<h3 style="text-align: justify;">पत्ता धब्बा रोग</h3> <p style="text-align: justify;">गर्मियों के अंत में और बरसात में सेब के पत्तों के ऊपर विभिन्न रंग, आकृति और आकार के धब्बे प्रकट होते हैं। सेब की पत्तियों के ऊपर फफूंदों से पड़ने वाले ये धब्बे पौधशाला तथा बगीचों में लगभग एक समान दिखते हैं तथा उनकी उपस्थिति वातावरण में होने वाली परिस्थितियों पर निर्भर करती है। सेब की पत्तियों पर होने वाले इन धब्बों को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले प्रकार के धब्बों का रंग पत्तियों की शिराओं के मध्य में फीका धूसर (स्लेटी) होता है, जिनके मध्य में गहरे रंग का बिन्दु पाया जाता है। इसके अलावा कुछ धब्बे शिराओं के ऊपर, मध्यशिरा में तथा डंठल के ऊपर संकीर्ण, थोडे़ धंसे हुए तथा हल्के भूरे रंग के होते हैं। जैसे ही डंठल का संक्रमण अधिक होने लगता है तो पत्तियां पीली पड़कर झड़ना शुरू हो जाती हैं। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="255" height="204" /></p> <h4 style="text-align: justify;">आल्टरनेरिया पत्ता धब्बा रोग</h4> <p style="text-align: justify;">यह रोग सेब में होने वाले धब्बा रोगों में प्रमुख है। आल्टरनेरिया धब्बा रोग आल्टरनेरिया मॉली नामक फफूंद द्वारा उत्पन्न होता है, हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने इसके रोगजनक का जिक्र आल्टरनेरिया आल्टरनेटा से किया है। सर्वप्रथम हिमाचल प्रदेश के कोटगढ़ क्षेत्र में लगभग वर्ष 1968 में आल्टरनेरिया पत्ता धब्बा रोग के लक्षणों की पहचान हुई थी। रोग के लक्षण नये पत्तों पर 1 से 3 मि.मी. व्यास के भूरे लाल, गोल धब्बों के रूप में दिखते हैं, जिनके किनारे बैंगनी रंग के होते हैं। कई धब्बे मिलकर पत्ते को झुलस देते हैं। इसके उपरांत पत्ते झड़ जाते हैं। पत्तों की शिराओं और डंडियों पर भी भूरे व काले रंग के धब्बे बनते हैं, जिनके पश्चात ये पत्ते पीले पड़कर समय से पहले ही झड़ जाते हैं। यह रोग अधिकतर 25<sup>0</sup>-30<sup>0</sup> तापमान तथा ज्यादा नमी की स्थिति में होता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">नर्सरी में पत्तों का धब्बा/झुलसा रोग</h4> <p style="text-align: justify;">'माइकोस्फेईरैला' की प्रजातियां, 'आल्टरनेरिया माली', 'आल्टरनेरिया आल्टरनेटा', नियोथाइरियम पाइरिनम', फाइलोस्टिक्टा की प्रजातियां तथा 'बॉटरियोस्पफेईरा क्वैरकम' नामक फफूंद भी सेब की पत्तियों के ऊपर अलग-अलग प्रकार के धब्बा रोग फैलाते हैं। इनका प्रकोप मुख्य रूप से सेब की पौधशाला में देखा जा सकता है। प्रबंधन संक्रमित व रोगग्रस्त नीचे गिरे हुए पत्तों को इकट्‌ठा करके नष्ट कर देना चाहिए तथा सर्दियों में पौधों की कांट-छांट ठीक ढंग से करनी चाहिए। </p> <h4 style="text-align: justify;">प्रबंधन </h4> <ul style="text-align: justify;"> <li>संक्रमित व रोगग्रस्त नीचे गिरे हुए पत्तों को इकट्‌ठा करके नष्ट कर देना चाहिए तथा सर्दियों में पौधों की कांट-छांट ठीक ढंग से करनी चाहिए। </li> <li>स्कैब व असामयिक पत्ता झड़न रोगों की रोकथाम के लिए प्रयोग किए जाने वाले फफूंदनाशकों से भी यह रोग नियंत्राण में रहते हैं। </li> <li>अधिक रोग होने पर मेन्कोजैब (600ग्राम) या प्रोपीनेब (600 ग्राम), डोडीन (150 ग्राम) या डायफैनकोनाजोल (100 मि.