यह मृदाजनित रोग रालस्टोनिया सोलेनासिएरम नामक जीवाणु द्वारा होता है। यह भी सब्जियों के जीवाणुजनित रोगों के अंतर्गत आने वाले रोगजनकों में शामिल है। इस रोग के प्रकोप से पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं। संक्रमित पौधों के कटे हुये तनों के सिरों से पारदर्शी सफेद जीवाणुवीय स्राव (ऊज) निकलने लगता है। इस रोग को पहचानने के लिए ऊज परीक्षण किया जाता है। इस रोगजनक में आनुवंशिक विविधता परिवर्तनीय होने के कारण यह सोलेनेसी कुल की सब्जियों की प्रजातियों की पौध म्लानिरोधिता को आसानी से तोड़ देता है और रोगरोधी किस्मों को रोग ग्राहय बना देता है। सोलेनेसी कुल की सब्जियों में म्लानि रोगों के प्रबंधन के लिए रोगरोधी किस्मों का प्रयोग एवं फसलचक्रण में 2-3 वर्षों तक धान्य फसलों या कद्दूवर्गीय फसलों में खीरा, कद्दू या मालवेसियस सब्जी फसलों में भिन्डी आदि का प्रयोग अति प्रभावी होता है। इन सब्जियों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए म्लानि (उकठा) रोग के प्रबंधन की जानकारी दी जा रही है। सोलेनेसी (आलूवर्गीय) कुल की सब्जियों में जीवाणुजनित म्लानि रोग सब्जियों में गर्म व आर्द्र उपोष्ण सह शीतोष्ण जलवायु वाले पारिस्थितिक क्षेत्रों में सबसे अधिक क्षति पहुंचाने वाला मृदोढ़ रोग है। जिससे आलू, बैंगन, टमाटर एवं मिर्च/शिमला मिर्च के उत्पादन में शत-प्रतिशत क्षति होती है। इन सब्जियों में इस रोग का प्रकोप पहाड़ी क्षेत्रों से मैदानी क्षेत्रों की ओर बढ़ता जा रहा है। सोलेनेसी कलु की सब्जियों में मुख्यतया आलू, बैंगन, टमाटर, मिर्च एवं शिमला मिर्च आती हैं। सब्जियां पोषक तत्वों का सुलभ स्त्रोत होने के कारण मानव कुपोषण को दूर करने में सहायक होती हैं। सोलेनेसी कुल की सब्जियों से औषिधीय तत्वों एवं खनिज लवणों की प्रचुर मात्रा प्राप्त होती है। जैसे टमाटर (सोलेनम लाइकोपर्सिकम) में प्रति ऑक्सीकारक लाइकोपीन; बैंगन (सोलेनम मेलोन्जेना) में मधुमेह रोधी फिनालिक एवं फ्लेवोनायड मिर्च (कैप्सिकम एनम) व शिमला मिर्च (कै. प्रूफटिसेन्स) में कैप्सिसिन, फ्लेवोनायड एवं एस्कार्बिक अम्ल (विटामिन सी) पाया जाता है। सोलेनसी कुल की सब्जियों में म्लानि (उकठा) रोग के प्रकोप से उपज में मात्राात्मक व गुणात्मक क्षति होती है। संश्लेषित रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से पर्यावरण, मृदा, जल, परागणकर्ता कीट, मधुमक्खियों, मित्र कीटों/ जीवों एवं मानव स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव होने के कारण समन्वित एकीकृत रोग प्रबंधन को अपनाकर कम लागत में अधिक सब्जी उत्पादन किया जा सकता है। औसत पैदावार व जोत का क्षेत्र कम होने का कारण किसानों को वैज्ञानिक तकनीक का ज्ञान न होना, रोगरहित गुणवत्तायुक्त बीज की अनुपलब्धता एवं मृदोढ़ व बीजोढ़ रोगों आदि का लगना है। जीवाणुजनित रोगों में म्लानि (उकठा) रोग आलू, बैंगन, टमाटर एवं मिर्च/शिमला मिर्च का मुख्य रोग हैं, जिनसे उत्पादन में शत प्रतिशत क्षति होती है। समन्वित रोग प्रबंधन के घटकों में कृषिगत क्रियाओं (अनुशंसित सब्जी फसलचक्रण को अपनाना, पोषकों/वैकल्पिक पोषकों को नष्ट करना); रोगरोधी किस्मों को ही लगाना (यह रोग प्रबंधन का सबसे सस्ता