सेब की फसल में पुनर्रोपण एक व्यापक समस्या है। पुराने बगीचों में उत्पादन का कम होना, नये लगाए पौधों की वृद्धि में कमी होना अथवा उनका मर जाना इसकी विशेष पहचान है। हिमाचल प्रदेश में यह समस्या हर वर्ष बढ़ती जा रही है, जो कि सेब उगाने वाले किसानों के लिए चिंता का विषय है। सेब में पुनर्रोपण की समस्या के लिए बहुत सारे कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें फफूंद, जीवाणु, सूत्राकृमि, विषैले पदार्थ, विनाशकारी जीव, पोषण संबंधी गड़बड़ी़, एंजाइम सक्रियता तथा रासायनिक अवशेष प्रमुख हैं। दाे प्रमुख कारक जैविक कारक हिमाचल में अधिकतर बगीचे 40-50 वर्ष से अधिक आयु के हैं। इन बगीचों की मृदा में विभिन्न प्रकार के फफूंद (फ्यूजेरियम, पैनिसिलियम, साइलिंड्रोकापेनि, थाइलियोओवसिस, पीनियोस्पोरा की प्रजातियां) और जीवाणु (बैसिलस, स्यूडोमोनास) की प्रजातियां, एकटीनामोईसिटस व सूत्राकृमि प्रायः अधिक संख्या में विद्यमान रहती हैं। ये सूक्ष्मजीवी पुनर्रोपित पौधों की बारीक जड़ों द्वारा पोषक तत्वों के खींचने की क्षमता को कम करते हैं या भूमि की अधिकतर खुराक व पोषक तत्वों से, पुनर्रोपित पौधों से वंचित रखते हैं। इसके परिणामस्वरूप वानस्पतिक वृद्धि रुक जाती है व प्रभावित पौधे सूखकर मर जाते हैं। पुराने बगीचों की मृदा में प्रारंभ से अधिक मात्रा में विद्यमान रोगजनक फफूंद (डिमेटोफोरा निकेट्रिक्स-जड़ विगलन, फाइटोफ्रथोरा कैक्टोरम-कॉलर रॉट), जीवाणु (क्राउन गॉल, हेयरी रूट) सूत्राकृमि (प्रैंटीलैंक्स पेंनीट्रॉस) प्रायः पुनर्रोपित पौधों में रोग उत्पन्न करके उन्हें मार देते हैं। अजैविक कारक इसके अंतर्गत प्रायः सभी भूमि संबंधी कारण जैसे पुराने बगीचों की भूमि में पोषक तत्वों की कमी या उनका असंतुलन होना, पीएच. प्रतिक्रिया का अम्लीय में बदलना, मृदा में अधिक या कम नमी होना, मृदा में पुराने पौधों की जड़ों के सड़ने के कारण वृक्ष विषाणुओं (फाइटोटॉक्सिन) जैसे टैनिन, हाइड्रोसाइनिक एसिड, बैंजाल्डिहाइड, प्रनोसिन इत्यादि का अधिक मात्रा में विद्यमान होना भी पुनर्रोपण में बाधक सिद्ध हुए हैं। प्रबंधन बगीचे के पुराने पौधों की जड़ों को पूर्ण रूप से निकालकर जला दें ताकि जैविक रोगजनकों तथा वृक्ष विषाणुओं के प्रभाव में कमी आ सके। नया गड्ढा पुराने वृक्षों के स्थान से थोड़ा दूर बनायें ताकि पुराने पौधों में विद्यमान विभिन्न प्रकार के जैविक कारकों के दुष्प्रभाव से बचा जा सके। नये पौधे लगाने के लिए 5×3 पुट आकार के गड्ढे खोदें और उन्हें एक महीने तक खुला रखें। नये पौधे लगाने से पहले गड्ढे की खोदी हुई मृदा को उपचारित कर लें। गड्ढों की मृदा का भौतिक (सूर्य की किरणों द्वारा) या रासायनिक (फॉरमेलिन) विधि द्वारा उपचार कर निर्जीवीकरण करें। उपचारित मृदा में गली-सड़ी गोबर की खाद या केंचुए की खाद मिलाएं। इसमें एक कि.ग्रा. सुपर फॉस्फेट व 200 ग्राम मेटासिड धूल मिलाकर इसे भूमि की सतह से 1-1.5 फुट की ऊंचाई तक भरें। गड्ढा भरने से पूर्व इसमें पत्ती जला दें ताकि गड्ढे में विद्यमान कीट, कीटाणु इत्यादि मर जाएं। गड्ढों की उपचारित मृदा के स्थान पर अच्छी कृषि मृदा में पूर्व वर्णित पदार्थों (गोबर की खाद, सुपरपफास्ट, मेटासिट धूल) का मिश्रण बनाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। स्वस्थ व मजबूत जड़ों वाले पौधे भरोसेमंद प्रमाणित पौधशाला से लेकर रोपण करें परंतु इससे पूर्व मृदा का पी.एच. 6.5 बनाएं, ताकि पोषक तत्वों का जड़ों द्वारा शोषण आसानी से हो सके। पुनर्रोपण समस्या प्रतिरोधी रूट स्टॉक्स जैसे-एम.-793, एम.-12, एम.-27, मैलस प्रूनीफोलिया, जी-65, जी-30, मैलेस बकाटा, मैलस जैन्थोकारपा व मैलस स्पैक्टोबिलिस पर पौधे तैयार करके रोपण की समस्या के प्रभाव से बचा जा सकता है। पौधों को लगाने के उपरांत घुलनशील खादों जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश (10:34:10 या 9:18:9) इत्यादि का 8-10 सप्ताह तक 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करने पर विशेष लाभ होता है तथा पौधों की वृद्धि व विकास भी अच्छे ढंग से होता है। पुनर्रोपण समस्या के लिए पौधे में लगातार माइकोराईजा फफूंद (गलोमस व गीगास्पोरा), ट्राइकोडर्मा व पौध बढ़ोतरी वाले जीवाणु का प्रयोग करने से इस समस्या का प्रभाव कम हो जाता है। कैंकर और डाइबैक रोग लक्षण पौधे तने, शाखा या टहनी पर धंसी छाल व अंदर की लकड़ी के विक्षत हुए भाग को कैंकर कहते हैं। यह घाव लकड़ी के भीतरी भाग तक तथा कई बार छाल तक ही सीमित रहता है। टहनियां व शाखाएं सिरे से शुरू होकर नीचे तक सूख जाती हैं। इसके फलस्वरूप पानी व खनिज पदार्थों इत्यादि का प्रवाह रुक जाता है। कैंकर सामान्यतः खुले रोगग्रस्त घावों से शुरू होता है तथा तने एवं छाल पर काले रंग के धंसे हुए या उभरे धब्बे दिखाई देते हैं। रोगग्रस्त पौधों की प्रभावित छाल कागजनुमा हो जाती है, जिससे कैंकर वाले भाग के ऊपर और नीचे के भाग सूख जाते हैं। अधिक संक्रमण की स्थिति में पौधे कुछ वर्षों के उपरांत मर जाते हैं। प्रबंधन बगीचों का प्रबंधन उचित ढंग से होना चाहिए जिसमें नियमित सिंचाई, खादों का संतुलित प्रयोग, सही कांट-छांट तथा कटे हुए घावों पर फफूंदनाशकों का लेप प्रमुख है। सर्दियों में कांट-छांट के समय रोगग्रस्त शाखाओं व टहनियों को काटकर जला दें तथा एक सें.मी. से बडे़ घाव पर चौबटिया का लेप करें। कैंकर के घाव को थोड़ा सा हरे भाग तक खुरचकर चौबटिया (कॉपर कार्बोनेट 800 ग्राम+लैड ऑक्साइड 800 ग्राम+अलसी का तेल 1.0 लीटर) या बोर्डो पेंट (नीला थोथा 1 भाग, चूना 2 भाग, अलसी का तेल 3 भाग) या चिकनी मृदा और गोबर का लेप बराबर मात्रा में मिलाकर लगा दें। फल तुड़ाई के बाद टूटी टहनियों व शाखाओं, गिरे व सड़े हुए फलों को एकत्रित करके नष्ट करें। कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या कॉपर हाइड्रोक्साइड (600 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी) का छिड़काव प्रतिवर्ष अवश्य करें। स्त्राेत : सतीश कुमार शर्मा, जोगिन्दर सिंह, जे.एन. शर्मा और अंजू शर्मा, डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश), खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)।