ट्राइकोडर्मा की प्रजातियों को विविध कवक माइक्रोबियल समुदाय में शामिल किया जाता है। इन्हें जैव नियंत्रण और पादप विकास को बढ़ावा देने के प्रमुख एजेंट के रूप में उनके बहुमुखी विकास के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इनका व्यापक रूप से एंजाइमों के स्रोत के रूप में कई उद्योगों में उपयोग किया जाता है। अनुसंधान समूह बड़ी संख्या में ट्राइकोडर्मा की विविधता, पारिस्थितिकी और उनके अनुप्रयोगों के विभिन्न पहलुओं पर काम कर रहे हैं। भारत में लगभग 110 विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के प्रतिनिधि समूह ट्राइकोडर्मा की 15 विभिन्न प्रजातियों पर काम कर रहे हैं। इस बारे में लगभग 460 शोधपत्र प्रकाशित किए जा चुके हैं। ट्राइकोडर्मा हार्जियानम और ट्राइकोडर्मा विरिडी व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली प्रजातियां हैं। इन प्रजातियों का 87 प्रकार की फसलों, लगभग 70 मृदाजनित रोगजनकों और 18 पत्ती रोगजनकों पर उपयोग किया गया। प्रस्तुत लेख विभिन्न अनुसंधान दलों के शोध और देश में इसके अलावा महत्वपूर्ण कृषि फसलों पर ट्राइकोडर्मा के उपयोग की स्थिति को दर्शाता है। इसके अलावा किसानों द्वारा ट्राइकोडर्मा ऑन-फार्म उत्पादन की सस्ती एवं सरल विधियों के बारे में भी बताता है। पादप रोग दुनिया भर में खेती की प्रमुख समस्याओं में से एक हैं, जिनके कारण अरबों डॉलर की कृषि उपज का नुकसान होता है। दुनिया की लगातार बढ़ती आबादी के लिए बाजार की उपज की एक स्थिर और निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु इन पादप रोगों को नियंत्रित करने की आवश्यकता है। रोग प्रबंधन के क्रम में रसायनों के बढ़ते उपयोग ने पर्यावरण गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव डाला है और इसके कारण कई जीवित स्वरूपों का उदय हुआ है, जो रसायनों के लिए प्रतिरोधी हैं। विभिन्न प्रकार के वैकल्पिक दृष्टिकोणों पर भी विचार किया गया है, जिनमें जैविक नियंत्रक कारकों का उपयोग शामिल है। जैविक नियंत्रक ट्राइकोडर्मा प्रजातियों का व्यापक रूप से पौधों के रोगजनकों की एक विस्तृत श्रृंखला के खिलाफ मायकोपरसेटिज्म का प्रदर्शन करने वाले फसल पौधों के कवक रोगों के प्रबंधन में उपयोग किया जाता है। एक महत्वपूर्ण मूल्यांकन से पता चला है कि इनका उपयोग मृदा संबंधी रोगों के खिलाफ भी बहुत सफल रहा है। इसके लिए पौधों में प्रतिरोधी स्रोतों की पहचान नहीं की गई है। बीज या मृदा अनुप्रबीज या मृदा अनुप्रयोग द्वारा कई रोगों के खिलाफ उनकी जैविक नियंत्रण क्षमता का पता लगाया गया है। इससे उनकी प्रभावशीलता का पता चलता है कि क्या ये जैविक नियंत्रक फसल पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करते हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि राइजोबैक्टीरिया के समान, ट्राइकोडर्मा प्रजातियों को पादप विकास को बढ़ावा देने वाले एजेंट के रूप में भी शामिल किया गया