ली.) का प्रति 200 लीटर पानी में घोल बनाकर मई से जुलाई में 3 सप्ताह के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करें। </li> <li> नर्सरी क्षेत्र में हैक्साकोनाजोल (100 मि.ली.) का प्रति 200 लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर 3 से 5 छिड़काव रोग के प्रकट होने के तुरंत बाद करना चाहिए। </li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">सूटी ब्लॉच और फ्लाईस्पैक रोग </h3> <p style="text-align: justify;">सूटी ब्लॉच को कज्जली धब्बा रोग भी कहा जाता है। यह रोग 'ग्लोओडियस पोमिजिना' नामक फफूंद से उत्पन्न होता है। इस रोग के कारण फल की सतह के ऊपर हल्के काले धूसर धब्बे बनते हैं जिनका साधारणतः 1/4 इंच का व्यास होता है। ये बाद में संगठित होकर अनियंत्रित आकार के धब्बे बनाते हैं। फफूंद, फल की सतह पर विद्यमान रहता है, जिसे अच्छी तरह से रगड़कर कुछ हद तक हटाया जा सकता है। कई बार हाईफी बाहरी सतह से घुसकर दरारें बना देती हैं। इस फफूंद के पीकनिडिया, ग्रसित पौधे में बहुत सारे बीज (कोनिडिया) बनते हैं, जो कि संक्रमण पैदा करते हैं। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/download2.jpg" width="214" height="278" /></p> <p style="text-align: justify;">इसके अलावा फ्लाई स्पैक रोग 'सिजोथिसियम पोमी' नामक फफूंद द्वारा उत्पन्न होता है। इस रोग से फलों पर सूक्ष्म काले दाग के समूह बनते हैं और मक्खी के फल पत्ता धब्बा रोग से संक्रमण फल पर सूटी ब्लॉच और फ्लाईस्पैक रोग का प्रकोप उत्सर्ग के समान दिखाई देते हैं। </p> <p style="text-align: justify;">बसंत ऋतु के मौसम में फफूंद, एस्कोस्पोर तथा केनिडिया दानों उत्पन्न करती है। ये प्रायः हवा से फैलते हैं। फ्लाई स्पैक इस फफूंद को फल स्यूडोथीसिया पैदा करने में सहायता प्रदान करता है तथा हाइफी की मदद से फल की सतह पर जुड़ा रहता है। दोनों रोग बरसात के मौसम में पनपते हैं तथा इनसे फलों की गुणवत्ता में काफी गिरावट आती है। अधिक नमी तथा 18<sup>0</sup> से 27<sup>0</sup> सेल्सियस के बीच का तापमान इन रोगों संक्रमण के लिए जरूरी है। </p> <h4 style="text-align: justify;">प्रबंधन </h4> <ul style="text-align: justify;"> <li>स्कैब रोग व असामयिक पत्ता झड़न नियंत्रण के लिए किए गए छिड़काव इन रोगों को रोकने में कारगर सिद्ध हुए हैं। </li> <li>रोग अधिक होने पर फल तोड़ने से लगभग 20 दिनों पहले जीरम 600 मि.ली. या कैप्टॉन 600 ग्राम या कार्बेडाजिम 100 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी का छिड़काव 15 दिनाें के अंतराल पर दो बार करें। </li> </ul> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : सतीश कुमार शर्मा, जोगिन्दर सिंह, जे.एन. शर्मा और अंजू शर्मा, डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश), खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)।</p>