सेब, हिमाचल प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण फसल है। इस राज्य में फलों के अधीन क्षेत्र में से 55 प्रतिशत सेब के तहत है, जो कि यहां पर उगाई जाने वाली अन्य फसलों की तुलना में काफी अधिक है। पिछले कुछ वर्षों से राज्य में सेब उत्पादन का क्षेत्र काफी बढ़ा है, किन्तु इसकी तुलना में इसका उत्पादन बहुत कम आंका गया है। इस कम पैदावार के विभिन्न कारणों में रोगों के संक्रमण का प्रमुख स्थान है। विभिन्न रोगों जैसे असामयिक पत्ता झड़न, कैंकर, स्कैब, कॉलर रॉट, जड़ विगलन रोग इत्यादि के प्रकोप के कारण हर वर्ष काफी नुकसान होता है। यहाँ सेब के रोगों तथा उनके प्रबंधन के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है, जिसका अनुसरण करके बागवान अपने बाग को रोगमुक्त रखकर अधिक धन अर्जित कर सकते हैं। कम उत्पादकता भारत में सेब की खेती मुख्यतः पहाड़ी राज्यों जैसे जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश तथा सिक्किम में की जाती है। विश्व के अन्य प्रमुख सेब उत्पादक देशों जैसे-न्यूजीलैंज, चीन, जापान, अमेरिका, यूरोपियन राष्ट्रों व ऑस्ट्रेलिया में सेब की पैदावार 30-40 टन प्रति हैक्टर है। उनकी तुलना में हमारे देश में उत्पादकता बहुत कम है, जो कि लगभग 6-9 टन प्रति हैक्टर अंकित की गई है। श्वेत जड़ विगलन रोग श्वेत जड़ विगलन रोग लक्षण 'डिमेटाफोरा निकेट्रिक्स' नामक फफूंद के कारण होता है। इस फफूंद की परफैक्ट स्टेज 'रोजेलिनिया निकेट्रिक्स' अभी तक भारत में नहीं पाई गई है। फफूंद के तंतु के पट के पास नाशपाती के आकार का उभार पाया जाना फफूंद की एक विशेष पहचान है। रोग के लक्षण मुख्यतः पेड़ के भूमिगत हिस्से में पाये जाते हैं। इस रोग के संक्रमण से जड़ें गहरे भूरे रंग की हो जाती हैं और अधिक नमी में संक्रमित जड़ों के इर्द-गिर्द सफेद रंग का कवकजाल पफैलता है। बरसात के मौसम में जड़ की बाहरी सतह को हटाने से कवक जाल के सफेद सूत्रक या चपटे रिबन जैसी संरचनाएं भी देखी जा सकती हैं। बाद में सफेद फफूंद का जाला भूरे रंग का होकर अदृश्य हो जाता है। मृतछाल के ऊपर अंसख्य छोटी-छोटी सूक्ष्मनालिकाएं उत्पन्न होती हैं, जोकि रोग को फैलाने में भूमिका निभाती हैं। यह रोग पौधशाला तथा बगीचों दोनों को प्रभावित करता है। इस रोग से ग्रसित वृक्षों की पत्तियों की संखया कम हो जाती है। पौधों के ऊपर के भाग में पत्तियों का पीला पड़ना, किनारों से मुड़ना, आकार में कमी होना तथा पेड़ का अविकसित होना तथा वृद्धि में रुकावट आना प्रारंभ हो जाता है। यह रोग फैलकर पूरे पेड़ को क्षीण कर देता है। संक्रमित वृक्षों पर फल कम लगते हैं और उनका आकार भी छोटा रहता है। प्रबंधन वृक्षों में मृदाजनित रोगों की पूरी तरह से रोकथाम करना एक कठिन कार्य है, क्योंकि संक्रमण जड़ों में मृदा की गहरी सतहों में पाया जाता है। सेब के जड़ विगलन रोग को अभ्यासशील निवारकों तथा साथ ही उपचारात्मक उपायों जैसे जैविक, रासायनिक पद्धतियों एवं प्रतिरोधक रूट स्टॉक (मूलवृंत) का प्रयोग करके बेहतर नियंत्रित किया जा सकता है। विभिन्न प्रतिरोधक पद्धतियों का वर्णन नीचे किया गया हैः बगीचों में पानी के निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए। वृक्षों के चारों ओर पानी अधिक समय तक नहीं ठहरने देना चाहिए। संक्रमित जड़ों को काटकर जलाना तथा गर्मी में सुखाना, वृक्षों के जीवनकाल को बढ़ाने में भी प्रभावी पाया गया है। हाल ही में मृदा सौरीकरण भी कवक बीज को कम करने में प्रभावी पाया गया है। जड़ों के रोगग्रसित भाग को काटकर अलग करना चाहिए तथा कटे हुए स्थान पर चौबटिया पेस्ट (एक-एक भाग लाल लैड और कॉपर कार्बोनेट तथा सवा (1.25) भाग अलसी का तेल) का लेप नवंबर-दिसंबर में लगाना चाहिए। ग्रसित पौधों में जून-जुलाई (बरसात शुरु होने से पहले) में लगभग तीन बार 15-20 दिनों के अंतराल में कार्बेन्डाजिम (200 ग्राम) या औरियोफन्जिन (200 ग्राम) और कॉपर सल्फेट (100 ग्राम), बैनोमिल (200 ग्राम) का घोल पौधे से 30 सें.मी. दूर 15-25 सें.मी. गहरे छेद करके डालना चाहिए। पेड़ के चारों ओर सिंचाई वाले स्थान को इस घोल से उपचारित करना चाहिए। नीम खली, देवदार, लेन्टाना, बनाह (वाईटेक्स) तथा लहसुन के पत्तों का प्रयोग भी रोग की व्यापकता को कम करने में प्रभावी पाया गया है। रोग सहनशील किस्मों के मूलवृंतों जैसे एम.एम.-9, एम.एम.-16, एम.एम-104 मैलस व मैलस फ्रलोरिबन्डा के प्रयोग से भी रोग के प्रकोप को कम किया जा सकता है। जैविक नियंत्रण कारकों जैसे ट्राइकोडर्मा विरिडी, ट्राइकोडरमा हारजीयानम और एजोटोबैक्टर एरोजीन्स श्वेत जड़ विगलन ग्रसित वृक्षों को बचाने में सक्षम सिद्ध हुए हैं। स्त्राेत : सतीश कुमार शर्मा, जोगिन्दर सिंह, जे.एन. शर्मा और अंजू शर्मा, डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश), खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)।