मूली व शलगम जड़ वाली सब्जियों में मूली, शलगम, गाजर व चकुंदर प्रमुख है। इनकी कृषि क्रियाओं में प्रयाप्त समानता है। ये ठंडे मौसम की फसलें है तथा सभी भूमिगत होती है। इनसे हमें पौष्टिक तत्व, शर्करा, सुपाच्य रेशा, खनिज लवण, विटामिन्स व कम वसा प्राप्त होती है। मूली की किस्में छोटी जड़वाली (क) व्हाइट आइसिकिल 25-30 दिन में तैयार होती है और अक्तूबर से दिसम्बर तक बुवाई के लिए उपयुक्त (ख) रैपिड रैड व्हाइट टिप्ड (ग) मृबुला लम्बी व मध्यम जड़वाली (क) पूसा देसी : लम्बी जड़ें 50-55 दिन में तैयार, बुवाई मध्य अगस्त से सितम्बर तक। (ख) जापानी सफेद: 55-60 दिन में तैयार, बुवाई अक्तूबर से दिसम्बर तक। (ग) पूसा जिमानी : 55-60 दिन में तैयार, बुवाई दिसम्बर से फरवरी तक। (घ) पूसा चेतकी : गर्मी मौसम के लिए उपयुक्त, 45-50 दिन में तैयार, बुवाईअप्रैल से अगस्त तक। (ङ) पालम हृदय : 45-50 दिन में तैयार, बुवाई सितम्बर से नवम्बर। ओवल हल्की हरी टाप और अन्दर से गुलाबी जड़ें। शलगम की किस्में 1. पूसा शवेती : सफेद जड़ें, 45-50 दिन में तैयार, बुवाई अगस्त से सितम्बर 2. पूसा कंचन : हल्की लाल जड़ें, 50-55 दिन में तैयार,बुवाई अगस्त अन्त से अक्टूबर 3. पर्पल टाप व्हाइट ग्लोब : गोल ऊपर से बैंगनी जड़ें, 60-65 दिन में तैयार, बुवाई अक्तूबर से जनवरी प्रारंभ तक 4. पूसा स्वर्णिमा : हल्की पीताम्बर जडें, 60 दिन में तैयार, बुवाई अक्तूबर से दिसम्बर तक 5. पूसा चन्द्रिमा : सफेद जड़ें 60-65 दिन में तैयार, बुवाई अक्तूबर से जनवरी उर्वरण व खाद गोबर का खाद : 10-15 टन/है. नत्रजन : 80 कि.ग्रा./है. फॉस्फोरस : 50 कि.ग्रा./है. पोटाश : 40 कि.ग्रा./है. इसमें से आधी नत्रजन जड़ बनने की स्थिति में मिट॒टी चढ़ाते समय डालें तथा अन्य खादें खेत तैयार करते समय मिट॒टी में मिला दें। बीज की मात्रा व बुनाई मूली : 8-10 कि.ग्रा./है. शलजम : 3-4 कि.ग्रा./है. बुवाई 45-60 सें.मी. दूर बनी मेढ़ों पर लगभग 1.5 सें.मी. गहराई पर करें और अंकुरण के पश्चात् छंटाई करके पौधों में 8-10 सें.मी. का अन्तराल बनाएँ। सस्य क्रियाएँ : खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई से पहले स्टाम्प नामक खरपतवारनाशी 3 लिटर /है. की दर से छिड़कें जिससे जड़ बनने की अवस्था तक खरपतवार नियंत्रित रहें और तब पौधों को मिट॒टी चढ़ाएँ। समय-समय पर सिंचाइ्र करके पर्याप्त नमी बनाएँ रखें। जड़ विकास व उपज : किस्म की समयावधि के अनुसार जड़ निकास करना आवश्यक है तथा खुदाई से पहले हल्की सिंचाई कर लें ताकि जड़ निकास आसान हो जाए अन्यथा जड़ टूटने की आद्गांका रहेगी। मूली की उपज : 25-30 टन/है. शलजम की उपज : 25-30 टन/है. बीजोत्पादन : चुनी हुई जड़ों के कएक तिहाई हिस्से की 4-5 सें.मी. पत्तों सहित 60 सें.मी. दूर पंक्तियों में 30 सें.मी. अंतराल पर रोपाई करें। खेत तैयार करते समय लगभग 10-15 टन गोबर की खाद, 50 कि.ग्रा. नत्रजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 50 कि.ग्रा. पोटाश, भूमि में मिलाएँ। बीज डंठल निकलने पर पौधों को मिट॒टी चढ़ाते समय नत्रजन 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से डालें। रोपाई करते समय अन्य किस्मों या इसी वर्ग की अन्य फसलों से प्रमाणित बीज के लिए 1600 मीटर की दूरी बनाएँ। मूली की बीज फलियाँ पकने पर उन्हें काट कर सुखा लें तथा अलग कर साफ करें तथा सुखा कर ठण्डी व सूखी जगह में भन्डारण करकें। शलजम की फलियाँ पीली पड़ने पर पौधों को काट कर ढेर लगा दें तथा 4-5 दिन धूप में उलट-पलट कर सुखएँ और फिर बीज अलग कर सुखाएँ, तथा साफ कर ठंडी व सुखी जगह में भंडारित करें। बीज उपज मूली : 500-600 कि.ग्रा./है. शलजम : 400-500 कि.ग्रा./है. प्रमुख रोग एवं नियंत्रण रोग का कारण लक्षण नियंत्रण शवेत किट्ट (White rust) (एल्बुगो कैंडिडा पत्तियों, तनों तथा पुष्प वृन्तों पर शवेत रंग के, अनयमित गोलाकार स्फोट दिखाई पड़ते हैं। पौधों का सर्वागी संक्रमक होने से रोगग्रस्त भाग फूलकर विरुपित हो जाते हैं। * खड़ी फसलों में मैंकोजेब, जिनेब या राइडोमिल एम 2.5 कि.ग्रा. रसायन का एक हजार लिटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। आल्टर्नेरिया पर्ण चित्ती (Alternaria leaf spot) (आल्टर्नेंरिया रैफेनी) बीज के अंकुरण के तुरंत काले बाद पौध के तने पर छोटी-छोटी काले रंग की चित्तियाँ बनती है, जो बाद मे बढकर पौध का आर्द विगलन कर देती है| रोगी पौधों की बढवार रुक जाती है | बड़े पौधों की पत्तियों पर गहरे भूरे या काले रंग के धब्बे दिखाई पड़ते है | धब्बों के चारों तरफ पीला क्षेत्र बनता है | पुराने धब्बों के बीच मे गोल छल्ले जैसे निशान निकल आते हैं | * थायरम 2.5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें | * खड़ी फसलों में मैंकोजेब, जिनेब 2.5 कि.ग्रा. कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 कि.ग्रा. का एक हजार लिटर पानी मे घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिडकाव करें | इस प्रकार करें शलगम की खेती | देखिए इस विडियो में स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार; ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान