सेम सेम एक लता है। इसमें फलियां लगती हैं। फलियों की सब्जी खाई जाती है। इसकी पत्तियां चारे के रूप में प्रयोग की जा सकती हैं। ललौसी नामक त्वचा रोग सेम की पत्ती को संक्रमित स्थान पर रगड़ने मात्र से ठीक हो जाता है। फलियाँ भिन्न-भिन्न आकार की लंबी, चिपटी और कुछ टेढ़ी तथा सफेद, हरी, पीली आदि रंगों की होती है। इसकी फलियाँ शाक सब्जी के रूप में खाई जाती हैं, स्वादिष्ट और पुष्टकर होती हैं यद्यपि यह उतनी सुपाच्य नहीं होती। इसके बीज भी शाक के रूप में खाए जाते हैं। इसकी दाल भी होती है। बीज में प्रोटीन की मात्रा पर्याप्त रहती है। उसी कारण इसमें पौष्टिकता आ जाती है। किस्में : पूसा अर्ली प्रोलिफिक, पूसा सेम-2, पूसा सेम-3, एच.डी. 18, रजनी, सी.ओ.-6, सी.ओ.-7 तथा सी.ओ.-8, अर्का जय व अर्का विजय बीज की मात्रा 10 कि.ग्रा. /हेक्टेयर (बेलदार किस्म) 30-40 कि.ग्रा. /हेक्टेयर (झाड़ीदार किस्म) बुवाई का समय जून-जुलाई : खरीफ ऋतु फरवरी : बसंत ऋतु बुवाई की दूरी बेलदार किस्म : 1-1.5 मीटर पंक्ति से पंक्ति की दूरी, 90 सें.मी. पौधा से पौधा झाड़ीदार किस्म : 60 सें. मीटर पंक्ति से पंक्ति की दूरी, 15-20 सें.मी. पौधा से पौधा सिंचाई : हल्की सिंचाई 10-12 दिनों के अन्तराल पर । निराई : एक या दो बार निराई या रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए 3 लिटर स्टाम्प/हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। तुड़ाई : हरी फलियों की तुड़ाई नर्म अवस्था में जब उनमें रेशे की मात्रा कम हो, तभी नियमित रुप से करते हैं। उपज : इसकी हरी फली उपज 50-70 क्विंटल/हेक्टेयर होती है। फ्रेंचबीन, लोबिया एवं रोग सेम की तुड़ाई उपरांत प्रौद्योगिकी मुलायम फलियाँ तोड़ें। छंटाई करने के बाद फलियों की पैकिंग करें। पैक फलियों को 4-5 डिग्री से. तापमान व 80-90 प्रतिशत आर्द्रता पर शीतगृह में भण्डारित करें। बीजोत्पादन : खेत का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि खेत में वही प्रजाति उगायें जो पिछले साल उगाई गई थी अन्यथा खेत को बदल देना चाहिए। प्रमाणित बीज के लिए पृथक्करण दूरी 5 मी मी. तथा आधार बीज के लिए 10 मी. रखें। अवांछनीय पौधों को 2-3 बार निकालना चाहिए। पहली बार बुवाई से 30-35 दिनों बाद दूसरी बार फली भरने तथा तीसरी बार पकने से पहले अवांछित पौधो को निकाल दें। जब खेत में लगभग 90 प्रतिशत फलियाँ पकर भूरे रंग की हो जाएँ तो फसल की कटाई या फलियों की तुड़ाई करके बीज अलग कर लें तथा बीज को सुखाकर भंडार में रखें। बीज उपज : 6-8 क्विंटल/ हेक्टेयर प्रमुख रोग एवं नियंत्रण रोग लक्षण नियंत्रण चूर्णिल आसिता (एरीसाइफी पोलीगोनी) पत्तियों, फलियों तथा पौधे के ऊपर सफेद चुर्ण से दाग उत्पन्न होते हैं | धीरे-धीरे सम्पूर्ण पत्ती सफ़ेद चूर्ण से ढक जाती हैं | रोग की उग्रता मे पत्त्तियाँ पिली होकर नीचे गिर जाती है | * रोगी पौधो के अवशेषों को इकटठा करके नष्ट कर देना चाहिए। * खड़ी फसल पर गंधक के चूर्ण का 25-30 कि. ग्रा./हेक्टेयर की दर से छिडकाव करें | सल्फेक्स 2 कि.ग्रा. कैलीक्सीन 500 मि.लि. या कैराथन 600 मि.लि. का 1000 लिटर पानी मे घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव हर 12-15 दिन के अंदर दोहराना चाहिए। किट्ट (सूरोमाइसीज फैजियोलाइटाइपिक पत्तियों, फलियों तथा मुलायम तनों, शाखाओं पर होता है, पत्तियों की निचली सतह पर छोटे-छोटे, सफेद रंग के, थोडे़ उभरे हुए धब्बे या स्फोट उत्पन्न होते हैं। धीरे-धीरे धब्बों का रंग गाढ़ा भूरा या काला हो जाता है। * रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों को इक्कठा करके नष्ट कर देना चाहिए| * खड़ी फसल में मैंकोजब, या हैकोनिल का छिड़काव, 2-2.5 कि.ग्रा. 1000 लिटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से करना चाहिए। सर्कोस्पोरा पर्ण दाग (सर्कोस्पोरा क्रुएन्टा सेम की पुरानी पत्तियों पर कोणीय भूरे धब्बे के रुप में उत्पन्न होते हैं। धब्बे के बीच का भाग धूसर रंग का होता है तथा किनारे का भाग लाल-भूरा या गहरे रंग का होता है। रोगी स्थान सूखकर नीचे गिर जाता है तथा पत्तियों में गड़ढे़ बन जाते हैं। फसल चक्र अपनाना चाहिए। 2. खेत में जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए। 3. उर्वरण उचित मात्रा में देना चाहिए। बीज को बोते समय कैप्टान या किसी भी पारायुक्त कवकनाशी से 2.5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज दर से उपचारित कर लेना चाहिए। सेम की खेती और उसमें किए जाने वाले प्रबंधन कार्य स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार; ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान