वारा भोजन बनाने की क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं | Co2 + H2o---------- CH2O + O2 इस प्रकार वनस्पति प्लवक अपने लिये भोजन बनती है | मछलियाँ एवं जन्तु प्लवक एवं जलीय जंतु भोजन के लिए वनस्पति प्लवक पर ही प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भर है | इसलिये इसे प्राथमिक उत्पादक भी कहते हैं | अत: वनस्पति प्लवक के अच्छे उत्पादन से उन पर आश्रित जन्तु प्लवकों एवं मछलियों का उत्पादन बढ़ता है | वनस्पति प्लवक ----- जन्तु प्लवक ----------मछली तालाब में सैवाल आदि जलीय घासों के नियंत्रण के लिये क्या करें ? शैवाल आदि जलीय घासों के नियंत्रण के ग्रास कार्प डालें | एक एकड़ के तालाब में 4 इंच से 6 इंच के ग्रास कार्प 200 से 300 की संख्या में डाली जा सकती है | जो तालाब के जलीय घासों को समाप्त करने के लिये पर्याप्त है | ग्रास कार्प अपने शरीर के वजन से आधे वजन के बराबर घास प्रतिदिन खा सकती है | ग्रास कार्प पर्याप्त भोजन मिलने पर एक साल में 3 से 4 किलो तक का हो सकता है | तालाब का कुल मछली बेहोश होकर कात में आ जाए (किनारे लग जाए) या ऊपर-ऊपर चलने लगे तो उस हालत में क्या करना चाहिये ? इस प्रकार की स्थिति वस्तुत: तब उतपन्न होती है जब तालाब के जल में आक्सीजन की कमी हो जाती है | आमतौर पर पुराने तालाबों में होती है जिनकी तली पर जैविक गाद (आर्गेनिक डेट्राइट्स) का अत्यधिक जमाव हो जाता है | ऐसे तालाबों में मलबों के सड़ने की प्रक्रिया में आक्सीजन की काफी खपत हो जाती है और अंतत: संचित मछलियों के लिए आक्सीजन कम पड़ने लगता है | यह समस्या उन परिस्थितियों में भी उत्पन्न होती है जब उर्वरक के प्रयोग से तालाब में सूक्षम जीवाणुओं का भरमार हो जाता है | विशेष रूप से रातों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया धीमी हो जाती है जिससे तालाब में उपलब्ध आक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है फलस्वरूप सुबह होते-होते जीवाणुओं एवं मछलियों के लिए आक्सीजन की मात्रा कम पड़ने लगती है और मछलियाँ उपला कर मरने लगती है | तालाबों में आक्सीजन की कमी लगातार कई दिनों तक आकाश में बादल छाए होने पर भी हो जाती है क्योंकि इन दिनों प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पूर्णरूप से हो नहीं पाती है | तालाब में जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो तो निम्नलिखित उपाय करना चाहिए :- कुछ इस प्रकार की युक्ति लगाएं जिससे तालाब के जाल में हिलोरे उत्पन्न किया जा सके, जैसे – तालाब के पानी को हाथ से छलकाएं या सतह पर डंडे मार कर तरेंगे उत्पन्न करें, तालाब में जल्दी-जल्दी तथा बार-बार जाल चलायें आदि | तालाब में ताजा जल मिलाएं | अगर आस-पास ताजे पानी की सुविधा उपलब्ध न हो तो टुल्लू पम्प से तालाब के ही जल को फव्वारे की तरह परिसंचित करें | अनुकूल परिस्थिति आने तक तालाब में परिपूरक आहार तथा उर्वरक का प्रयोग बंद रखें | जल में पोटेशियम परमैगनेट (1 से 2 पी.पी.