परिचय मछलियों के छोटे-छोटे बच्चों का उत्पादन, एकत्रीकरण एवं मत्स्य उत्पादन क्षेत्र तक उनका परिवहन मत्स्य पालन का अहम् पहलु है | विभिन्न फसलों का उत्पादन कार्य बीज से प्रारम्भ होता है, उसी प्रकार मत्स्य पालन कार्य भी मछलियों के छोटे-छोटे बच्चों से प्रारम्भ होता है | जिन्हें सामान्यत: मत्स्य बीज कहा जाता है | प्रारंभिक काल में इन मत्स्य बीजों को प्राकृतिक श्रोत्रों से एकत्रित किया जाता था, विशेष कर नादिय श्रोत्रों से | मत्स्य पालन के लिए उपयुक्त मत्स्य बीजों पर ही धयान दिया जाता था एवं इन बीजों को एकत्रित कर परिवहन करने की व्यवस्था को ग्रामीण स्थर पर ही विकसित किया गया | भारत में मत्स्य उत्पादन हेतु भारतीय मेजर कार्प मछलियों (रोहू. कतला और मृगल) के छोटे-छोटे बच्चे और मिठेजल व खारा जल झींगों की लार्वा के बाद की अवस्था को ही मत्स्य बीज माना जाता है | आधुनिक मत्स्य पालन पद्धतियों के कारण प्रेरित प्रजनन द्वारा कॉमन कार्प, ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प मत्स्य बीजों का भी उत्पादन किया जा रहा है | मत्स्य बीजों की विभिन्न दशाएं सामान्यत: मत्स्य पालन में मछली व् झिगों के विभिन्न दशाओं की मत्स्य बीजों का उपयोग होता है | भारतीय मेजर कार्प मछलियों के संदर्भ में अंडों में स्फुटन के बाद 1 से 4 दिन आयुवाले बच्चों को स्पान या जीरा कहा जाता है | इन जीरों की लम्बाई 5-9 मि.मी. के बीच होती है और बहुत ही नाजुक होती हैं | इस अवस्था में इनके शरीर पर कोई शल्क (स्केल) नहीं होते हैं परन्तु शरीर पर रंगीन पिगमेंट होते हैं | ये छोटी मछलियाँ ठीक तरह से तैर भी नहीं पाती है क्योंकि तब तक इनका पंख पूरी तरह विकसित नहीं होते हैं, और ये अधिकांशत: पानी के बहाव के अनुरूप ही तैरते हैं | झींगों के मामले में स्फुटन के बाद लार्वा तथा लार्वा के विभिन्न अवस्थाओं से होकर तरुण झींगों में विकसित होने में 60-90 दिन लग जाते हैं | भारतीय मेजर कार्प के सन्दर्भ में दूसरी अवस्था फ्राई (पोना) की है | एस अवस्था के दौरान इनकी लम्बाई 1.5 से.मी. से 5.0 से.मी. के बीच होती है | पोनों के शारीर पर शल्क निकल आते हैं एवं इनका पंख पूरी तरह विकसित तथा इनकी आयु 10-25 दिन हो जाती है | ये मत्स्य फ्राई (पोना) जल प्रवाह के विपरीत तैर सकती है एवं सक्रिय रूप से आहार लेती हैं | इन मत्स्य बीजों में पोना अवस्था के बाद अंगुलिका अवस्था आती है जब ये बीज 10 से 15 से.मी. लम्बाई प्राप्त कर लेती है, तथा 50 से 60 दिन आयुवाली हो जाती है | मछलियों व् झींगों की विभिन्न अवस्थाओं का विवरण निम्नलिखित है : - क्रम अवस्था आयू लम्बाई संख्या प्रति यूनिट स्पान (जीरा) 1-4 दिन 5-9 मि.मी. 400-500 / मि.ली. फ्राई (पोना) 5-30 दिन 1-6 से.मी. 100-200 / मि.ली. फिंगरलिंग (अंगुलिका) 30-60 दिन 6 से.मी. से अधिक 5-15/ 20 मि.ली. झींगा लार्वा 10-15 दिन 8 मि.मी. 1.5 से.मी. 50-200 / मि.ली. उपर्युक्त सभी आकार के बीजों का उपयोग मत्स्य पालन हेतु किया जाता है | इन अवस्थाओं में मत्स्य बीजों का परिवहन बड़े पैमाने पर छोटे-छोटे परिमापों में सरलता से, कम खर्च पर किया जा सकता है | नोट : स्पान/ डिम्ब (जीरा) प्रति वाटी के हिसाब से मिलता है, जो 40 मि.ली. का होता है एवं उसमें लगभग 20,000 स्पान आता है | सामान्यत: एक लाख स्पान का वजन 140 ग्राम होता है | फ्राई एवं अंगुलिका किसी छोटे जालीदार छिद्रयुक्त कटोरी में लेकर गिनना चाहिये | जीतनी संख्या आए उसी के अनुरूप आवश्यकतानुसार मत्स्य अंगुलिका या फ्राई लेनी चाहिये, क्योंकि विभाग द्वारा गिनती के रूप में फ्राई/मत्स्य अंगुलिका की बिक्री की जाती है | उदहारणार्थ, एक माह तक के फ्राई 100 रूपये / हजार की दर से बेचीं जाती है | निजी मत्स्य बीज उत्पादकों द्वारा मत्स्य बीज किलो में बेचा जाता है | परन्तु यह जानना आवश्यक है की एक किलो में कितनी संख्या में मत्स्य बीज प्राप्त हो रहा है ताकि जलक्षेत्र के अनुरूप सही संख्या में मत्स्य बीज का संचयन हो सके | मत्स्य बीज परिवहन चूँकि मछलियाँ एवं झींगे जल में रहती है और श्वास प्रक्रिया हेतु आक्सीजन जल से ग्रहण करती तथा कार्बन-डाई –आक्साईड जल में ही छोड़ती है | अत: जल आक्सीजन से परिपूर्ण होना इन्हें जीवित रखने के लिए आवश्यक है | जब मचियों व् झींगों के जीरा, फ्राई, अंगुलिकाओं व् लार्वा को कम जल परिणाम में परिवहन किया जाता है तो बड़ी मात्रा में आक्सीजन की आवश्यकता होती है | सामान्यत: मत्स्य पालन में बीज उत्पादन क्षेत्र से मत्स्य पालन क्षेत्र तक मत्स्य बीजों का परिवहन आवश्यक हो जाता है चूँकि दोनों क्षेत्र अलग-अलग स्थानों पर स्थिर होते हैं | मत्स्य बीज परिवहन में तापमान का विशेष महत्त्व होता है | जब जल का तापमान कम (12० – 25० से.ग्रे.) होता है तो इसमें बड़ी मात्रा में आक्सीजन घुला होता है | जल का यह तापमान मत्स्य परिवहन के लिए उपयुक्त है | अन्य महत्वपूर्ण अंश है, जल का पी.एच.स्तर, जल जल का पी.एच. स्तर 7.0 अर्थात न्यूट्रल रहता है तो ऐसी स्थिति में मत्स्य बीज परिवहन के लिये अनुकूल है | पी.एच.स्तर 7.0 से कम हो तो यह अम्लीय हो जाता है, और अधिक होने पर क्षारीय हो जाता है | दोनों ही स्थितियाँ परिवहन के लिए अनुकूल नहीं है | इन बातों के आलावा स्वस्थ मत्स्य व् झींगा बीजों का ही परिवहन किया जाना चाहिये अन्यथा वांछित परिणाम नहीं मिल सकते हैं | रोगग्रस्त व् कमजोर मत्स्य बीजों का परिवहन नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि ये बीज परिवहन के दौरान पड़ने वाले दबाव को सहन नहीं कर सकते हैं | परिवहन के लिए ऐसी स्थितियां हों , जहाँ इन बीजों का जीवित अवस्था में बड़ी सरलता एवं सफलता से कम खर्च पर परिवहन किया जा सके | इन छोटी मछलियों को लम्बी दुरी तय करने के दौरान दबाव सहन करना पड़ता है | परिवहन के पूर्व अनुकूलन करना आवश्यक है | समान्यत: स्पान या फ्राई को पौलिथिन के पैकेट में पैक किया जाता है | पैकेट में एक तिहाई पानी तथा दो तिहाई आक्सीजन होता है | मत्स्य बीज का अनुकूलन मत्स्य बीज परिवहन के पूर्व अनुकूलन के लिए यह जरूरी है कि उसे हापा में दो-तीन घंटे के लिए रखा जाय | इस क्रम में इन्हें भोजन नहीं मिलता है तथा पेट खाली रहता है, जिसमें परिवहन के दौरान पानी कम गंदा होता है | दो –तीन घंटे हापा में रखने की प्रक्रिया को