लक्षण इस रोग के कारण सेब के पौधो में असामयिक पतझड़ होजाता है। रोग के लक्षण पत्तों तथा फल दानों पर पाये जाते हैं। रोग ग्रसित बगीचों में ग्रीष्म ऋतु के मध्य में परिपक्व पत्तियों की ऊपरी सतह पर गहरे हरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। ये कुछ समय बाद 5-10 मि.मी. व्यास के भूरे व काले धब्बों में बदल जाते हैं। कुछ ही दिनों के उपरांत संक्रमित पत्तियां पीली पड़कर गिरना शुरु कर देती हैं और पत्तीविहीन टहनियों पर केवल फल ही लटकते नजर आते हैं। अत्यधिक पत्तियों के गिर जाने से अगले वर्ष होने वाली फसल पर भी असर पड़ता है। इस रोग के लक्षण फलों पर भी दिखाई पड़ते हैं। इस रोग के कारण फलों का आकार छोटा रह जाता है तथा उन पर रंग भी पूरा नहीं आता तथा कई बार फल गिरने लगते हैं। इस रोग के लक्षण सेब के फलों पर 4-6 मि.मी. व्यास के गोलाकार, गहरे भूरे धब्बों के रूप में दिखाई पड़ते हैं जो बाद में अंडाकार हो जाते हैं। फलों की तुड़ाई दौरान ये गहरे भूरे धब्बे काले रंग के हो जाते हैं। इन धब्बों को ध्यान से देखने पर उनमें काले रंग के सूक्ष्म बिन्दु (फफूंद के ऐसरवुलाई) नजर आते हैं, जो कि भविष्य में फिर से रोग फैला सकते हैं। रोग चक्र फफूंद, सदिर्यों में जमीन पर गिरे हुए पत्तों पर प्रायः एपोथीसिया व ऐसरवुलाई के रूप में जीवित रहती हैं। बसंत ऋतु में पौधों में फूल आने के दौरान इस फफूंद के एपोथीसिया से 'एस्कोस्पोर' व एसरवुलाई से कोनिडिया निकलना आरंभ हो जाते हैं। ये बीजाणु ग्रीष्म ऋतु में नए व स्वस्थ पौधों में प्राथमिक संक्रमण फैलाते हैं। रोग का द्वितीयक संक्रमण लगातार कोनिडिया से होता है। ये काफी संख्या में सूक्ष्म काले रंग के फफूंद के बीज ऐसरवुलाई से निकलते हैं। इसके पफलस्वरूप यह रोग महामारी का रूप धारण कर लेता है। यदि औसतन तापमान 210-230 सेल्सियस के साथ वर्षा होती रहे तो रोग संक्रमण से 8 दिनों बाद ही रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इसके साथ ही इसके 2 सप्ताह बाद रोग ग्रस्त पत्तियां पीली पड़कर गिर जाती हैं। प्रबंधन गिरी हुई पत्तियों को इकट्ठा करके जला देना चाहिए। वृक्षों पर पतझड़ से पूर्व 5 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव करने से नीचे गिरी हुई पत्तियों के सड़ने में मदद मिल सकती है। सर्दियों में सेब के बगीचों में वृक्षों की उचित कांट-छांट करें, जिससे धूप अधिक से अधिक शाखाओं पर पड़ सके तथा हवा का भी उचित प्रवाह हो सके ताकि रोग के पनपने में बाधा हो। बगीचे के खरपतवारों व झाड़ियों को हटाकर साफ रखें ताकि वातावरण में अधिक नमी न रहें। इस रोग से बचाव के लिए वृक्षों की 'फल अखरोट' अवस्था से फल तोड़ने तक 15-20 दिनों के अंतराल पर सुरक्षात्मक फफूंदनाशकों जैसे मैन्कोजैब 600 ग्राम, कार्बोंडाजिम 100 ग्राम, थायोफैनेट मिथाइल 100 ग्राम, डोडीन 150 ग्राम, डायथियानौन 100 ग्राम, कोम्बीप्रोडक्ट 500 ग्राम इत्यादि का प्रति 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। असामयिक पतझड़, स्कैब तथा सेब के अन्य रोगों व कीटों की रोकथाम के लिए नौणी विश्वविद्यालय व उद्यान विभाग द्वारा हर वर्ष निकाली जाने वाली एकीकृत छिड़काव सारणी का उपयोग नवीनतम जानकारी के लिए करें। यह रोग सेब की विंटर डिलिशियस, ग्रैनी स्मिथ व टाईडमैन अर्ली वोरसेसटर प्रजातियों पर कम पनपता है इसलिए इन प्रजातियों का प्रयोग भी ठीक रहता है। स्त्रोत : सतीश कुमार शर्मा, जोगिन्दर सिंह, जे.एन. शर्मा और अंजू शर्मा डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश),खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)।