एम. के दर पर) या चूने (200 किग्रा प्रति हेक्टेयर के दर पर) का प्रयोग भी लाभदायक होता है | केला के तनों के छोटे-छोटे टुकड़े कर के तालाब में बिखेरने से भी फायदा होता देखा गया है | कम पानी होने पर तालाब में मछलियाँ क्यों मरने लगती है ? ऐसी अवस्था में क्या उपाय करना चाहिए ? तालाब में मछलियों को संचित करने का जो फार्मूला है वह संचित मछलियों के पानी की जरूरतों को ध्यान में रखकर ही निर्धारित किया जाता है | अगर तालाब में पानी कम हो जाएगा तो जाहिर है कि संचित मछलियों के लिए घुटन भरी स्थिति पैदा हो जाएगी और मछलियाँ मर जाएगी | अगर तालाब में पानी कम हो जाएगा तो जाहिर है कि संचित मछलियों के लिए घुटन भरी स्थिति पैदा हो जाएगी और मछलियाँ मर जाएगी | तालाब में पानी कम होने के कई कारण हो सकते हैं | “सीपेज” अर्थात जमीन में पानी के रिसने से, तालाब के नितल अपर संचित मछलियों के उत्सर्जित मल, जैविक मलवों एवं सिल्ट के जमाव से | आपके तालाब में किस कारण से पानी कम हो रहा है यह देखना जरुरी है | अगर सीपेज की समस्या हो तो गोबर आदि के निरन्तर प्रयोग से समस्या आहिस्ता-आहिस्ता काबू में आएगी | जब तक यह समस्या हल नहीं होती है तब तक ज्यादा पानी भर कर आपको संचित मछलियों की जरुरत पूरी करनी होगी | वाष्पीकरण द्वारा पानी की कमी पूरा करने के लिये भी नया पानी भरना आवश्यक होगा | तलहटी पर उत्सर्जित मल, जैविक मलबों आदि के जमाव को कम करने के लिये केवल नया पानी भरने से काम नहीं चलेगा बल्कि बेहतर होगा कि थोडा-थोडा करके पुराने पानी को आप बाहर निकाल फेंकें और उसकी जगह नया पानी तालाब में डालें | एस प्रक्रिया को जलीय नवीनीकरण अर्थात वाटर रिप्लेनिश्मेंट कहते हैं | यह तय करने के लिये कि महीने में कितनी बार पानी का नवीनीकरण जरूरी होगा यह प्रतिदिन प्रयोग किये जा रहे पूरक आहार की मात्रा पर निर्भर करेगा | जिस गड्ढे में केवल तीन से पांच माह तक ही पानी रहता है, ऐसे गड्ढों में कौन सी प्रजाति की मछली पाली जा सकती है तथा उसमें कितना मत्स्य बीज डाला जाना चाहिये ? ऐसे तालाबों का उपयोग मुख्य रूप से कार्प मछलियों के बीज उत्पादन के लिये लाभदायक साबित होता है | गांवों में इस प्रकार के मौसमी गड्ढे प्रचुरता से उपलब्ध होते हैं | मत्स्य बीज फार्मों से कार्प मछलियों के स्पान या फ्राई प्राप्त कर इन मौसमी गड्ढों में दो –तीन महीने तक पाल कर उन्हें “फिंगरलिंग” अवस्था तक बड़ा कर बीज का अच्छा-ख़ासा व्यापार किया जा सकता है | झटपट मुनाफा के लिये एक अच्छा धंधा है | जहां यह संभव नहीं है वहां कतला , सिल्वर तथा कॉमन कार्प मछली का बीज डालें तो ये चार-पांच महीनों में 200-250 ग्राम की हो जाती है | प्रदर्शनी में महाझींगा के पालन के बारे में बताया गया है | इसके बीज की कमी को देखते हुए इसके पालन की एस क्षेत्र में क्या संभावना है | अगर है तो किस तरह से इसका पालन किया जाए तथा इसे किस प्रकार का भोजन दिया जाना चाहिये? महाझींगा के प्रजनन के लिए समुदीय खारा जल आवश्यक है | फलस्वरूप इसके तटवर्ती राज्यों से प्राप्त होता है | अत: आप झींगा के बीज की उपलब्धता की जानकारी मत्स्य विभाग के स्थानीय कार्यालयों से संपर्क कर प्राप्त कर सकते हैं | दूर दराज क्षेत्रों से मांगने में आपको बीज के मद में कुछ अधिक खर्च करना पड़ सकता है लेकिन इसकी भरपाई झींगों की फसल प्राप्त करने के बाद आसानी से हो जाती है क्योंकि मछलियों की तुलना में झींगा 5-6 गुना ऊँचे दामों में बिकते हैं | चूँकि इस क्षेत्र में महाझींगा का बीज आसानी से सुलभ नहीं हो सकेगा अत: तत्काल हम आपको इसके “मोनो कल्चर” अर्थात एकल पालन की राय नहीं देते | बीज उपलब्धि की असुविधा को ध्यान में रखते हुए बहरहाल आप इसे कार्प मछलियों के साथ ही पालने का कार्यक्रम बनाएं | कार्प मछलियों के मिश्रित पालन में तलवासी मछलियों (मृगल और कॉमन कार्प) के स्थान पर अगर महाझींगा पाले जाए तो यह आर्थिक दृष्टिकोण