अनुकूलन कहते हैं | यदि अनुकूलन नहीं किया जाय तो परिवहन के दौरान उनके द्वारा मल-मूत्र त्यागने से पानी में यूरिक एसिड की मात्रा बाढ़ जाएगी, मछली का बीज तनाव में आ जाएगा और बीज मरने लगेंगे | परम्परागत मत्स्य बीज परिवहन हमरे देश में मत्स्य पालन एवं मत्स्य बीज परिवहन सदियों पुरानी है | पहले मत्स्य पालन के लिए आवश्यक समस्त बीज नादिय श्रोतों से ही प्राप्त किया जाता था | मानसून काल में मछलियों के प्रजनन समय में मत्स्य बीजों को शूटिंग नेट की सहायता से एकत्रित कर, मत्स्य पालन क्षेत्रों तक ले जाया जाता था | मिटटी के हांडियों में आविल नादिय जल में मत्स्य बीजों को डालकर ले जाया जाता था | हांडी के जल को हाथों से छ्पछपाया जाता था जिससे जल में आक्सीजन की आपूर्ति हो एवं बीजों को पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन मिल सकें | कभी-कभी इन हांडियों को एक बांस के पट्टे के दोनों ओर झुला कर कन्धों पर ढो कर ले जाया जाता था, जिससे अपने आप ही इन हांडियों के जल में छपछपाहट पैदा हो कर, जल में आक्सीजन की आपूर्ति हो जाती थी | मिटटी के हांडियों के उपयोग के कारण जल का तापमान भी अनुकूल 15० से 25० से.ग्रे. रहता था | मत्स्य बीजों का आधुनिक परिवहन मत्स्य प्रजनन के दिशा में प्रेरित प्रणाली के समावेश से विशेषकर भारतीय मेजर कार्प मछलियों को पियूष ग्रंथियों के सार की सुई लगाकर प्रजनन कराने की प्रक्रिया तथा हैचरी प्रबन्धन के विकास के विकास से मत्स्य बीज परिवहन में तेजी आयी है | इसके अलावा झींगा के प्रजनन और बीज उत्पादन के आधुनिक तकनीकों के कारण झींगा के बीज भी देश में बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं | आधुनिक मत्स्य बीज परिवहन में, मतस्य बीजों को स्वस्थ जल एवं आवश्यक परिमाण में आक्सीजन के साथ पोलीथिन बैगों में पैक कर, इन्हें मेटल या कार्डबोर्ड के बक्सों में रख दिया जाता है | ये मेटल या कार्डबोर्ड बाक्स लम्बी दूरी के परिवहन के लिए सुविधाजनक हैं | एस तकनीक से मछलियों के जीरों या झींगों के लार्वा का लम्बी दूरी तक परिवहन आर्थिक रूप से भी काफी लाभदायक है | परिवहन से सम्बंधित विवरण एस प्रकार है : - कन्टेनर – 15-20 लीटर क्षमता वाली पौलिथिन बैग – 15 – 20 लीटर क्षमता एवं मोटी परत से बनी आक्सीजन गैस सिलेंडर – मेडिकल या औधोगिक आक्सीजन स्वच्छ जल – 5 – 8 लीटर ट्यूबवेल या नल का पानी जिसका तापमान 15-25 डिग्री सें.ग्रे. हो | मत्स्य बीज – (क) स्पान/ झींगों का लार्वा 15000 – 20000 प्रति पैकिंग 6-10 घंटों की परिवहन अवधि | (ख) कार्प मछलियों के पोना (फ्राई) 500-1200 प्रति पैकिंग 6-10 घंटों की परिवहन अवधि | संचयन का तरीका मछली के बीज के पैकेट का पानी परिवहन के कारण गर्म हो जाता है इसलिए पैकेट को 10-15 मिनट तक तालाब के पानी में रख दिया जाता है | जब पैकेट के अंदर के पानी का तापक्रम तथा तालाब के पानी का तापक्रम एक हो जाए तो पैकेट खोलकर आधा मुहं पानी में डुबोना चाहिये, जिससे बीज अपने आप पानी में चला जाय | यह काम धीरे-धीरे करना चाहिये, जिससे बीज को कम से कम चोट लगे | स्त्रोत: मत्स्य निदेशालय, राँची, झारखण्ड सरकार