है। इस प्रकार यह एकीकृत रोग प्रबंधन (आईडीएम) प्रणालियों में एक पसंदीदा इनपुट के रूप में स्थापित हुआ है। पादप रोगों को नियंत्रित करने के लिए इन-विट्रो और इन-विवो राइजोबियम-ट्राइकोडर्मा की परस्पर अभिक्रिया का जैव रासायनिक एजेंटों के साथ उर्वरकों या जड़ी-बूटियों के एकीकरण के साथ अध्ययन किया गया। ट्राइकोडर्मा प्रजाति के आइसोलेट्स में जैविक नियंत्रण, कीटनाशकों के प्रति अनुकूलता क्षेत्रीय प्रदर्शन, राइजोस्फेरिक क्षमता जैसी भिन्नता भी देखी गई। ट्राइकोडर्मा प्रजातियों के खिलाफ अलग-अलग कीटनाशकों की जांच में, कम जोखिम वाले कीटनाशक कैप्टॉन और मैन्कोजेब, मध्यम जोखिम वाले बेनोमिल, ईप्रोडिओन, थीरम, पेंडिमेथलीन और उच्च जोखिम वाले कार्बेन्डाजिम और क्लोरोपायरीफॉस की पहचान की गई। इस समीक्षा लेख में पिछले दो दशकों से कई शोध समूहों द्वारा प्राप्त महत्वपूर्ण उपलब्धियों को दर्शाते हुए देश में विभिन्न प्रकार के रोगजनकों पर ट्राइकोडर्मा के प्रभाव एवं उपयोग को शामिल किया गया है। सब्जी फसलें टमाटर, बैंगन और शिमला मिर्च के रोगों के प्रबंधन में ट्राइकोडर्मा हार्जियानम या स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस से बीज तथा जड़ उपचार का संयोजन प्रभावी पाया गया। टमाटर, भारत के लगभग सभी भागों में उगाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण फसल है। ये फसलें कुछ रोगों के लिए अतिसंवेदनशील हैं जैसे कि फाईटोफ्थोरा आइनफेसटेंस के द्वारा पछेती झुलसा (लेट ब्लाईट) रोग, आल्टरनेरिया सोलनी द्वारा अगेती झुलसा (अर्ली ब्लाइट) रोग, फ्यूजेरियमऑक्सीस्पोरम एफ.एसपी. ल्यूकोपरसिकी की वजह से जड़ गलन तथा विगलन रोग, पीथियम अफनीड्र्मतम के कारण डम्पिंग ऑफ रोग, स्क्लेरोसियमरोल्फ्सी, बैक्टीरियल लीफ धब्बे और राल्स्टोनिआ सॉलानेयरम के कारण बैक्टीरियल विल्ट। उनमें से रोगजनक कवक या रोगजनकों के कारण होने वाले रोग, प्रबंधन के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य बने हुए हैं। ट्राइकोडर्मा हार्जियानम, ट्राइकोडर्मा पॉलीस्पोरम, ट्राइकोडर्मा विरेनस और ट्राइकोडर्मा विरिडी जैसी कई प्रजातियों के उपयोग ने न केवल रोग की घटनाओं को कम किया बल्कि सब्जियों की पैदावार को भी बढ़ाया जा सका। कुछ शोध में पाया गया कि ट्राइकोडर्मा आइसोलेट्स द्वारा टमाटर के कॉलर रॉट के नियंत्रण में, ट्राइकोडर्मा हार्जियानम एवं स्क्लेरोसियम रॉल्फ्सी के लिए सबसे अधिक निरोधात्मक था। यह रोगजनक के मायसेलियल विकास का 61.5 प्रतिशत तक निषेध दर्शाता है। प्याज के रोग एवं जैव नियंत्रण प्याज, भारत की एक महत्वपूर्ण सब्जी फसल है। इसे छह प्रमुख रोग, जैसे कि आल्टरनेरिया अल्टरनेटा, जिसके कारण प्याज का फोलियर ब्लाइट रोग; आल्टरनेरिया पोरी प्याज के बैंगनी रंग के धब्बे का कारण; फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम एफ.एसपी. केए और पीथियम प्रजाति के कारण डम्पिग ऑफ रोग; स्क्लेरोसियम रोल्फ्सी द्वारा सफेद सड़ांध और अस्पर्जिलस नाइजर द्वारा काले मोल्ड संक्रमित करते हैं। प्याज के बैंगनी धब्बे का आल्टरनेरिया पोरी रोगजनक है, जिसके नियंत्रण के लिए व्यापक रूप से अध्ययन किया गया है। ट्राइकोडर्मा हार्जिनियम अर्थात टीएच-3 और टीएच-30, ट्राइकोडर्मा विरिडी अर्थात टीवी-12 और टीवी-15 के प्रभावी आइसोलेट्स, अतिसंवेदनशील ऑयन रोग में कमी और विकास को बढ़ावा देने के लिए अधिसूचित किए गए हैं। फोलियर ब्लाइट के जैविक प्रबंधन और समेकित रोग प्रबंधन (आईडीएम) के लिए भी इन ट्राइकोडर्मा प्रजातियों के आइसोलेट्स को रिपोर्ट किया गया है। पौधों के अर्क, जैव एजेंटों और फफूंदनाशकों का प्याज के बैंगनी ब्लॉट और स्टैमफिलियम ब्लाइट के खिलाफ मूल्यांकन किया गया और पाया गया कि ट्राइकोडर्मा विरिडी रोगजनक के विकास को बाधित करने में प्रभावी रहा। इन-विट्रो अध्ययनों से पता चला है कि ट्राइकोडर्मा हार्जियानम आइसोलेट्स ने पीथियम अपहानिर्मटम की वृद्धि को 50 प्रतिशत तक रोका और क्रमशः बाविस्टिन, कैप्टॉन और वेजफुगार्ड के साथ संगत पाया। टमाटर और फूलगोभी में स्टॉक रॉट रोग के रोगजनक स्क्लेरोटिनिआ स्केलेरोटियम के प्रणालीगत प्रतिरोध में ट्राइकोडर्मा प्रजातियों की अहम भूमिका रही। प्रणालीगत प्रतिरोध के अधिष्ठापन में ट्राइकोडर्मा विरिडी की तुलना में ट्राइकोडर्मा हार्जियानम को ज्यादा प्रभावी पाया गया। टमाटर और फूलगोभी में ट्राइकोडर्मा प्रजातियों के समान प्रभाव ने इस बात की पुष्टि की है कि पौधे की रक्षा में जैविक नियंत्रण की भी उपयोगी भूमिका हो सकती है। टमाटर के डम्पिंग ऑफ रोग में प्रतिपक्षी के प्रभाव का व्यापक रूप से अध्ययन किया गया था। ट्राइकोडर्मा विरिडी और स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस के अनुप्रयोग ने प्रभावी रूप से पॉट कल्चर प्रयोगों के तहत पी1 अपहानिर्मटम के कारण टमाटर के पूर्व उद्भव और उद्भव के बाद की स्थितियों की जांच की। इसी तरह, टमाटर के मुरझान रोग के खिलाफ भी जैव पदार्थों और पौधों के पोषक तत्वों के व्यावसायिक और प्रयोगशाला योगों का मूल्यांकन किया गया। टमाटर में डम्पिंग ऑफ रोग के नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा हार्जियानम स्ट्रेन एम 1 के वाहक आधारित सूत्रीकरण विकसित किया गया। ट्राइकोडर्मा एसपीपी 1 की बायोकन्ट्रोल क्षमता की सब्जियों की फसलों के महत्वपूर्ण मृदा रोगों के खिलाफ समीक्षा की गई। फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरमएपफ.एसपी. लाइकोपर्सिसी के कारण टमाटर के जड़ गलन तथा विगलन रोग के प्रबंधन के लिए जैव विज्ञान और जैविक संशोधनों का उपयोग भी किया जा सकता है। बैंगन देश की सबसे अधिक उगाई जाने वाली सब्जी फसलों में से एक है। आल्टरनेरिया सोलानी, फ्यूजेरियम सोलानी, कोलेटोट्रिकम ग्लियोस्पोरियोइड्स, बी। सिनेरिया, पेनीसिलियम एसपी, राइजोपस नाइगर, कर्वुलेरिया लुनेटा और बोट्र्योडिप्लोडिया थियोब्रोमे इसके महत्वपूर्ण रोगजनक हैं। ये पूरे