विश्व का सबसे बड़ा चना उत्पादक देश होने का गौरव भारत को प्राप्त है। देश में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार आदि राज्यों में चने की खेती की जाती है। देश के कुल चना उत्पादन का 92 प्रतिशत भाग इन्हीं प्रदेशों से प्राप्त होता है, लेकिन पिछले दो दशकों में चना क्षेत्र और उत्पादन में महत्वपूर्ण कमी दर्ज की गई है। बदलती जलवायु परिस्थितियों से निर्मित विभिन्न अजैविक और जैविक तनाव चना उत्पादन में प्रमुख बाधा बन गए हैं। अधिकतम एवं स्थायी चना उत्पादन के लिए इन तनावों का समय पर ही प्रबंधन किया जाना चाहिए। सूखा तनाव से विश्व स्तर पर चने की उपज में 40 से 50 प्रतिशत की कमी पायी गयी है। देर से बुआई करने से फसल में सूखा तनाव का खतरा बढ़ता है। हल्की मृदा में जलवाष्पोत्सर्जन की अधिकता सूखा तनाव को निमंत्रण देती है। इससे फूल गिरते हैं और अधिक खाली फलियां बनती हैं। बोट्राइटिस ग्रे मोल्ड बोट्राइटिस साइनेरिया फफूंद से इस रोग का फैलाव होता है। वातावरण एवं खेत में अधिक नमी होने से इस रोग का संक्रमण होता है। इससे पौधों पर भूरे या काले भूरे रंग के धब्बे पड़ते हैं। फूल झड़ते हैं और फलियां नहीं बनती हैं। तन्तुओं के सड़ने के कारण टहनियां टूटकर गिर जाती हैं और संक्रमित फलियों पर नीले धब्बे पड़ जाते हैं। फलियों में दाने नहीं बनते हैं और बनते भी हैं तो सिकुड़े हुए होते हैं। संक्रमित दानों पर भूरे व सफेद रंग के कवक तंतु दिखाई देते हैं। उच्च और निम्न तापमान तापमान तनाव पौधों के प्रजनन विकास और उपज को प्रभावित करता है। इससे कारण चना उत्पादन में 15-20 प्रतिशत तक हानि होती है। चना खेती के लिए 24-30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है। बीज अंकुरण के समय ठंड (<15 डिग्री सेल्सियस) होने से फसल कम होती है और पौधे मृदाजनित रोगजनकों के लिए संवेदनशील बनते हैं। उच्च तापमान, बीज अंकुरण, प्रकाश संश्लेषण, वाष्पोत्सर्जन और पौधों की वृद्धि को प्रभावित करता है। लवणता चने की आंतरिक संवेदनशीलता के कारण लवणता मुख्य चिंता का विषय है। यह प्रकाश संश्लेषण, नाइट्रोजन और कार्बन चयापचय आदि को प्रभावित करती है। इससे पोषक तत्वों की कमी से पौधों की वृद्धि में कमी आती है। जैविक तनाव रोग प्रोटीन का अच्छा स्रोत होने से चना, रोगों के प्रति बहुत संवेदनशील है। रोगों के प्रकोप से इसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। उकठा यह रोग फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम प्रजाति साइसेरी नामक फफूंद से होता है। इसका फैलाव मृदा तथा बीज द्वारा होता है। इससे पैदावार में 10 से 12 प्रतिशत तक कमी आती है। यह फफूंद बिना पोषक, मृ मृदा में लगभग छः वर्षों तक जीवित रहती है। यह व्याधि अधिक मृदा नमी और 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान होने पर तीव्र प्रगति से फैलती है। रोगग्रसित पौधो के ऊपरी हिस्से की पत्तियां और डंठल झुक जाते हैं। पौधा सूखना शुरु कर देता है आरै