फैलने के संभावित कारण यह लाल सड़न रोग के साथ महामारी पैदा करता है। इसके अतिरिक्त गन्ने के कीट जैसे तनाबेधक, पपड़ी कीट (स्केल इन्सेक्ट) आदि के साथ भी पाया जाता है। गन्ने में उकठा रोग के कारणों के बारे में वैज्ञानिकों में मतभेद है। यह रोग एक या दो प्रकार की फफूंदों, फ्यूजेरियम की प्रजाति या सेफेलोस्पोरियम की प्रजाति द्वारा उत्पन्न होता है। यह फफूंदी मृदा में कुछ समय तक जीवित रह सकती है। रोग तभी फैलता है, जब गन्ना किन्हीं कारणों से कमजोर हो जाता है। गन्ने के कमजोर होने के संभावित कारण निम्नलिखित हैं: लाल सड़न रोग का प्रकोप। कीटों का प्रकोप। पौधों के लिए उचित पानी का प्रबंध न होना। मृदा में पोषक तत्वों की कमी। उचित जल निकास का न होना। रोग फैलने का तरीका एवं लक्षण वर्षा ऋतु के बाद इस रोग के लक्षण स्पष्ट होते हैं। यह अक्टूबर-नवंबर में गन्ने में अधिक क्षति पहुंचाता है। उकठा रोग से संक्रमित गन्ने अकेले या समूह में बौने (स्टान्टिड) दिखाई पड़ते हैं। अगोले की पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती हैं व पौधे की वृद्धि रुक जाती है। साधारणतः उकठा एवं लाल सड़न रोग साथ ही देखा जाता है तथा इसके लक्षण भी समान ही होते हैं। इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में यदि गन्ने को चीरकर देखा जाये तो इसके अंदर का भाग लाल या बैंगनी दिखाई देगा तथा निचली गांठों का ऊपरी एवं चीरा हुआ भाग ईंट के रंग का दिखाई देता है। इसमें लाल सड़न की तरह चकत्ते नहीं होते। इस रोग से गन्ने के छिलके पर भूरे धब्बे बन जाते हैं। गन्ने के अंदर खोखले भाग में रोग पैदा करने वाली फफूंद के तार दिखाई देते हैं। कभी-कभी इस रोग के कारण गन्ने का सिरा नहीं सूखता है। अंदर के भाग में भी लाल रंग पैदा नहीं होता, ऐसी अवस्था में केवल कुछ ही रेशे लाल रंग के होते हैं। इसमें अंदर से लाल सड़न से भिन्न प्रकार की दुर्गन्ध आती है। इस रोग से पत्तियां तो सूखती हैं, पौधा भी मुरझा जाता है तथा पौधों की बढ़वार रुक जाती है। गन्ना रोगों का प्रबंधन ऊष्मा उपचारित बीज लगाने से इन रोगों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यह बीज गन्ना अनुसंधान केन्द्र, सीहोर, जावरा बागवई (डबरा) तथा प्रदेश के सभी कारखाना प्रक्षेत्रों में भी मिल सकता है। नम गर्म हवा संयंत्र में गन्ने को 540 सेल्सियस तापमान पर 4 घंटे तक भापयुक्त वातावरण में उपचारित करते हैं, जिसमें इन रोगों के फफूंद, जीवाणु, विषाणु आदि नष्ट हो जाते हैं। गर्म जल एवं भाप से भी बीजोपचार किया जाता है। जिन खेतों में रोगों की उपस्थिति का अंदेशा हो उस खते की फसल से बीज कदापि न लें। बड़े किसान अपनी जरूरत के मुताबिक बीज के लिए अलग खेत में गन्ना उगायें। प्रमाणित एवं स्वस्थ बीज ही बोयें। फसल की निराई-गुड़ाई करें एवं खरपतवारों को नष्ट करते रहना चाहिए। कीट एवं चूहों की भी रोकथाम करनी चाहिए। कमजोर और रोगी पौधों को, यदि उनकी अधिकता न हो तो, निकालते रहना चाहिए। कंडुआ रोग हो तो पौधों को सावधानीपूर्वक निकालते रहें। रोगों की प्रतिरोधी उन्नत प्रजातियों को लगायें। फसल में नाइट्रोजन पोषक तत्वों एवं पानी की कमी नहीं होने देना चाहिए। खेत में जल निकास का उचित प्रबंध करें। फसलचक्र अपनायें। खेत के आसपास रोगों के रोगकारकों को नष्ट करने के लिए सफाई रखें। गन्ना काटने के औजारों को साफ रखें। गन्ने के खेत की उचित देखभाल तथा उपयुक्त कृषि क्रियाएं करनी चाहिए। गन्ने के खेत के आसपास ज्वार, मक्का इत्यादि फसलों पर इसी प्रकार के उपाय किए जायें। फफूंदनाशकों द्वारा उपचार हमेशा गन्ना लगाते समय करना चाहिए। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि मिट्टी एवं पोरियों में पाये जाने वाले सूक्ष्मजीवियों तथा कीटों से बीज की सुरक्षा हो सके। यह उपचार कार्बेंडाजिम 2 प्रतिशत, टेबाकोनाजोल एक प्रतिशत दवा में बीज के टुकड़ों को 5 से 10 मिनट तक घोल में डुबोकर करें। क्लोरोसिस की रोकथाम के लिए गन्ना अनुसंधान केन्द्र, जावरा पर परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि फेरस सल्फेट एवं यूरिया का 0.04 प्रतिशत घोल 15 दिनों के अंतर पर तीन बार छिड़कने से सफेद एवं पीले पत्ते हरे होने लगते हैं। माइक्रॉन-ए नामक सूक्ष्मपोषी छिड़कने से भी संतोषजनक परिणाम मिले हैं। इसी प्रकार से फफूंदजनित रोगों के नियंत्रण के लिए फफूंदनाशकों जैसे-डायथेन-जेड-78का 2.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का उपयोग करें स्त्राेत : एस.एन. सिंह और आशीष कुमार, प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष, पाैधा राेग विभाग ,सहायक प्राध्यापक, पाैधा राेग विभाग, जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर(मध्यप्रदेश),खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)