वर्ष फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। स्क्लेरोशियम रोल्फ्सी की वजह से कॉलर रॉट के पर्यावरण हितैषी प्रबंधन का अध्ययन किया गया और पाया गया कि ट्राइकोडर्मा विरिडी रोगों को कम करने में सबसे अधिक प्रभावी है। इसी तरह बैंगन के लीफ धब्बे रोग के खिलाफ कई शोधकर्ताओं द्वारा ट्राइकोडर्मा का उपयोग करके रोग प्रबंधन किया गया, जहां इन-विट्रो और इन-विवो की परिस्थितियों में अर्क और जैव नियंत्रण एजेंट के उपयोग का मूल्यांकन किया गया था। एक अन्य अध्ययन में, ट्राइकोडर्मा हार्जियानम के कन्सोर्शियम के प्रभाव को स्क्लेरोटिनिआ स्क्लेरोटियोरम द्वारा उत्पन्न रोग की वृदधि विशेषताओं और प्रबंधन पर अध्ययन किया गया। कार्यप्रणाली तकनीक ट्राइकोडर्मा की ऑन-फार्म उत्पादन (ओएफपी) पद्धि सरल और कम लागत वाली है। मास्टर ट्रेनरों के माध्यम से किसानों के बीच एनआईपीएचएम द्वारा 2013 से क्रमिक रूप से प्रचार किया जा रहा है। इस पद्धति में सरल चरणों का पालन करना शामिल हैः ऑटोकैलेबल बैग (7'') (B) × 11'' H) में लगभग 200 ग्राम अनाज लें और बराबर मात्रा में पीने योग्य पानी डालें। बैग भरने के बाद, बैग के मुंह के शीर्ष पर 1.5'' इंच का पीवीसी पाइप रखें और इसे रबर बैंड से बांध दें। बंद पीवीसी पाइप के खुले मुंह को बंद करें। बंद करने के लिए रूई के प्लग का उपयोग करें। दानों से भरे बैग को 10-20 लीटर प्रेशर कुकर में एक-तिहाई पानी से भरकर पानी के साथ 40 मिनट तक उबालें। धीमी आंच पर उबलने के बाद बैग को कमरे के तापमान पर ठंडा किया जाना चाहिए। एक लकड़ी के इनोक्यूलेशन चैम्बर या कक्ष में बैग को स्थानांतरित करें। लगभग 5 से 10 मिनट तक इनोक्यूलेशन चैम्बर बंद करने के बाद स्पिरिट लैम्प/कैंडल जलाया जाना चाहिए। कक्ष के अंदर प्रत्येक बैग में इनोक्यूलेशन लूप/स्पैटुला की मदद से 1-2 ट्राइकोडर्मा मदर कल्चर के छोटे टुकड़़े बैग में स्थानांतरित करें। सभी अनाज पर कवक संवर्ध्द को मिलाने के लिए बैग को अच्छी तरह से हिलाएं। सभी बैगों को कमरे में 250 से 300 सेल्सियस तापमान पर रखें। कवक वृद्धि के लिए निरीक्षण करें और बैगों को बारबार हिलायें नहीं। एक बार जब ट्राइकोडर्मा के बीजाणु बनने लगते हैं, तो दानों का रंग हरा हो जाता है। इस अवस्था में ट्राइकोडर्मा का अच्छा विकास और आगे बीजाणुओं को फैलाने में के लिए लगभग 5 से 7 दिनों के लिए हर वैकल्पिक दिनों में बैग को हिलाएं। दानों पर पूरी तरह से विकसित ट्राइकोडर्मा कवक वृद्धि और बीजाणुओं के साथ साफ प्लास्टिक ट्रे में स्थानांतरित करें और इसे ब्लोटर/अखबार के साथ कवर करें। कमरे के तापमान पर लगभग 3-4 दिनों के लिए इन प्लास्टिक ट्रे को और अधिक बीजाणुओं की वृद्धि और सुखाने के लिए रखें। स्थानांतरण और सुखाने को बढ़ाने के लिए स्पैटुला की मदद से 3-4 दिनों तक रोजाना एक बार स्थानांतरित ट्राइकोडर्मा उपनिवेशित अनाज को मिलाएं। यह सूखा ट्राइकोडर्मा पाउडर पिसे हुए महीन चूर्ण के रूप में बीज उपचार उपयोग के लिए तैयार होगा। ट्राइकोडर्मा ग्रेनुल्स इसी अवस्था में मृदा के लिए खाद में मिलाकर प्रयोग करें। एक कि.