पत्तीदार सब्जियाँ पत्तीदार हरी शाक-सब्जियाँ शरीर के उचित विकास एवं अच्छे स्वास्थ के लिए आवश्यक होती है,क्योंकि इसमें सभी जरूरी पोषक तत्व उपस्थित होते हैं । भारत में कई तरह की हरी सब्जियों को खाया जाता है, इनमे से कुछ हैं पालक, चौलाई, सरसों, गोंगुरा, मेथी, सहजन की पत्तियाँ और पुदिना आदि। पत्तेवाली सब्जियां लौहयुक्त होती हैं । लौह की कमी से एनीमिया जैसी बीमारी हो सकती है, जो गर्भवती स्तनपान करानेवाली महिलाओं में आम है । रोज खानेवाले भोजन में हरी पत्तीदार सब्जियों का सेवन एनीमिया को रोकने में सहायक होता है। वह स्वास्थ के लिए लाभदायक भी होता है। ये सब्जियाँ दो भागों में बांटी जा सकती हैं। शीतकालीन : पालक, मेथी, विलायती पालक, सरसों व बधुआ आदि । ग्रीष्मकालीन : चौलाई, छोटी चौलाई, कुल्फा व पोई आदि। मुख्य फसलों की किस्में पालक : आलग्रीन, पूसा ज्योति, पूसा हरित, पूसा भारती व जोबनेर ग्रीन विलायती पालक : वर्जिनिया स्वॉय व अर्ली स्मूथलीफ मेथी : पूसा अर्ली बंच्रिग व पूसा कसूरी सरसों : पूसा साग-1 चौलाई : पूसा किरन, पूसा कीर्ति, पूसा लाल चौलाई, बड़ी चौलाई व छोटी चौलाई आदि । बुवाई का समय : मैदानी क्षेत्रों में पत्तीदार सब्जियों की बुवाई सर्दी के मौसम में सितम्बर से नवम्बर तक अथा गर्मी में फरवरी से मार्च तक करते हैं तथा वर्षा ऋतु में जून अंत से जुलाई तक करते हैं। बीज दर : पालक व विलायती पालक : 25-30 कि.ग्रा. मेथी - 5 कि.ग्रा./हेक्टेयर चौलाई - 1.5 कि.ग्रा./हेक्टेयर कसूरी मेथी - 2.5 कि.ग्रा./हेक्टेयर सिंचाई : मौसम तथा फसल की आवश्यकतानुसार नियमित रुप से सिंचाई करें। उर्वरक व खाद : 25-30 टन गोबर की खाद तथा 80 कि.ग्रा, नत्रजन, 60 कि.ग्रा. फास्फोरस व 50 कि.ग्रा./हेक्टेयर का प्रयोग करें। उपज पालक - 150-200 क्विंटल मेथी - 90-100 क्विंटल विलायती पालक - 60-70 क्विंटल चौलाई - 400-600 क्विंटल/ हेक्टेयर है। पत्तेदार सब्जियों की कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी मुलायम प्ररोहों सहित पत्तियाँ तोड़ें। छंटाई करके मनचाहे आकार के बंडल बनाएँ। 0-4 डिग्री से. तापमान व 90-95 प्रतिशत सापेक्ष आद्र्रता पर 10-12 दिनों तक भंडारित करें। सुखाकर सूखी पालक, मेथी एवं पुदीना बनायें। प्रमुख रोग एवं नियंत्रण 1. मेथी रोग लक्षण नियंत्रण मृबुरोमिल आसिता पत्तियों, की ऊपिरी सतह पर पीले रंग के धब्बे बनते हैं और निचली सतह पर भूरे या बैंगनी रंग की रुई के समान उलझी हुई कवक की बढ़वार दिखाई पड़ती है। मैंकोजेब, रिडोमिल एम.जेड.-72 का 2.5 कि.ग्रा. का एक हजार लिटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें। पर्ण दाग पत्तियों, पर गोल या अर्धगोलाकार धब्बे आते हैं । धब्बे का किनारा भूरा तथा बीच का भाग सफेद या हल्के रंग का होता है। तनों जाती है। पत्तियों पर भी इस रोग के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। रोगी फलियाँ पीली होकर नीचे गिर जाती है। बीज बोते समय कार्बेन्डाजिम या विटावैक्स 2.5 ग्रा. /कि.ग्रा. बीज दर से उपचारित करें। मैकोजेब 2.5 कि.ग्रा. या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 कि.ग्रा. का एक हजार लिटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें। कीट प्रकोप एवं प्रबंधन पत्ती भक्षण कीट मेथी को पत्ती भक्षण कीट जैसे भृंग, इल्लियाँ व ग्रासहॉपर आदि हानि पहुंचाते हैं। प्रबंधन इसके प्रबंधन के लिए नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.लि./4 लिटर या एमामेक्टिन ब्रेंजोएट 5 एस.जी. 1 मि.लि/2 लिटर या एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर का छिड़काव करें। 