<h3 style="text-align: justify;">रोगकारक</h3> <p style="text-align: justify;">कालेट्रोइकम फाल्केटम-नामक इस रोग की कारक फफूंद गन्ने के पौधों और मृदा दोनों में जीवित रह सकती है। पेड़ी की फसल में मृदा एवं ठूंठों पर रोगाणु रह जाने के कारण यह रोग फैलता है। प्रायः यह रोगी फसल का बीज प्रयोग करने से अधिक फैलता है। इसके अलावा यह रोग सिंचाई के पानी, कीटों एवं खरपतवारों की अधिकता, जल निकास का उचित प्रबंध न होना एवं एक ही किस्म का गन्ना लगातार एक ही खेत में उगाने से भी यह रोग फैलता है। यह रोग भारत के लगभग सभी गन्ना उत्पादक प्रदेशों में पाया जाता है। इस रोग की महामारी उत्तरी भारत विशेषतया उत्तर प्रदेश तथा बिहार में 1939-40 और 1946-47 में आ चुकी है। लाल सड़न रोग के कारण गन्ने की अनेक उन्नतशील प्रजातियों का ह्रास होता जा रहा है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccdownload_(1).jpg" width="190" height="250" /></p> <h3 style="text-align: justify;">रोग फैलने का समय </h3> <p style="text-align: justify;">इस रोग की फफूंद सामान्यतः जुलाई से जनवरी तक क्रियाशील रहती है, परंतु अगस्त से दिसंबर में सर्वाधिक क्षति पहुंचाती है। यह फफूंद भूमि में 5-6 माह तक ही जीवित रह पाती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">क्षति करने का तरीका एवं लक्षण </h3> <p style="text-align: justify;">लाल सड़न रोग गन्ने के किसी भी वानस्पतिक भाग को प्रभावित कर सकता है। पत्ती की मध्यशिरा पर भी इसका स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। प्रारंभिक अवस्था में इस रोग की पहचान में थोड़ी कठिनाई होती है। वर्षा ऋतु के बाद जब गन्ने में मिठास बढ़ने लगती है तब इसके लक्षण प्रकट होते हैं। </p> <p style="text-align: justify;">सर्वप्रथम ऊपरी 2-3 पत्तियों का हरापन क्षीण होने लगता है तथा वे नीचे की ओर झुकने लगती हैं। पत्ती का सूखना किनारे से आरंभ होकर मध्यशिरा की ओर बढ़ता है तथा अंततः पूरी पत्ती सूख जाती है तब गन्ने की वृद्धि रुक जाती है। रोगग्रस्त गन्ने की पोरियों का रंग लाल या बैंगनी होने लगता है। गन्ने की प्रजाति की रोग ग्राह्‌यता तथा मौसम पर यह निर्भर करता है कि गन्ने के अंदर रोग का विकास कितनी मात्रा में तथा किस गति से होगा। रोग की सही पहचान तभी संभव है जब गन्ने के तने को लंबाई से चीरकर देखा जाए तब गन्ने के अंदर का भाग लाल रंग का दिखाई देता है। इसमें थोड़ी दूर पर सफेद क्षेत्रों की पटि्‌टयां दिखाई देती हैं। रोगी भागों से शराब जैसी दुर्गन्ध आती है। यह इस रोग की प्रमुख पहचान है। </p> <p style="text-align: justify;">इसके बाद पूरे तने पर रोग के लक्षण प्रकट होते हैं। गन्ने का छिलका सूखकर सिकुड़़ जाता है, छिलका अंदर की ओर धंसने लगता है तथा उसके ऊपर लंबाई में झुर्रियां पड़ जाती हैं। पिथ के सूखने से गन्ना अंदर से खोखला हो जाता है। इसमें सफेद या राख के रंग के कवक जाल भर जाते हैं। गांठों के नजदीक ऊपर व नीचे काले रंग की फफूंद की बिन्दियां पायी जाती हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : एस.एन. सिंह और आशीष कुमार, प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष, पाैधा राेग विभाग ,सहायक प्राध्यापक, पाैधा राेग विभाग, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर(मध्यप्रदेश),खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)</p>