<h3 style="text-align: justify;">पौध झुलसा रोग</h3> <h4 style="text-align: justify;">लक्षण</h4> <p style="text-align: justify;">पौध झुलसा रोग साधारणतया पौधशाला के नवविकसित पौधों को नुकसान पहुंचाता है। इस रोग में ग्रस्त पौधे अक्सर मुरझा जाते हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे पौधे झुलस गए हों। पत्तों का लाल व भूरे रंग का होना इस रोग की विशेष पहचान है। अंत में संक्रमित पौध की पत्तियों का मुरझाना इस रोग का एक सामान्य लक्षण है। इस रोग के दौरान पौधे के तने के पास मिट्‌टी की सतह पर सरसों के दाने के समान छोटे-छोटे फफूंद के दाने (स्केलेरोशिया) भी देखे जा सकते हैं। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccPic2.jpg" width="190" height="250" /></p> <h4 style="text-align: justify;">प्रबंधन </h4> <ul style="text-align: justify;"> <li>पौधशाला का स्थान 4-5 वर्ष के अंतराल में बदलते रहना चाहिए। पौधशाला उत्पादन की जगह स्थापित करने से 4-5 वर्ष पहले उस स्थान पर मक्का की फसल लगानी चाहि</li> <li>रोग ज्यादातर अधिक नमी वाले स्थानों पर होता है। इसलिए पौधशाला में पानी इकट्‌ठे नहीं होने देना चाहिए। </li> <li>रोगी पौधे को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए तथा पौधशाला में प्रभावित हुई पौध का थीरम या आरियोफंजिन (80 ग्राम 200 लीटर पानी) के घोल से उपचार करना चाहिए। </li> <li>नर्सरी क्षेत्र को सिंचाई करने के बाद गर्मियों के महीनों (मई-जुलाई) में सफेद पारदर्शी पॉलीथीन (150 गेज) से 4-5 सप्ताह तक ढककर उपचारित करें।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">चूर्णी फफूंद रोग </h3> <h4 style="text-align: justify;">लक्षण</h4> <p style="text-align: justify;">चूर्णी फफूंद रोग ज्यादातर पत्तियों, कलियों और नई शाखाओं पर सफेद पाउडर के धब्बों के रूप में दिखाई देता है। पत्तियों पर ये धब्बे ऊपरी तथा निचली सतह पर उभरे हुए प्रतीत होते हैं। संक्रमित पत्ते मुड़ जाते हैं, जिसके उपरांत वे सख्त एवं भंगुर हो जाते हैं। अधिक संक्रमित होने की स्थिति में प्रभावित पत्तियां गर्मी का मौसम आने से पहले ही झड़ जाती हैं। रोग ग्रसित पौधे की नई शाखाएं विकसित नहीं हो पातीं व अत्यधिक संक्रमण होने पर ये पत्तियां शीतकाल में मर जाती हैं। फूल, पंखुड़ियां, कलिकाएं, पत्तियां और वृंत इस रोग से प्रभावित होते हैं, जिसके कारण संक्रमित कलिकाएं फल पैदा करने में सक्षम नहीं होतीं। यदि ऐसी कलिकाओं पर फल लगते हैं तो वे छोटे आकार के रह जाते हैं या उन पर 'रस्सेटिंग' के लक्षण भी नजर आते हैं। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccPic3.jpg" width="190" height="250" /></p> <h4 style="text-align: justify;">प्रबंधन </h4> <ul style="text-align: justify;"> <li>सर्दियों तथा गर्मियों के मौसम में फलदार वृक्षों की रोग ग्रसित टहनियों तथा शाखाओं की कांट-छांट करके उन्हें नष्ट कर देना चाहिए। </li> <li>रोग के लक्षण दिखाई देते ही हैक्साकोनाजोल 100 मि.ली. या डाइफैनकोनाजोल 30 मि.ली. या माइक्लोबुटानिल 100 ग्राम या ट्रायाडेमफोन 100 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर दो-दो बार छिड़काव करना चाहिए।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : सतीश कुमार शर्मा, जोगिन्दर सिंह, जे.एन. शर्मा और अंजू शर्मा डा. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन (हिमाचल प्रदेश),खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर)। </p>