2. पालक रोग कारण नियंत्रण मृबुरोमिल आसिता (पैरोस्पोरा ट्राइगेनेली) बीज पत्रों तथा पत्तियों, पर पीले रंग के नियमित आकार के धब्बे उत्पन्न होते हैं| पौधों की पतियाँ छोटी एवं पीली हो जाती हैं | रीडोमिल एम जेड 72, 25 ग्रा./ कि.ग्रा. बीज दर से उपचारित करें| श्वेत किट्ट (एल्बूगो ऑकसीडेन्टोलिस) धब्बे पत्तियों, और तनों पर उभरे हुए फफोलों के रुप में दिखाई पड़ते हैं। ये फफोले गोल, सफेद, चमकीलें होते हैं। पत्तियाँ भूरी हो जाती है और पूरी पत्ती या पौधा मर जाता है। रीडोमिल एम जेड 72, 25 ग्रा./ कि.ग्रा. बीज दर से उपचारित करें| फ्यूजेरियम म्लानि पत्तियाँ पीली हो जाती हैं, धीरे -धीरे पूरी पौधे पर फैल जाती है। पत्तियाँ मर जाती हैं या सड़ कर गिर जाती हैं। कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्रा./ कि.ग्रा. बीज की दर से मिलाकर उपचारित करें| कीट प्रकोप एवं प्रबंधन पालक को भृंग इल्लियाँ व चेपा नुकसान पहुँचाते हैं। 1. पालक भृंग (पालक बीटल) इस राग के वयस्क पत्तों में छेद कर फसल को हानि पहुँचाते हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि. /लिटर या स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.लि./4 लिटर या इन्डोवक्साकार्य 14.5 एस.जी. 1 मि.लि./2 लिटर या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू. पी. 2 ग्राम/ लिटर का छिड़काव करें। 2. चेपा चेपा के शिशु व वयस्क दोनों ही कोमल पत्तों से रस चूसते हैं। अधिक प्रकोप की अवस्था में पत्ते पीले पड़कर मुरझा जाते हैं। प्रबंधन लेडी बर्ड भृंग का संरक्षण करें। नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मि.लि./3 लिटर का इस्तेमाल करें। बीज के लिए लगाई गई फसल नियंत्रण के लिए डाइमेथोएट 30 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर का प्रयोग करें। 3. पत्ती भक्षण इल्लियाँ (कैटर पिल्लर) इस कीट की इल्लियाँ पत्तों को खाकर नुकसान पहुँचाती हैं। इस कीट के नियंत्रण के लिए नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या बी.टी. 1 ग्राम/लिटर या स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.लि./4 लिटर या एमामेक्टिन बेंजोएट 5 एस.जी. 1 मि.लि./2 लिटर का प्रयोग करें। 3. सरसों सब्जी सरसों को मुख्यतया चेपा, चितकबरा बग, आरा मक्खी व गोभी तितली नुकसान पहुँचाते हैं। इन कीटों के हानि के लक्षण व प्रबंधन गोभी वर्गीय सब्जियों के अंतर्गत सुझाया गया है। कीट प्रकोप एवं प्रबंधन 1. चौलाई की सुरसुरी (वीविल) इस कीट के शिशु के तनों में घुसकर नुकसान पहँुचाते हैं जिससे तनों पर गांठे बन जाती हैं। इस कीट की रोकथाम के लिए एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू. पी. 2 ग्राम/लिटर या क्विनलफॉस 25 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर का शिशुओं के तने में घुसने से पहले प्रयोग करें। 2. पत्तों की इल्ली (कैटर पिल्लर) इस कीट की इल्लियाँ पत्तों के जाले में लपेट कर उनके हरे पदार्थ को चट कर जाती हैं। इस कीट के नियंत्रण के लिए नीम बीज अर्क (5 प्रतिशत) या बी.टी. 1 ग्राम/लिटर या एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या स्पिनोसेड 45 एस.सी. 1 मि.लि./4 लिटर या एमामेक्टिन बेंजाएट 5 एस.जी. 1 मि.लि./2 लिटर का छिड़काव करें। 3. थ्रिप्स थ्रिप्स के शिशु व वयस्क दोनों ही चौलाई के पत्तों को नुकसान पहुँचाते हैं जिससे पौधों की बीज बनाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसकी रोकथाम के लिए एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर या कार्बेरिल 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लिटर या डाइमेथोएअ 30 ई.सी. 2 मि.लि./लिटर का छिड़काव करें। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार; ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान।