एकीकृत मत्स्य पालन का अर्थ है 'फसल, मवेशी औरौ मछलियों का एक साथ पालन करना'। इसका मुख्य उद्देश्य है एकल पालन के अवशिष्ट का प्रयोग कर समन्वित पालन जैसे-कृषि सह जलकृषि, मछली सह मुर्गीपालन, मछली सह बत्तखपालन एवं मछली सह अनाज की खेती। एकीकृत कृषि प्रणाली, संसाधन संरक्षण और उच्च पर्यावरणीय गुणवत्ता को बनाए रखती है। मछली फार्म हाउस की विविध आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आर्थिक और निरंतर कृषि उत्पादन प्राप्त करने के लिए संसाधन प्रबंधन की रणनीति आवश्यक है। एकीकृत कृषि प्रणाली का उद्देश्य एक्वाकल्चर-कृषि एकीकृत प्रणाली मछली-धान एकीकृत कृषि प्रणाली मछली-अजोला एकीकृत कृषि प्रणाली मछली-बागवानी एकीकृत कृषि प्रणाली मछली-सीरी एकीकृत कृषि प्रणाली मछली-मशरूम एकीकृत कृषि प्रणाली एक्वाकल्चर-पशुधन एकीकृत कृषि प्रणाली मछली-बत्तख एकीकृत कृषि प्रणालीमछली-मवेशी एकीकृत कृषि प्रणाली मछली-पोल्ट्री एकीकृत कृषि प्रणालीमछली-सूकर एकीकृत कृषि प्रणालीमछली-बकरी-भेड़ एकीकृत कृषि प्रणालीमछली-खरगोश एकीकृत कृषि प्रणाली उत्पादकता में वृद्धि, लाभप्रदता, स्थिरता, संतुलित भोजन, स्वच्छ पर्यावरण, संसाधनों का पुनर्चक्रण, वर्षभर आय। यह कृषि प्रणाली पशुधन उत्पादन को बढ़ाने, गहन खेती के प्रभावों को कम करने और संसाधनों के कुशल उपयोग के माध्यम से पर्यावरण की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण समाधान करने में सक्षम। एकीकृत कृषि प्रणाली, क्षेत्र विशिष्ट होनी चाहिए। उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग और संरक्षण सुनिश्चित करना चाहिए। नई परंपरागत तकनीकों के समावशेन द्वारा सस्ंथागत आरै बाजार सबंधों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। एकीकृत कृषि प्रणाली के प्रकार एक्वाकल्चर-कृषि एकीकृत कृषि प्रणाली एक्वाकल्चर-पशुधन एकीकृत कृषि प्रणाली एकीकृत कृषि प्रणाली में इस्तेमाल की जाने वाली मछलियों की प्रजातियां सिल्वर कार्प ग्रास कार्प लेबियो रोहिता (रोहू) सिरिनिनस मृगला(मृगल) साइप्रिनस कार्पिय (कोमन कार्प) कतला-कतला (कतला) मछली-धान एकीकृत कृषि प्रणाली मछली व धन की एकीकृत कृषि प्रणाली में धान के खेतों की जरूरत के अनुसार, परिधीय खाइयों की खुदाइर्, डाइक्स, तालाब, बुआई में सुधार आदि के साथ, मछली को धान की भूसी और सरसों की खली, मछली के शरीर का 2-3 प्रतिशत देना चाहिए। मछली-धान की एकीकृत कृषि प्रणाली में उपयोगी धान प्रजातियां पानिधान तुलसी सीआर 26077 राजाराजन पट्टंबी 15 और 16 एकीकृत कृषि प्रणाली में निचले इलाकों में धान के खेतों में खाई या नहर में खाई बनाकर मछलियां पाली जाती हैं। मछली-धान एकीकृत कृषि प्रणाली में धान का उत्पादन 5-5 टन हैक्टर के साथ-साथ मछली का उत्पादन 700 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर है। एशिया के कई देशों में यह प्रणाली लोकप्रिय है। मछली-अजोला एकीकृत कृषि प्रणाली अजोला एक मुक्त तैरने वाला फर्न है। भारत में इसकी जीनस अजालो पिनाटा व्यापक रूप से पायी जाती है और यह तालाबों, पुलों, जलाशयों और झीलों में पानी की सतह पर मुक्त तैरता पाया जाता है। यह अपनी पृष्ठीय पत्तियों में मौजूद साइनोबैक्टीरियम अनाबेना अजोला के माध्यम से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को एकत्र करता है। इस नाइट्रोजन को जैव उर्वरक के रूप में उपयोग किया जाता है। अजोला, ग्रास कार्प के लिए आहार के रूप में भी काम में आता है। मछली-मवेशी पालन एकीकृत कृषि प्रणाली विश्वभर में मवेशियों के मूत्र गोबर को मछली के तालाबों में काम में लिया जाता है। ये तालाब की उर्वराशक्ति को बढ़ाते हैं। यह मछली के भोजन में काम में भी आता है। इस प्रकार मछली-मवेशी की एकीकृत कृषि प्रणाली में श्रम और पैसे की बचत होती है। मवेशी का मल और मूत्र सर्वाहारी मछलियों के लिए पफायदेमंद होता है। मछली-मवेशी की एकीकृत प्रणाली में औसतन 3-4 गाय एवं भैंस एक हैक्टर तालाब को खाद देने के लिए पर्याप्त होते हैं। इसके अलावा 9000 लीटर दूध और 3000-4000 कि.