से अधिक लाभदायक साबित होता है | कार्प और झींगा पालन में सामान्य अवस्थाओं में मछलियाँ (कतला और रोहू, फिंगरलिंग 10 ग्राम वजन की शिशु मछलियाँ) 20,000 प्रति हेक्टेयर की दर पर संचित किये जाते हैं | कार्प मछलियों के साथ जब झींगा पाला जा रहा हो तब तालाब में उन्हें “मोल्टिंग” के दौरान सुरक्षा प्रदान करने के लिये सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने की आवश्यकता होगी | इसके लिये तालाब में बांस के एक फ्रेम में जलकुम्भी सजा कर या फटे-पुराने जाल को सिकड़ द्वारा लटका कर, पेड़ों की सुखी टहनियों के झुरमुट सजा कर, मोटर गाड़ी के पुराने टायरों का डाल लगा कर, पाइप अथवा तार या खजूर के पत्ते आदि रखकर संचित झींगों को छुपाने की जगह उपलब्ध करायी जा सकती है | संचित मछलियों के भोजन के लिये आप प्रचलित मिश्रण (राईस ब्रान और खली 1:1) का प्रयोग करेंगे तथा झींगों के लिए बारीक घोंघे-सितुओं का मांस आदि दे सकते हैं | कार्प मछलियों के अच्छे बीज की पहचान तो हम कर लेते हैं, झींगा के अच्छे बीज की पहचान कैसे करते हैं ? महाझींगा के अच्छे बीज की पहचान आप निम्नलिखित लक्षणों के आधार अपर कर सकते हैं : - रंग : बीज का रंग हल्का भूरा होना चाहिये | शरीर पर सफेद धब्बों का होना अस्वस्थ बीज के लक्षण हैं | सिर के दोनों और शारीर के समानान्तर दौड़ती हुई 4-6 काली पत्तियां दिखाई देना स्वास्थ्य बीज के लक्षण है | रोस्ट्रल टिप गुलाबी रंग का होना चाहिये | चपलता :- तेजी से चलना, इक्कठे न रहना, पुरे क्षेत्र में बराबर बटे रहना, बर्तन पर हल्की ठोंक मारने से चौंक जाना, पानी की धारा के विपरीत दिशा में चलना अच्छे बीज के लक्षण है | झुंड में एक जगह जमा रहना, हल्की से आहट पर कूदना-फाँदना अस्वस्थ बीज के लक्षण है | भोजन ग्रहण : दिया गया आहार तेजी से खाना अच्छे बीज के तथा आहार के प्रति उदासीनता अस्वस्थ बीज के लक्षण है | मेरे तालाब में जलीय खतपतवार की एक गंभीर समस्या है जिसके कारण उत्पादन में कमी तथा लागत खर्च अत्यधिक हो जाता है | कृपया एस संबंध में आवश्यक निदान जो कम खर्चीला हो, के बारे में बताने का कष्ट करें | जलीय खरपतवार से मुक्ति पाने का सर्वोतम उपाय तो यही है की उनके उगने की उनके उगने की प्रक्रिया पर सतत ध्यान रखा जाए और समय-समय पर श्रम द्वारा उनका उन्मूलन किया जाए | क्या आप इस बात की जानकारी देने का कष्ट करेंगे कि वह कौन सी राज की बात (टेकनीक) है जिसके द्वारा आंध्र-प्रदेश कार्प मछलियों के उत्पादन में देश में सबसे आगे बढ़ गया है, यहाँ तक कि आंध्र प्रदेश की मछलियाँ अब झारखण्ड में भी बिकने लगी है ? सबसे बड़ी राज की बात तो यही है कि आंध्र-प्रदेश के जलकृषक बड़े ही उधमी प्रकृति के तथा अपने व्यवसाय के प्रति काफी सजग होते हैं | जलकृषि व्यवसाय को किस प्रकार अधिक से अधिक लाभकारी बनाया जाए इस हेतु वे सतत प्रयत्नशील रहते हैं | वस्तुत: यह उनके विवेकपूर्ण व्यवसायिक बुद्धि का ही कामल है जिसकी वजह से जलकृषि व्यवसाय के क्षेत्र में आंध्र-प्रदेश आज देश का अग्रणी राज्य बन गया है | कार्प मछलियों की जलकृषि में आंध्र-प्रदेश के जलकृषकों को अधिक उत्पादन मुख्य रूप से निम्नलिखित कारणों से प्राप्त होता है | पानी की प्रचुरता | उपजाऊ मिटटी | तालाब का संचयन हेतु एक वर्षीय ठिगने बीज (स्टेंडड इयरलिंग) का प्रयोग | तालाब में उर्वरक एवं पूरक आहार का विधिवत् प्रयोग तथा नियमित देखभाल | थाई मांगुर के पालन हेतु इधर मत्स्य पालकों