ग्रा. ज्वार के दानों से ट्राइकोडर्मा के लगभग 500 ग्राम सूखे ट्राइकोडर्मा के कवक एवं बीजाणु (बायोमास) का उत्पादन किया जा सकता है, जिसे 100 कि.ग्रा. अच्छी तरह से विघटित खाद या फार्म यार्ड खाद (एफएमवाई) में मिलाने के बाद सीधे एक हैक्टर के लिए मृदा में इस्तेमाल किया जा सकता है। सूखे बायोमास पाउडर के साथ 0.5 प्रतिशत कार्बोक्सी मिथाइल सेलुलोज (सीएमसी) बीज उपचार/10 ग्राम/कि.ग्रा. बीज के लिए उपयोग किया जा सकता है। फलदार फसलें अमरूद में कटाई से पूर्व के रोग जैसे कि कैंकर, डाई बैक, फल गिरावट आदि पौधे की वृद्धि और उत्पादन को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा फाइटोफ्थोरा, मैक्रोफोमिना और कई अन्य कीट फसल कटाई के बाद फलों को खेत, भंडारण और संक्रमण में खराब कर देते हैं। ग्लिओकलडियम रोसेयम भी फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम एफ.एसपी. पिसडी और फ्यूजेरियम सोलानी के अलावा सबसे शक्तिशाली रोगजनक के रूप में जाना जाता है। पादप रोग प्रबंधन के लिए जैविक नियंत्रण प्रौद्योगिकी के आगमन के साथ कई शोधकर्ताओं ने अमरूद जैसे फलों के रोगों का मुकाबला करने में ट्राइकोडर्मा तकनीक का मूल्यांकन और उपयोग करने का प्रयास किया। एक अध्ययन में बायोफर्टिलाइजर अर्थात ट्राइकोडर्मा (250 ग्राम) स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस (250 ग्राम) की संस्तुति की गई। उर्वरक की आधी खुराक के साथ एफवाईएम को गुणवत्ता वाले अमरूद फलों के उत्पादन के लिए एक अच्छा दृष्टिकोण माना गया। अलग-अलग नियंत्रण उपायों को एकीकृत करने के लिए ट्राइकोडर्मा और अन्य बायो एजेंट को विगलन रोग और उपयोग के लिए विशेष संदर्भ के साथ अमरूद की कई पूर्व-कटाई रोगों पर प्रभावी पाया गया। चीकू में जैव कीटनाशियों का प्रभाव चीकू पूरे भारत में बागवानी किए जाने वाले खाद्य फलों में से एक है। पांच ट्राइकोडर्मा प्रजातियों की प्रतिपक्षी क्षमता जो कि ट्राइकोडर्मा विरिडी, ट्राइकोडर्मा हार्जियानम, ट्राइकोडर्मा कोनिंगी, ट्राइकोडर्मा सूडोंकोनिंगी और ट्राइकोडर्मा वीरेंस का परीक्षण प्रयोगशाला परिस्थितियों में चीकू के फलों के रस रोगजनकों के खिलापफ किया गया था। इस अध्ययन के परिणामों में ट्राइकोडर्मा कोनिंगी और ट्राइकोडर्मा स्यूडोंकोनिंगी ज्यादा प्रभावी साबित हुए। ट्राइकोडर्मा प्रयोग विधि बीज उपचार बुआई से पहले प्रति कि.ग्रा. बीज में 4-10 ग्राम पाउडर मिलाएं। नर्सरी उपचार नर्सरी क्यारी में प्रति 100 मीटर पर ट्राइकोडर्मा पाउडर के 10-25 ग्राम का प्रयोग करें। उपचार से पहले नीम केक और सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग प्रभावकारिता बढ़ाता है। कटिंग और पौध उपचार 100 ग्राम अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति लीटर पानी के साथ ट्राइकोडर्मा पाउडर के 10 ग्राम में मिलाकर रोपण से पहले 10 मिनट के लिए डुबोएं। रोपण मृदा उपचार हरी खाद के लिए मृदा में ढैंचा को मिलाने के बाद ट्राइकोडर्मा पाउडर मिलाएं या 100 कि.ग्रा. खाद में ट्राइकोडर्मा फॉर्मूलेशन 1 कि.ग्रा. मिलाएं और इसे पॉलीथीन के साथ 7-10 दिनों तक कवर करें। इसे पानी के साथ छिड़कें। मिश्रण को हर 3-4 दिनों के अंतराल में घुमाएं और फिर मैदान में प्रसारित करें। पौधे का उपचार 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर के साथ एक लीटर पानी में मिश्रित स्टेम क्षेत्र की मिट्टी उपचारित करें। (फसल के अनुसार और वैज्ञानिक चर्चा के साथ खुराक बदल सकते हैं)। आम में कीटों एवं रोगों पर नियंत्रण आम का कई रोगजनकों के कारण बेहद आर्थिक नुकसान होता है जैसे कि फ्यूजेरियम मोनिलिफॉर्म प्रजाति सबग्लूटिनस आम की विकृति के रोग को बायोकन्ट्रोल की मदद से कुछ शोधकर्ता समूहों द्वारा विभिन्न रोगजनकों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया और उनमें से कई शोधकर्ता दलों द्वारा सफल पाया गया। इसी तरह एक अन्य इन-विट्रो अध्ययन में, आम के बागों से पृथक ट्राइकोडर्मा हार्जियानम की प्रतिपक्षी क्षमता का परीक्षण दो महत्वपूर्ण मृदाजनित रोगजनकों, रिजोक्टोनिआ सोलनी और स्क्लेरोसियम रॉल्फ्सी के खिलाफ किया गया। ट्राइकोडर्मा को आम के अल्फिसोल किस्म में स्क्लेरोसियम रॉल्फ्सी की रोकथाम में 44.67 से 47.88 तक प्रतिशत परिणाम मिले। ट्राइकोडर्मा का प्रयोग ट्राइकोडर्मा सभी प्रकार के अनाज, फल, सब्जियों जैसे-फलूगोभी, कपास, तंबाकू सोयाबीन, गन्ना, बैंगन, केला, टमाटर, मिर्च, आलू, नीबू, प्याज, मूंगफली, मटर, सूरजमुखी, बैंगन, कॉफी, चाय, अदरक, हल्दी, काली मिर्च, बेटेल बेल, इलायची आदि पर रोग नियंत्रण में सबसे उपयोगी है। ट्राइकोडर्मा ऑन-फार्म उत्पादनकी सस्ती एवं सरल विधि ऑन-फार्म उत्पादन इकाई की स्थापना उपकरण, कच्चे माल सहित बुनियादी ढांचे की आवश्यकताः किसानों के लिए जैव कीटनाशक प्रौद्योगिकी के बेहतर वितरण को सुनिश्चित करने के लिए ओएफपी तकनीक विकसित की गई है। ओएफपी इकाई की स्थापना के लिए अनुमानित लागत लगभग 2 लाख रुपये (आवर्ती और गैर लागत) आती है। इसके लिए एक बंद और अलग कमरे की आवश्यकता होती है जहां ट्राइकोडर्मा का उत्पादन करने के लिए 250 से 300 सेल्सियस तापमान बनाए रखा जा सके। 10×10 फीट के कमरे में ऑन-फार्म प्रोडक्शन यूनिट की स्थापना के लिए निम्नलिखित सामग्रियों की आवश्यकता होती हैं: लकड़ी का टीका चैंबर; गैस चूल्हा; प्रेशर कुकर; मिक्सर ग्राइंडर; प्लास्टिक ट्रे; ट्राइकोडर्मा एसपीपी का मातृ कल्चर; कच्चा माल जैसे कि ज्वार/ बाजरा/गेहूं/चावल/मक्का आदि के दाने स्वायत्त पॉलीप्रोपीलाइन बैग; पीवीसी पाइप के छोटे टुकड़़े; रबर बैंड; रूई; मोमबत्ती/स्प्रिट दीपक; इनोक्यूलेशन लूप/स्पैटुला; ब्लोटर पेपर/न्यूज पेपर; कार्बोक्सी मिथाइल सेलुलोज; पैकिंग पॉलीथीन बैग; सीलबंद करने वाला यंत्र पादप