ग्रा. मछली प्रति हैक्टर प्रति वर्ष तक उत्पादन मिलता है। मछली-मवेशी एकीकृत कृषि प्रणाली में ग्रास कार्प बचे हुए घास का उपयोग करती है। मछली, मवेशियों द्वारा बर्बाद किए गए फीड का भी उपयोग करती हैं। मछली-सूकर एकीकृत प्रणाली मछली-सूकर एकीकृत प्रणाली में मछली के भोजन लिए जैविक खाद के रूप में सूकर के गोबर का उपयोग किया जाता है। मछली-सूकर की एकीकृत कृषि प्रणाली में 30-40 सूकरों को प्रति हैक्टर रखा जाता है। सूकरों को बड़े पैमाने पर रसोई के कचरे, जलीय पौधों और फसल उपोत्पादों पर पाला जाता है। वर्तमान में सभी विकासशील देशों में मछली-सूकर के एकीकरण पर आधारित प्रणाली को अपनाया जा रहा है। सूअर या सूकर के मांस उत्पादन के लिए देश में कई विदेशी नस्लों के सूअर लाए गए हैं, जिनकी लोकप्रिय नस्लें निम्न हैंः व्हाइट यॉर्कशायर बर्कशायर लैंड्रेस सूकर के आवास का आकार संख्या पर निर्भर करता है। मछली-सूकर की एकीकृत कृषि प्रणाली में 70-90 कि.ग्रा. वजन वाले प्रत्येक सूकर के लिए 3-4 मीटर भूमि प्रदान की जाती है। यह तालाब की जैविक उत्पादकता को बढ़ाता है। गोबर का एक हिस्सा सीधे कुछ मछलियों द्वारा भी खाया जाता है। 35-40 सूकरों द्वारा उत्सर्जित मलमूत्रएक हैक्टर पानी के तालाब के लिए पर्याप्त पाया जाता है। मछली-मुर्गीपालन एकीकृत प्रणाली मछली-मुर्गीपालन एकीकृत प्रणाली में एकीकरण के तहत पोल्ट्री पक्षियों को एक तालाब या तालाब के आसपास के क्षेत्र में सामान्य रूप से निर्मित शेड के नीचे पिंजरों में रखा जाता है। मुर्गीपालन की ऐसी प्रणाली में भूमि की आवश्यकता लगभग एक वर्ग फीट प्रति पक्षी होती है। पक्षियों का मल पफर्श पर गिरता है, जहां से इन्हें एकत्र किया जाता है और तालाब में डाला जाता है। चिकन हाउस को सीधे तालाब के पानी के ऊपर भी बनाया जा सकता है, ताकि आमतौर पर तालाब के पानी में मलमूत्र गिर सके। आमतौर पर तालाब के पानी की सतह पर चिकन हाउस में 400-600 मुर्गियों का पालन किया जाता है। ग्रास कार्प के लिए जलीय वनस्पति को छोड़कर, तालाब में किसी प्रकार का चारा या उर्वरक नहीं लगाया जाता है। मछली की इस प्रणाली का उपयोग करके 4-5 टन कि.ग्रा. प्रति हैक्टर उत्पादन मिलता है। एकीकृत मछलीपालन के लाभ मछली, मानव उपभोग के लिए उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन प्रदान करती है। एक किसान अक्सर अपनी अतिरिक्त आय बढ़ाने और जल प्रबंधन में सुधार करने के लिए मछलीपालन आधारित एकीकृत कृषि को अपनाता है। तालाबों में मछली के विकास को नियंत्रित किया जा सकता है। किसान स्वयं उन मछलियों की प्रजातियों का चयन कर सकते हैं, जिन्हें वे पालना चाहते हैं। एकीकृत मछलीपालन में प्रभावी भूमि उपयोग आवश्यक है। मछली-बत्तख एकीकृत कृषि प्रणाली मछली-बत्तख एकीकृत कृषि प्रणाली, चीन, भारत, हंगरी, जर्मनी, पोलैंड और रूस में मुख्य रूप से अपनाई जाती है। मछली-बत्तख एकीकृत कृषि प्रणाली में जलीय प्राणियों और पौधों के साथ अर्ध्द-बंद जैविक प्रणाली वाला एक मछली तालाब, बत्तखों के लिए रोगमुक्त वातावरण प्रदान करता है। बत्तखों द्वारा किशोर मेंढकों, टैडपोल इत्यादि को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है। बत्तख द्वारा उत्सर्जित मल में-कार्बन, फॉस्फोरस, पोटेशियम, नाइट्रोजन, कैल्शियम जैसे तत्व उपस्थित होते हैं, जो जल की गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं। मछलियों की स्टॉविंफग तालाब के आकार पर निर्भर करती है। मछली की स्टॉविंफग 20,000 प्रति हैक्टर और उत्पादन 3000-4000 कि.ग्रा. हैक्टर होता है। इसके साथ बत्तख से अंडे और मांस भी प्राप्त होते हैं। स्त्रोत : खेती पत्रिका( आईसीएआर), महेंद्र कुमार यादव' 'मात्स्यिकी महाविद्यालय, गोविंद बल्लभ पतं कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर (उत्तराखंड)।