पत्तियों का रंग भूरा हो जाता है। अंकुरित पौधे कम उम्र से ही मर जाते हैं। यदि तने को लंबवत चीरा लगाएंगे तो भूरे रंग की धारियां दिखाई पड़ती हैं। कॉलर रॉट स्क्लेरोशियम रॉल्फसी फफूंद से इस मृदाजनित रोग का संक्रमण होता है। सिंचित क्षेत्रों में बुआई के समय अधिकतम नमी, भूसतह पर कम सड़े कार्बनिक पदार्थ, कम पी-एच मान एवं उच्च तापमान आदि इस रोग को बढ़ावा देते हैं। रोगग्रस्त पौधे पीले होकर मर जाते हैं। जमीन से लगा तना एवं जड़ की संधि का भाग पतला एवं भूरा होकर सड़ जाता है। तने के सड़े भाग से जड़ तक सपेफद पफपूंफद जाल पर सरसों जैसे स्केलरोशिया दिखाई देते हैं। ड्राई रूट रॉट राइजोक्टोनिया बटाटी कोला फफूंद से मृदाजनित रोगों का संक्रमण होता है। नमी की कमी एवं 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान में फूल आने एवं फलियां बनते समय इसका प्रकोप होता है। इससे प्रभावित पौधों की जड़ें अविकसित तथा काली होकर सड़ने लगती हैं एवं आसानी से टूट जाती हैं। सक्रंमण अधिक होने पर पूरा पौधा सूख जाता है। जड़ें काली या भंगुर हो जाती हैं। एस्कोकाइट ब्लाइट एस्कोकाइट रेबी फफूंद से यह रोग फैलता है। उच्च आर्द्रता एवं कम तापमान में इसका प्रकोप होता है। इससे पौधे के निचले हिस्से पर भूरे कत्थई रंग के धब्बे पड़ जाते हैं और संक्रमित पौधा मुरझाकर सूख जाता है। धब्बे वाले भाग पर फफूंद के फलनकाय दिखते हैं। प्रभावित पत्तियों, फूलों और फलियों पर हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं। कीट चना फलीभेदक चना फलीभेदक (हेलिकोवर्पा आर्मिजेरा) से 20-50 प्रतिशत नुकसान होता है। देर से बोई गयी फसल में इसका सर्वाधिक प्रभाव पाया जाता है। छोटी सूंडियां कोमल पत्तियों को खुरच-खुरच कर खाती हैं और द्वितीयक सूंडियां सम्पूर्ण पत्तियों, कलियों और पुष्पों को खाती हैं। तृतीयक सूंडियां फली में गोलाकार छिद्र बनाकर मुंह अंदर घुसाकर दाने को खाती हैं। कटुआ जलभराव यानी मृदा में बुआई से पूर्व पानी भरा रहने से कटुआ (अगरोटिस इप्सिलो) का प्रकोप बढ़ता है। दिन में ढेलों के नीचे छिपने वाला यह कीट रात को पौधों को भूमि सतह के पास काट देता है और कटे हुए पौधों के हिस्सों को खाने के लिए मृदा में रखता है। वयस्क सूंडियां मृदा में जाकर कोषावस्था बनाती हैं। दीमक दीमक (ओडोन्टोटर्मिस ओबेसुस) जड़ों और तने को काटकर छेद बनाकर अंदर रहती है। इसके कारण पौधे जल्द ही सूख जाते हैं। प्रभावित पौधों के ऊपर दीमक मृदा की सुरंगें बनाकर भीतर रहती हैं। अदर्ध कुण्डलीकार कीट (सेमी लूपर) सेमीलूपर (ऑटोग्राफा निगृसिगना) की हरी सूंडियां पत्तियों, कोमल टहनियों, फूलों और कलियों को खाकर नुकसान पहुंचाती हैं। कीट प्रबंधन फसल के प्रारंभ में ही फेरोमोन ट्रैप लगाकर, चना फलीछेदक के प्रकोप का पूर्वानुमान लगायें। इससे सुरक्षा उपाय करके फसल को आर्थिक क्षति से बचा सकते हैं। दीमक प्रभावित खेतों में क्लोरपायरीपफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 20 कि.ग्रा./हैक्टर, जुताई के दौरान मृदा में मिलाएं। इससे कटुआ रोग का भी नियंत्रण होता है। एक हैक्टर में 50 से 60 बर्ड पर्चर लगायें, ताकि चिड़िया, सूंडियों को खा सकें। खेत में जगह-जगह सूखी घास के छोटे ढेर रखें। इससे दिन में कटुआ सूंडियां छिप जाएंगी, जिसे प्रातःकाल इकट्ठा कर नष्ट कर सकते हैं। निबौली के सत् का 5 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें, ताकि प्राथमिक अवस्था की सूंडी पर नियंत्रण किया जा सके। खड़ी फसल में दीमक लगने पर 4 लीटर क्लोरपाइरिफॉस 20 ई.सी. प्रति/हैक्टर की दर से सिंचाई के पानी में मिला कर सिंचाई करें। सारणीः चने की खेती में तनाव से होने वाले रोग अजैविक तनाव जैविक तनाव मृदा नमी कम नमी से ड्राई रूट रॉट रोग में वृद्धि होती है, जबकि अधिक नमी से कॉलर रॉट एवं बोट्राइटिस ग्रे मोल्ड बढ़ता है। खराब जल निकासी से मृदा में कटुआ कीट का प्रकोप बढ़ता है। उच्च और निम्न तापमान उच्च तापमान, ड्राई रूट रॉट, कॉलर रॉट आदि का संक्रमण बढ़ाता है, जबकि, एस्कोकाइट ब्लाइट के लिए कम तापमान अनुकूल है। कैनोपी तापमान कम रहने से फलीछेदक तथा ग्रे मोल्ड का प्रकोप बढ़ता है। लवणता पौधों में मृदाजनित रोगजनकों जैसे कि उकठा, ड्राई रूट रॉट, कॉलर रॉट के लिए संवेदनशीलता बढ़ती है। रोगों एवं कीटों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अजैविक तनाव रोगों एवं कीटों को सकारात्मक या नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। रोग प्रबंधन गर्मियों (अप्रैल-मई) में खेत की गहरी जुताई करें। अक्टूबर से नवंबर के प्रथम सप्ताह तक बुआई करें। जल्दी परिपक्व होने वाली किस्मों का चुनाव करें। जैव कवकनाशी जैसे कि ट्राइकोडर्मा विरिडी 1 प्रतिशत डब्ल्यूपी और ट्राइकोडर्मा हरजिएनम 2 प्रतिशत डब्ल्यूपी को 2.5 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से 60 से 75 कि.ग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ मृदा में मिला दें। कार्बेन्डाजिम (1 ग्राम)/कार्बोक्सिन (1 ग्राम)/थीरम (2.5 ग्राम) और ट्राइकोडर्मा विरिडी (4 ग्राम) प्रति कि.ग्रा. दर से बीजोपचार करें। बीज को मिट्टी में 8 से 10 सें.मी. गहराई में बोने से उकठा रोग का प्रभाव कम होता है। उकठा प्रभावित क्षेत्र में तीन वर्ष तक चना नहीं उगायें। गेहूं, ज्वार, बाजरा को लंबी अवधि तक फसलचक्र में अपनाकर एवं पिछली फसल अवशेष नष्ट करके तथा खेत में उचित नमी रखकर कॉलर रॉट जैसे रोग का नियंत्रण करें। भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार सिपफारिश की गई रोग प्रतिरोधी किस्मों का इस्तेमाल करें। एस्कोकाइट ब्लाइट की रोकथाम के लिए कैप्टॉन (2 ग्राम)/मैंकोजेब (2.5 ग्राम)/ क्लोरोथालोनिल (2.5 ग्राम) प्रति लीटर पानी का 15 दिनों के अंतराल में 2 से 3 बार छिड़काव करें स्त्राेत : खेती पत्रिका,वनिता सालुंखे, राजकुमार वी. और जगदीश राणे, भाकृअनुप-राष्ट्रीय अजैविक स्ट्रैस प्रबंधन संस्थान, मालेगांव, बारामती-413115, पुणे (महाराष्ट्र)