रोगजनकों के जैविक नियंत्रण की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि जैव नियंत्रण एजेंटों का तेजी से बढ़ना और उपनिवेशण के दौरान अपने अस्तित्व के प्रभावी योगों की उपलब्धता सुनिश्चित करना। ट्राइकोडर्मा की विभिन्न प्रजातियां कई प्रकार के एंजाइमों को पैदा करने के लिए जानी जाती हैं। एंजाइम जैव नियंत्रण गतिविधियों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसे कि कोशिका डिग्रेडेशन, जैविक और अजैविक तनाव सहिष्णुता, हाइफल विकास, पादप रोगजनकों के खिलाफ विरोधी गतिविधियां इत्यादि। आण्विक जीव विज्ञान द्वारा हम आसानी से कवकों के जीनों को निष्कर्षित कर सकते हैं, उनकी विशेषताएं पता कर सकते हैं, उन्हें क्लोन किया जा सकता है और इन जीनों के कार्य व्यक्त करने एवं जैव नियंत्रण तंत्र में उनके कार्यों और भूमिका का अध्ययन कर सकते हैं। रोग नियंत्रण यह एक शक्तिशाली बायोकंट्रोल एजेंट है। विभिन्न प्रजातियों को कई प्रकार के रोगजनक कवकों जैसे-फ्यूजेरियम, फाइटोफ्रथोरा स्क्लेरोटिनिआ, रिजोक्टोनिआ, पीथियम के विरुद्ध सफलतापूर्वक बड़़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। प्लांट ग्रोथ प्रमोटर ट्राइकोडर्मा स्ट्रेन, फॉस्फेट और सूक्ष्म पोषक तत्वों को घुलनशील बनाता है। घास जैसे पौधों के साथ ट्राइकोडर्मा उपभेदों का उपयोग गहरी जड़ों की संखया में वृद्धि करता है, जिससे सूखे का प्रतिरोध करने की पौधे की क्षमता बढ़ जाती है। रोग के बायोकैमिकल एलिसिटर ट्राइकोडर्मा उपभेद पौधों में प्रतिरोध को प्रेरित करने के लिए जाने जाते हैं। ट्राइकोडर्मा उत्पादित यौगिकों के पौधों में प्रतिरोध प्रेरित करते हैं। ये यौगिक पौधे की खेती में ईथिलीन उत्पादन, अतिसंवेदनशील प्रतिक्रियाओं और अन्य रक्षा संबंधी प्रतिक्रियाओं को प्रेरित करते हैं। ट्रांसजेनिक पौधे ट्राइकोडर्मा से एंडोचिटिनस जीन के समावेशन तम्बाकू और आलू जैसे पौधों में फंगल विकास के प्रतिरोध में वृद्धि हुई है। चयनित ट्रांसजेनिक लाइनें फोलर रोगजनकों जैसे-अल्टरनेरिया अलटरनाटा, अल्टरनेरिया सोलानी और बोट्यूटिस कीनेरेय के साथ-साथ मृदा से उत्पन्न रोगजनक, राइजेक्टोनिया के लिए अत्यधिक सहनशील होती है। उनके पास कीटनाशकों की एक विस्तृत श्रृंखला को अपनाने की क्षमता है जैसे-ऑर्गोक्लोरीन, ऑर्गनोफॉस्फेट और कार्बोनेट्स। बायोरेमेडिएशन ट्राइकोडर्मा उपभेद मृदा के बायोरेमेडिएशन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो कीटनाशकों और जड़ी-बूटियों से दूषित होते हैं। स्त्राेत : प्रतिभा शर्मा, एमेरिटस वैज्ञानिक, प्लांट पैथोलॉजी संभाग, श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर (जयपुर) सतीश कुमार सैन वरिष्ठ वैज्ञानिक, पादप रोग विज्ञान, भाकृअनुप-केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, क्षेत्राीय स्टेशन, सिरसा (हरियाणा) शैली जवेरिया बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, खेती पत्रिका।