सबसे महत्वपूर्ण राेग बैंगन एक महत्वपूर्ण सब्जी फसल है। इसकी बांग्लादेश, पाकिस्तान, चीन, फिलीपींस, मिस्र, फ्रांस, इटली और भारत के सभी प्रदेशों में व्यापक रूप से खेती की जाती है। बैंगन का फल खनिज, विटामिन, पानी में घुलनशील शर्करा और अमाइड का एक अच्छा स्रोत है। इसका फल विशेष रूप से मधुमेह एवं जिगर के रोगियों के लिए उपयोगी है। बैंगन पर कई रोग लगते हैं, जिनमें फायटोप्लाज्मा जनित बैंगन का छोटी पत्ती रोग सबसे महत्वपूर्ण रोग है। बैंगन में फायटोप्लाज्मा से जुड़े रोग का इतिहास 75 वर्ष से अधिक पुराना है। बैंगन की छोटी पत्ती रोग का पहला रिकॉर्ड भारत में वर्ष 1939 में देखा गया, पंरतु फायटोप्लाज्मा रोग की पुष्टि वर्ष 1975 में की गई। इस रोग के कारण बैंगन की उपज में 40 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है। बैंगन का यह रोग आमतौर पर फसल बोने के एक महीने के बाद प्रकट होता है और बाद में महामारी बन जाता है। लक्षण संक्रमित पौधे में प्रमुख लक्षण पौधे का बौनापन, छोटा इंटरनोड, पत्ती के आकार में कमी तथा फीलोडी लक्षण होते हैं। प्रारंभिक संक्रमण की अवस्था में कोई फल-फूल नहीं बनता है और उपज में गंभीर नुकसान होता है। देर से संक्रमण की स्थिति में रोगी पौधों में फल विकृत हो जाते हैं और सिकुड़ जाते हैं। रोग के गंभीर होने की अवस्था में उपज में नुकसान 100 फीसदी तक हो जाता है। प्रसार बैंगन का छोटी पत्ती रोग प्रकृति में पर्णफुदका कीट प्रजाति द्वारा फैलता है। वैकल्पिक मेजबान पौधों जैसे-धतूरा, भांग और पोर्टुलाका खरपतवार में यह रोग पनपता है और लीफ हॉपर प्रजाति के कीटों द्वारा पुनः बैंगन की फसल को प्रभावित करता है। पूरे भारत में फायटोप्लाज्मा रोग के व्यापक रूप से फैले होने की सूचना है, जहां फसल चक्र और खरपतवारों का अतिव्यापी होना और लीफ हॉपर की आबादी ज्यादा है। भारत में यह रोग हिशिमोनास फाइसिटिस एवं एम्पोंएस्का नामक पर्णफुदकों द्वारा फैलता है। वर्षा ऋतु के पहले कीटों की अधिक संख्या होने पर बैंगन की फसलों में इस रोग के लक्षण ज्यादा पाये जाते हैं। प्रबंधन फाइटोप्लाज्मा रोगों का कोई प्रभावी नियंत्रण उपाय सफल न होने के कारण रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का चुनाव, कीट वेक्टर का प्रबंधन और कीट वेक्टर आबादी से बचने के लिए बुआई की तारीखों में बदलाव करना कुछ हद तक रोग के प्रभाव व फैलाव को कम करने में उत्तम उपाय हैं। बीएलएल रोग की गंभीरता प्रभावित पौधों की खेतों से छंटाई और कीटनाशक दवाओं के छिड़काव से भी कम की सकती है। कीटनाशक दवा जैसे इमैडियेलकाप्रिड का छिड़काव कीट नियंत्राण में उपयोगी है। प्रतिरोध क्षमता के बारे में रोग के खिलाफ बैंगन की खेती के आनुवंशिक स्रोत पर सीमित जानकारी उपलब्ध है। बैंगन के जंगली रिश्तेदारों अर्थात सोलेनम इंटीग्रिफोलियम और सोलनम गिलों को बीएलएल रोग के प्रतिरोधी पाया गया है। पूसा बैंगन तथा सोलनम इंटीग्रिफोलियम और एस गिलो प्रतिरोधी विकास के लिए और फील्ड प्रतिरोधी किस्म के रूप में एस. 212-1 जीनोटाइप फायटोप्लाज्मा रोग के लिए रोधी पाई गई है। कीटनाशकों के छिड़काव के साथ-साथ खरपतवार नियंत्राण बैंगन फायटोप्लाज्मा रोग की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्त्राेत : गोविन्द प्रताप राव पादप रोगविज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान(खेती पत्रिका), नई दिल्ली-110012