काँलमनेरिस रोग लक्षण यह फ्लेक्सीबेक्टर काँलमनेरिस नामक जीवाणु के संक्रमण से होता है, पहले शरीर के बाहरी सतह पर व गलफड़ों में धाव होने शुरू हो जाते हैं फिर जीवाणु त्वचीय उत्तक में पहुंच कर धांव कर देते हैं। उपचार संक्रमित भाग में पोटेशियम परमेगनेट का लेप लगाएं। 1-2 पी.पी.एम. कॉपर सल्फेट का धोल पोखरों में डालें। बेक्टीरियल हिमारैजिक सेप्टीसिमिया लक्षण यह मछलियों में ऐरोमोनाँस हाइड्रोफिला व स्युडोमोनास फ्लुरिसेन्स नामक जीवाणु से होता है। इसमें शरीर पर फोड़े, तथा फैलाव आता है, शरीर पर फूले हुए धाव हो जाते हैं जो त्वचा व मांसपेशियों में हुए क्षय को दर्शाता है, पंखों के आधार पर धाव दिखाई देते हैं। उपचार पोखरों में 2-3 पी.पी.एम. पोटेशियम परमेगनेट का धोल डालना चाहिए। टेरामाइसिन को भोजन के साथ 65-80 मि.ग्राम प्रति किलोग्राम भार से10 दिन तक लगातार दें। ड्रॉप्सी लक्षण यह उन पोखरों में होता है जहां पर्याप्त भोजन की कमी होती है। इसमें मछली का धड़ उसके सिर के अनुपात में काफी पतला हो जाता है और दुर्बल हो जाती है। मछली जब हाइड्रोफिला नामक जीवाणु के सम्पर्क में आती हैं तो यह रोग होता है। प्रमुख लक्षण शल्कों का बहुत अधिक मात्रा में गिरना तथा पेट में पानी भर जाता है। उपचार मछलियों को पर्याप्त भोजन देना व पानी की गुणवत्ता बनाए रखना। पोखर में 15 दिन के अंतरराल में 100 कि.ग्राम प्रति हेक्टर की दर से चूना डालें। एडवर्डसिलोसिस लक्षण इसे सड़कर गल जाने वाला रोग भी कहते हैं। यह एडवर्डसिला टारडा नामक जीवाणु से होता है। प्राथमिक रूप से मछली दुर्बल हो जाती है,शल्क गिरने लगते हैं फिर पेशियों मे गैस से फोड़े बन जाते हैं। चरम अवस्था में मछली से दुर्गन्ध आने लगती है। उपचार सर्वप्रथम पानी की गुणवत्ता की जांच कराना चाहिए। 0.04 पी.पी.एम. के आयोडीन धोल में 2 घंटे के लिए मछली को रखना चाहिए। वाइब्रियोसिस लक्षण यह रोग विब्रिया प्रजाति के जीवाणुओं से होता है। इसमें मछली को भोजन के प्रति अरूचि होने के साथ-साथ रंग काला पड़ जाता है, मछली अचानक मरने भी लगती है। यह मछली की आंखों को अधिक प्रभावित करता है व सूजन के कारण आंख बाहर निकल आती है व सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। उपचार आंक्सीटेट्रासाईक्लिन तथा सल्फोनामाइड को 8-12 ग्राम प्रति किलोग्राम भोजन के साथ मिलाकर देना चाहिए। फिनराँट एवं टेलराँट लक्षण यह रोग ऐरोमोनाँस फ्लुओरेसेन्स, स्यूडोमोनाँस फ्लुओरेसेन्स तथा स्यूडोमोनास पुटीफेसीन्स नामक जीवाणु के संक्रमण से होता है, इसमें मछली के पक्ष एवं पूंछ सड़कर गिरने लगते हैं। बाद में मछलियां मर जाती हैं। उपचार पानी की स्वच्छता आवश्यक है। एमेक्विल औषधि 10 मि.ली. प्रति सौ लीटर पानी में मिलाकर संक्रमित मछली को 24 घंटे तक घोल में रखना चाहिए। स्त्राेत : मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विकास विभाग, मध्यप्रदेश सरकार।