का उत्साह बढ़ रहा है | किन्तु इसके बीज काफी महेंगे हैं तथा परभक्षण की प्रवृति भी बहुत अधिक होती है | क्या इसका पालन इस क्षेत्र के लिये उपयुक्त है ? कृपया अपना सुझाव दें | थाई मांगुर मूल रूप से अफ्रीका की मछली है जिसका वैज्ञानिक नाम क्लैरियस गाईरीपाईन्स है | अंग्रेजी में इसका नाम “शार्प टूथ कैटफिश” या “नाइल कैटफिश” है | इसे थाई मांगुर के नाम से इसलिए संबोघित किया जाता है क्योंकि यह थाईलैंड से बांग्लादेश होते हुए हमारे देश में पहुंची है | सहज अनुकूलनशीलता एवं तेज बढ़वार के कारण यह जलकृषि हेतु विश्व के कई देशों में ले जायी गयी है | दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देशों के एक्वाकल्चर पटल पर यह एकदम छा सी गयी है | इतना कि लोग अब इसके प्रसार के भय से चिन्तित हो उठे हैं, डर है कि प्रजनन द्वारा अपनी तादाद बढ़ा कर यह स्थानीय जलों में कहीं अपना आधिपत्य ही न जमा बैठे | दक्षिणी पूर्व एशियाई देशों में थाई मांगुर के मांस की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए मांगुर की स्थानीय प्रजातियों के साथ इसकी संकर किस्में तैयार कर ली गयी है जिसे मूल प्रजाति से अधिक सुस्वादु बताया जा रहा है | वस्तुत: एक्वाकल्चर के लिए इन दिनों सर्वत्र मांगुर की इस संकर किस्म का उपयोग किया जा रहा है | क्या पता भारतवर्ष में पहुंची थाई मांगुर भी इसकी एक संकर प्रजाति ही हो | चूँकि थाई मांगुर भारतवर्ष में औपचारिक ढंग से नहीं आती है अत: मात्सियकी अनुसंधान संस्थानों द्वारा इस मछली पर अभी तक कोई विशेष अध्ययन नहीं किया जा सका है | ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र में इसके एक्वाकल्चर के संबंध में अभी कोई अनुशंसा कर देना युक्तिसंगत नहीं है | बहरहाल इस मछली के परभक्षी स्वभाव को ध्यान में रखते हुए हमें सावधानी बरतने की जरुरत है ताकि खामख्वाह इसके चलते स्थानीय मात्सियकी के लिए कोई मुसीबत न खड़ी हो जाए | बेहतर हो कि इसे अपने तालाब में नहीं पाले | धान की फसल के साथ रेहू, कतला या नैनी मछली का पालन कर सकते हैं अथवा नहीं ? यदि हाँ, तो इसकी विधि बताएं | साथ ही कृपया यह भी सुझाव दें कि मछली की अधिक उतापदाकता कैसे संभव है ? एशिया के कई देशों में धान की फसल के साथ मछली पालने का चलन है | खेतों में मुख्य रूप से कॉमन कार्प, तेलपिया कोलिसा, चना तथा क्लैरियस प्रजाति की मछलियाँ पाली जाती है | धान के खेतों में मछलियों के होने से धान के फसल को काई प्रकार से लाभ पहुंचता है | मछलियों के होने से धान के फसल को कई प्रकार से लाभ पहुंचता है | मछलियाँ के होने से धान के फसल को कई प्रकार से लाभ पहुंचता है | मछलियाँ भोजन की खोज में मिटटी को उलट-पलट करती रहती है, इससे खेत की जुताई होती रहती है | मछलियाँ घान में लगने वाले कीड़ों तथा उनके लार्वे-प्युपे का भी सफाया करती रहती है | इसके अलावा मछलियों द्वारा उत्सर्जित मल-मूत्र से खेत की उर्वरता भी बढती रहती है | धान के खेतों में मछली पालने के लिए खेत के चारों ओर या तीन ओर खाई खोद दी जाती है | बरसात में खेत और खाई दोनों में पानी भरा होता है जबकि जाड़े में खेत प्राय: सूख जाता है और सारा पानी सिमट कर खाई में बचा रह जाता है | इस प्रकार खेत में संचति मछलियाँ बरसात में पुरे खेत में विचरती है लेकिन जाड़े में उनके विचरने का दायरा खाई तक ही सिमित रह जाता है | इस रीती से एक वर्ष में एक खेत से धान की दो फसलें (खरीफ और रबी) तथा मछली की एक फसल प्राप्त की जा सकती है | आप धान के खेत में रेहू, कतला और नैनी का पालन उपरोक्त रीती से कर सकते हैं | इन मछलियों के पालन की सारी प्रक्रिया वाही है जो आमतौर पर तालाबों में मछली पालन के लिये अपनाई जाती है | धान के खेतों में मछली पालन करते समय दो बातों पर आपको विशेष ध्यान देने की जरुरत होगी – खेत ऐसी जगह पर बना होना चाहिये जहां जलापूर्ति की सुविधा उपलब्ध हो | खेत में कीटनाशक दवाओं का प्रयोग न हो | मछलियों की अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए पर्याप्त मात्रा में पूरक आहार का प्रयोग आवश्यक होगा | मैं मत्स्य बीज उत्पादन का काम करता हूँ | यह मेरे जीविका के लिए कितना उपयुक्त है ? कार्प मछलियों का बीज उत्पादन अपने आप में एक अच्छा –ख़ासा स्थापित व्यवसाय है | मछली पालन की बढती लोकप्रियता के साथ इस व्यवसाय के पनपने का सीधा संबंध है | आप इस व्यवसाय को थोडा वैज्ञानिक आधार देकर इसे अधिक लाभकारी बना सकते हैं | जैसे – प्रजनक मछलियों का पालन करके अन्य बीज व्यपारियों के लिए आप प्रजनक बैंक का काम कर सकते हैं | अगेती प्रजनन द्वारा आप जलकृषकों को असमय भी बीज उपलब्ध करा सकते हैं | सेलिक्टिव प्रजनन द्वारा बीज की उत्तम किस्में तैयार कर सकते हैं | इच्छुक लोगों को मत्स्य बीज प्रजनन का प्रशिक्षण दे कर आप एक स्कुल चला सकते हैं और अच्छा ख़ासा धनोपार्जन कर सकते हैं | इस इलाके में जाड़ा माह के शुरुआत होते ही मछलियों में लाल धब्बे वाली बीमारी शरू हो जाती है | इससे इस क्षेत्र का मछली उत्पादन काफी कम हो गया है | कृपया इसके निदान हेतु कुछ सुझाव दें ? रोग प्राय: रेहू, मृगल, ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प, कवई, सौरा, गरई, मांगुर, सिंघी, बुल्ला आदि मछलियों में व्यापक रूप से देखने को मिलता है | इसमें शरीर के अनके भागों पर लाल-लाल धब्बे जैसे घाव दिखाई देते हैं | एस रोग को चूने के प्रयोग से ठीक किया जा सकता है परन्तु यह खर्चीला पड़ जाता है | इसके लिये केन्द्रीय मीठा जल जीवपालन अनुसंधान, भुवनेश्वर में “सीफेक्स” नामक एक दवा बनायी गयी है जिसके प्रयोग से यह रोग ठीक हो जाती है | एक मीटर गहरे जल वाले एक हेक्टेयर के तालाब में लाल घाव की बीमारी हो जाय, तो उसमें 1 लीटर “सीफेक्स” का प्रयोग किया जाता है | सीफेक्स को पहले पानी में मिलाकर तनुघोल बनाते हैं | उसके बाद तालाब में बराबर रूप से चारों तरु छिड़काव करते हैं | दवा प्रयोग करने के तीन दिन बाद रोग का फैलाव रुक जाता है | सातवें दिन तक 70 प्रतिशत घाव भर जाता है | आप अगर यह दवा खरीदना चाहते हैं तो मत्स्य विभाग के स्थानीय कार्यालय से संपर्क करें | घरेलु उपचार में चूना के साथ हल्दी मिलाकर प्रयोग करने से अल्सर घाव ठीक हो जाता है | इसके लिए कली चूना 40 किग्रा / एकड़ एवं हल्दी का चूर्ण 4 किग्रा/ एकड़ का प्रयोग करें | आधी मात्रा चूना एवं आधी मात्रा हल्दी का चूर्ण मिलाकर तालाब में डालें | पुन: 5 से 7 दिनों तक प्रतिदिन 100 मि.ग्रा. टेरामाईसिन तथा 100 मि.ग्रा. सल्फाडाइजिन नामक दवा को प्रति किग्रा पूरक आहार (भोजन) में मिला कर मछलियों को खिलाना अच्छा परिणाम देता है | कभी-कभी तालाब के पानी में जाने पर खुजली क्यों होती है ? तालाब का पानी गंदा होने या ज्यादा शैवाल होने से ऐसा होता है | तालाब में 1 ली.प्रति एकड़ की दर से फार्मलीन का प्रयोग इस स्थिति में फायदेमंद होता है | स्त्रोत: मत्स्य निदेशालय, राँची, झारखण्ड सरकार