परिचय अच्छे नस्ल के मत्स्य बीज सही समय और सही संख्या में तालाब के संचय करना अच्छे और सफल मत्स्य उत्पादन की सबसे महत्वूर्ण आवश्यकता है | आमतौर पर यह देखा गया है कि समय पर मत्स्य बीज नहीं मिलने के कारण महंगे मिलने के कारण बहुत से मत्स्य पालकों के तालाब खाली रह जाते हैं या आवश्यकता अनुरूप संचित नहीं हो पाते हैं | झारखण्ड राज्य में लगभग 120 करोड़ मत्स्य बीज की मांग है | मत्स्य स्पान की आवश्यकता मात्रा का लगभग 80 % और मत्स्य बीज का 40 % मांग की आपूर्ति पं. बंगाल के बांकुड़ा, पुरुलिया आदि सीमावर्ती जिलों से की जाती है | झारखण्ड राज्य में भी मत्स्य स्पान उत्पादन, विशेष कर मछली के बीजों के उत्पादन की बहुत संभावना है | झारखण्ड राज्य लगभग 60% जलकर मौसमी प्राकृति के हैं, जिनमें 6 से 8 माह तक पानी रहता है | ऐसे मौसमी जलकरों का प्रयोग नर्सरी तालाब / रियारिंग तालाब की तरह कर के इनके मत्स्य बीज (फ्राई) तथा फिंगरलिंग का सफलता पूर्वक उत्पादन किया जा सकता है | राँची जिला के सिल्ली अंचल एवं सरायकेला खरसावाँ जिले के मत्स्य पालक बड़े पैमान में मत्स्य बीज उत्पादन कर उसे स्थानीय बाजार में बेचने के साथ-साथ छतीसगढ़ और उड़ीसा के निकटवर्ती जिलों में आपूर्ति कर अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं | यह जानना जरुरी है कि एक एकड़ के सदाबहार तालाब में मत्स्य उत्पादन कर एक वर्ष में 1000 कि.ग्रा. मछली यानी 40,000 रुपया अर्जित किया जा सकता है जबकि उसी तालाब या एक एकड़ के मौसमी तालाब में मत्स्य बीज उत्पादन कर दो माह में 50,000 रुपया अर्जित किया जा सकता है | शेष माह में उस तालाब से मत्स्य अंगुलिकाओं या मछली उत्पादन कर 40,000 से 80,000 रूपये की अतिरिक्त आमदनी प्राप्त कर सकते हैं | मत्स्य स्पान उत्पादन भारतीय मेजर कार्प मछलियाँ समान्यत: अपने प्राकृतिक आवास नदी में ही मानसून बाढ़ के दौरान प्रजनन करती है | प्रेरित प्रजनन तकनीक के विकास से पूर्व कार्प बीजों का एकमात्र श्रोत नादिय जल ही था | अत: प्राप्त बीजों में वांछनीय एवं अवांछनीय दोनों ही प्रकार के बीज होते थे | बीजों की उस खेप में से (5-7 मि.मी.) वांछनीय बीजों को छांटना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं था | इसके अलावा नादिय स्रोत से बीज कुछ विशेष स्थानों से ही प्राप्त होते थे जिन्हें लम्बी दुरी तक ले जाने में बड़ी समस्या थी क्योंकि परिवहन का खर्च भी अधिक होता है | इस समस्याओं के अतिरिक्त बीजों की उपलब्धता भी मानसून पर आधारित होती थी | मत्स्य बीजों की उपलब्धता हेतु कृत्रिम प्रजनन के निरन्तर प्रयास किये गए एवं अंततः वर्ष 1957 तथा 1962 में सफलता प्राप्त हुई जब पहले भारतीय कार्प फिर चायनीज कार्प का प्रेरित प्रजनन सफलतापूर्वक कराया गया | मछलियों को पियूष ग्रंथि के सार की सूई लगाईं गई, जिसे आज प्रेरित प्रजनन या हाइपोफ़ाइजेशन के नाम से जाना जाता है | इस सफलता के उपरान्त इस तकनीक में काफी सुधार किया गया है जिससे उत्तरजीवीता दर में वृधि हुई है | प्रेरित प्रजनन का अर्थ है कि मछलियों को पियूष ग्रंथियों के सार या अन्य सिंथेटिक हारमोन दे कर प्रजनन के लिए प्रेरित करना | इस तकनीक की सफलता का मूल, प्रजनक मछलियों के चयन तथा इनकी रखरखाव में है | छोटे पैमाने पर मत्स्य स्पान का उत्पादन हापा तकनीक द्वारा किया जा सकता है | अब तो बड़े पैमाने पर मत्स्य स्पान उत्पादन के लिए बड़ी-बड़ी हैचारियाँ स्थापित की गई हैं , जहां प्रत्येक वर्ष 3 से 15 करोड़ तक स्पान उत्पादन किया जाता है | स्पान उत्पादन की प्रक्रिया थोड़ी जटिल एवं ज्यादा पूंजी व्यय वाली है अत: प्रारम्भ में मत्स्यपालकों/ मत्स्य बीज उत्पादकों को किसी प्रतिष्ठित हैचरी से ही मत्स्य स्पान प्राप्त कर कार्य करना चाहिए | मत्स्य बीज उत्पादन उन्नत मत्स्य उत्पादन के लिए उन्नत नस्ल के स्वस्थ मत्स्य बीज का समय पर तालाबों में संचयन सबसे महत्वूर्ण है | मत्स्य हैचरी या नदी से प्राप्त मत्स्य स्पान (अंडा से बाहर निकले लगभग तीन दिनों का मछली का बच्चा) को 15 से 20 दिनों तक नियंत्रित एवं अनुकूल वातावरण में पोषण कर उसे बड़े तालाबों में संचय योग्य तैयार करने की व्यवस्था ही नर्सरी या पोषण प्रबन्धन है | भारतीय मुख्य कार्प एवं विदेशी कार्प मछली तथा सिल्वर कार्प / ग्रास कार्प का प्रजनन मानसून के आने के साथ ही शुरू हो जाता है | पं. बंगाल के कुछ भागों में बेहतर और उन्नत ढंग से मत्स्य प्रजनको की देख-रेख कर उनका प्रजनन अप्रैल माह में ही करा लिया जाता है | अतएव मत्स्य बीज उप्तादन के इक्छुक मत्स्यपालक स्पान की उपलब्धता के समय एवं मत्स्य बीज की मांग को देखते हुए नर्सरी का प्रबंधन का समय निर्धारित कर सकते हैं | स्त्रोत: मत्स्य निदेशालय, राँची, झारखण्ड सरकार