व अधिक टिकाऊ तरीका है); रासायनिक विधियों (यह रोग नियंत्रण की सबसे ज्यादा प्रभावी व आसान विधि है जिसमें अनुशंसित रसायनों का प्रयोग किया जाता है); जैव नियंत्रण की विधियों (इसमें सूक्ष्मजीवीय संरूपणों जैसे स्यूडोमोनास फ्लुओरेसेन्स, बैसिलस सबटिलिस या वानस्पतिक स्रोतों से प्राप्त रसायनों) आदि का प्रयोग करना चाहिए। जीवाणुवीय म्लानि रोग का भौगोलिक वितरण देश में सोलेनेसी कुल की सब्जियों में यह रोग असोम, अरुणाचल प्रदेश, अंडमान व निकोबार द्वीप, गुजरात, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, मिजोरम, नगालैण्ड, ओडिशा, त्रिपुरा, उत्तराखंड एवं पश्चिम बंगाल में प्रमुखता से पाया जाता है। आर्थिक महत्व यह रोगजनक संगरोध के अंतर्गत वर्गीकृत है। यह आर्थिक महत्व की फसलों जैसे आलू, टमाटर, बैंगन, मिर्च/शिमला मिर्च, मूंगफली, मेथी, जीरा, अजवाइन, कपास, जूट, अदरक, केला एवं बीन आदि में क्षति पहुंचाता है। यह रोग सोलेनसी (आलूवर्गीय) सब्जियों में अधिक क्षति पहुंचाता है। इस रोगजनक का प्रकोप पहाड़ी क्षेत्रों से मैदानी क्षेत्रों की ओर बढ़ता जा रहा है। उकठा रोग के लक्षण जीवाणजुनित म्लानि या उकठा रोग गर्म व आर्द्र उपोष्ण सह शीतोष्ण जलवायु वाले पारिस्थितिक क्षेत्रों में सोलेनेसी कुल की सब्जियों में सबसे अधिक क्षति पहुंचाने वाला मृदोढ़ रोग है। इस रोग के लक्षण निचली पत्तियों में कुंचन एवं पत्तियों के सूखने के रूप में दिखाई देते हैं। इस रोग के प्रकोप से पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं। संक्रमित पौधों के तनों के संवहनीय ऊतक भूरे रंग में बदल जाते हैं, जिसमें श्लेष्मीय पदार्थ भरा होता है। रोगजनक द्वारा सृजित पदार्थ संवहनीय ऊतकों को पूर्णतया बंद कर देता है, जिससे पानी का संचरण रुक जाता है। संक्रमित पौधों के कटे हुये तनों के सिरों से पारदर्शी सफेद जीवाणुवीय स्राव (ऊज) निकलने लगता है। इस रोग को पहचानने के लिए ऊज परीक्षण किया जाता है। रोग के लक्षणों के आधार पर सही पहचान ही रोग प्रबंधन की प्रभावी कुंजी है। रोगजनक यह मृदाजनित रोग रालस्टोनिया सोलेनासिएरम नामक जीवाणु द्वारा होता है। यह जीवाणु ग्राम ऋणात्मक प्रकृति वाला छड़ के आकार (0.5-1.5 माइक्रोमीटर) का होता है। इस जीवाणु के एक सिरे पर अकेला फ्लैजिला होता है। इसकी कॉलोनी केल्मैन्सटेट्राजोलियम क्लोराइड मीडियम में अनियमित आकार की गुलाबी केन्द्र वाली होती है। इस रोगजनक के प्रभेदों को पोषक पौधों पर उत्पन्न लक्षणों के आधार पर 5 वर्गों में वर्गीकृत किया गया है, जबकि शर्करा व शर्करायुक्त एल्कोहल के ऑक्सीकरण के आधार पर 6 प्रकार के बायोवार के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस रोगजनक के प्रभेद इस प्रकार हैं- सोलेनेसियस प्रभेद-1, (सोलनेसी फसलों में) म्यूसेसियस प्रभेद-2 (केला एवं प्लांटेन) आलू प्रभेद-3 (आलू) अदरक प्रभेद-4 (अदरक) मल्बरी प्रभेद-5 (शहतूत)। इस रोगजनक में लाक्षणिक एवं आनुवंशिक विविधता बहुत अधिक होती है। प्रभेद-1 को सोलेनेसियस प्रभेद के नाम से जाना जाता है। इस प्रभेद में पोषक परास क्षमता 450 से भी अधिक पौध प्रजातियों में पायी गयी है। प्रभेद की उत्तरजीविता अवधि 2-10 वर्ष तक की होती है। इस रोगजनक में आनुवंशिक विविधता परिवर्तनीय होने के कारण यह सोलेनेसी कुल की सब्जियों की प्रजातियों की पौध म्लानिरोधिता को आसानी से तोड़ देता है और रोगरोधी किस्मों को रोग ग्राहय बना देता है। रोगचक्र इस रोग के प्रभावी प्रबंधन के लिए रोगजनक के रोगचक्र एवं उत्तरजीविता का ज्ञान होना अति आवश्यक है। यह रोगजनक मिट्टी एवं संक्रमित बीज/प्रवर्ध (कंद) के माध्यम से फैलता है। यह मृदा में कई वर्षों तक जीवित रहता है। खेत में अंतःसस्यन की क्रियाओं के समय जड़ों में क्षति होने से इस रोगजनक का संक्रमण पौधों में होता है। यह रोगजनक संक्रमित पौधों से भी फैलता है। टमाटर, बैंगन, मिर्च एवं शिमला मिर्च की पौध म्लानि रोग से संक्रमित क्षेत्रों वाली मृदा में तैयार करने के बाद पौध को यदि उन जगहों में, जहां म्लानि रोग का संक्रमण नहीं है, में लगाया जाता है तो यह रोग नई जगहों में भी फैल जाता है, जहां पर पहले यह रोग अभिलेखित नहीं था। इस रोगजनक का एक जगह से दूसरी जगह में संचारण संक्रमित पौध, बीज एवं सिंचाई के जल या बाढ़, प्रक्षेत्रा उपकरण, कृषि औजार, भंडारण एवं पैकेजिंग में प्रयोग आने वाली सामग्रियों द्वारा होता है। फसलों में रोग की उग्रता व क्षति मृदा में अधिक आर्द्रता, मृदा की अम्लीयता (पी-एच), मृदा में कार्बनिक जीवांश की कम मात्रा, वैकल्पिक पोषकों की उपलब्धता व मृदा तापमान में कमी होने पर अधिक होती है। रोग का प्रकोप सब्जी फसलों में 150-350 सेल्सियस तापमान पर ज्यादा होता है। म्लानि रोग का एकीकृत प्रबंधन वृहद पोषक परास होने, मृदा में ज्यादा समय तक की उत्तरजीविता एवं प्रभावी जीवाणुनाशी रसायनों की अनुपलब्धता एवं व्यावहारिक रूप से लाभदायक न होने के कारण जीवाणुवीय म्लानि (उकठा) का प्रबंधन बहुत कठिन हो जाता है। कृषिगत प्रबंधन म्लानि रोग से बचाव का सबसे अच्छा उपाय रोगरहित प्रमाणित बीज का खेती में प्रयोग करना है। बीज को बोने से पहले बीजापेचारित करके ही लगाना चाहिए। सगंरोध के नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए, जिससे इस रोगजनक का फैलाव रोका जा सके। मृदा के पी-एच मान को उदासीन रखना चाहिए। अम्लीय मृदा में चूने का प्रयोग करना चाहिए। मृदा को ब्लीचिंग पाउडर 12 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर से उपचारित करना चाहिए। फसलचक्रण में आलूवर्गीय फसलों की जगह 2-3 वर्षों तक अनाज वाली फसलें जैसे-रागी, मक्का, धान, गेहूं, बाजरा या गैर पोषी सब्जी फसलों में बंदगोभी, फूलगोभी, भिंडी, खीरा, प्याज, लहसुन आदि का प्रयोग करना चाहिए। ग्रीष्मकाल में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए। खेत में निराई-गुड़़ाई के समय ध्यान रखें कि पौधों की जड़ों में क्षति न हो। उचित जल निकास की व्यवस्था रखनी चाहिए। रोगग्रसित क्षेत्रों के खेतों की सिंचाई के पानी का सही तरीके से निकास करना चाहिए, जिससे अन्य जगहों में रोगजनक न पहुंच सके। मृदा का सुधार कार्बनिक उत्पादों से करना चाहिए। खेत की तैयारी के समय नीम की खली का 250 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से प्रयोग करना चाहिए। विश्व सब्जी उत्पादन में दूसरे स्थान पर भारत भारत का विश्व के कुल सब्जी उत्पादन (1159.18 मिलियन टन) में 16 प्रतिशत (187.4 मिलियन टन) का योगदान है। चीन के बाद भारत का दुनिया में सब्जी उत्पादन में दूसरा स्थान है। वैश्विक स्तर पर सब्जियों की उत्पादकता 19.7 टन प्रति हैक्टर एवं खेती की जोत का क्षेत्रफल 58.97 मिलियन हैक्टर है। देश में सब्जियों की उत्पादकता 10.2 टन प्रति हैक्टर एवं उत्पादन का क्षेत्रफल 10.43 मिलियन हैक्टर है, जो कुल खेती योग्य क्षेत्र का मात्र 2-3 प्रतिशत है। देश की बढ़ती हुई जनसंख्या, जो वर्ष 2025 में 1.4 बिलियन अनुमानित है, के लिए सब्जी उत्पादन से पोषण सुरक्षा की चुनौती का समाधान करना होगा। रोगरोधी किस्मों का प्रयोग जीवाणुवीय म्लानि के प्रभावी प्रबंधन के लिए रोगरोधी किस्मों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। टमाटर, बैंगन व मिर्च में जनन द्रव्यों के संग्रहण द्वारा रोगरोधी किस्मों को विकसित करना चाहिए। टमाटर में रोगरोधी किस्मों के अंतर्गत अर्का अनन्या, अर्का अभिजीत, अर्का आभा व अर्का आलोक आदि किस्मों को लगाना चाहिए। जैव प्रबंधन जीवाणुवीय म्लानि के प्रबंधन के लिए स्यूडोमोनास फ्लूओरेसेन्स, बैसिलस सबटिलिस, बैसिलस पालीमैक्सा एवं एविटनामोइसीसस का प्रयोग करना चाहिए। बैसिलस सबटिलिस (बायो-बी-5) के संरूपण के प्रयोग से पंजाब, गुजरात, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में आलू में म्लानि रोग का प्रबंधन 80 प्रतिशत तक व उपज में 20 प्रतिशत तक की वृद्धि पायी गई है। सब्जी फसलों की बर्बादी बैंगन की वैश्विक औसत उत्पादकता 26.5 टन प्रति हैक्टर है, जबकि हमारे देश में यह अधिकतम 12.6 टन प्रति हैक्टर है। इसी प्रकार टमाटर की वैश्विक औसत उत्पादकता 33.8 टन प्रति हैक्टर है, जबकि देश में यह उत्पादकता अधिकतम 20.7 टन प्रति हैक्टर है। फसल उत्पादन में कीटों से 26 प्रतिशत, रोगों से 16 प्रतिशत एवं खरपतवारों से 13 प्रतिशत तक की क्षति होती है। सोलेनेसी कुल की सब्जियों में अन्य फसलों की तुलना में म्लानि (उकठा) रोग का प्रकोप अधिक होता है। कई वर्षों तक खेत में एक ही कुल की फसलों को लगाते रहने से मृदा की उर्वरता व लाभदायक सूक्ष्मजीवों की संख्या कम होती जाती है। फसलचक्रण को न अपनाने के कारण मृदाजनित रोगजनकों के निवेश की मात्रा बढ़ जाने के कारण मृदोढ़ रोगजनकों का रोगचक्र वर्ष प्रति वर्ष पूरा होता रहता है और रोगों का फसलों में प्रकोप अधिक होता है। म्लानि रोगजनक की उत्तरजीविता की समयावधि अधिक होने एवं वृहद् पोषक परास होने के कारण इस रोग का सोलेनेसी कुल के सब्जियों में प्रबंधन बहुत कठिन होता है। रासायनिक प्रबंधन उकठा रोग के प्रबंधन के लिए जीवाणुनाशियों का प्रयोग करना चाहिए। बैंगन, मिर्च, टमाटर की पौध की जड़ों को स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 100 पीपीएम (100 मि.ग्राम/लीटर जल) के घोल में 30 मिनट तक डुबोने के बाद खेत में रोपित करें। मृदा में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या कॉपर हाइड्राऑक्साइड के 0.30 प्रतिशत का प्रयोग करना चाहिए। स्त्रोत : ए.एन. त्रिपाठी, दिनेश सिंह, के.के. पाण्डेय और जगदीश सिंह, भाकृअनुप-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी (उत्तर प्रदेश), खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)।