<h3>विश्व में संरक्षण खेती का दायरा</h3> <p style="text-align: justify; ">संरक्षण खेती को विश्व की सभी प्रकार की जलवायु जैसे शितोष्ण, सम शितोष्ण कटिबंधीय, उष्ण कटिबंधीय इत्यादि में अपनाया जा सकता है। इसको समुद्र तल से 3000 मीटर की ऊंचाई (बोलिविया) तक और 250–3000 मिलिमीटर (चिली) वर्षा वाले क्षेत्रों तक आसानी से उगाया जा सकता है। ब्राजील में मृदा कटाव को रोकने के लिए संरक्षण खेती पर वर्ष 1962 में कार्य शुरू किया गया था। न्यूनतम/जीरो-टिलेज, मिट्टी की सतह पर फसल अवशेष को कायम रखना तथा उचित फसल चक्र अपनाकर विश्व के कई स्थानों पर संरक्षण खेती लगभग 40 वर्षों पूर्व से अपनायी जा रही है। पूर्ण रुप से (सभी तीन सिद्धान्तों पर आधारित) संरक्षण खेती की तकनीक को अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेटीना, ब्राजील इत्यादि ने बड़े स्तर पर अपनी परिस्थितियों एवं क्षमताओं के अनुसार अपनाया है।<img src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/93890293091594d937923-916947924940-915947-93893f92694d92793e90292494b902-92a930-90692793e93093f924-91693e92694d92f93e92894d928-93894193091594d93793e/sanrakshan1.png" class="image-inline" title="sanrakshan" align="right" style="float: right; " height="173" alt="sanrakshan" width="245" /> संरक्षण खेती विश्व में कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 85 प्रतिशत क्षेत्रफल में होती है जोकि लगभग 124 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र है जिसका 90 प्रतिशत क्षेत्र अर्जेटीना, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा तथा अमेरिका में स्थित है (लेखाचित्र 1)। भारत के सिंधु-गंगा के मैदानों या उत्तर पश्चिमी इलाकों में पिछले 15 वर्षों से इस क्षेत्र में काम किया जा रहा है और अब तक लगभग 2 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र इसके अन्र्तगत आ चुका है। एशिया महाद्वीप के अन्र्तगत 3 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र है जिसमें इसका ज्यादातर क्षेत्र धान-गेहूँ प्रणाली के अन्तर्गत है। जिसके तहत पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र सम्मिलित हैं। आजकल इस तकनीक पर काम तीव्र गति से चल रहा है जिससे आने वाले समय में इसके क्षेत्र में बढ़ोतरी होने की अपार संभावनाएं नजर आती हैं। संरक्षण खेती के सभी सिद्धान्तों को अपनाकर हम आने वाले समय में विकराल रूप से खड़ी समस्याओं जैसे खाद्य सुरक्षा, मृदा एवं जल संरक्षण, ग्रामीण आजीविका, जैव विविधता एवं जलवायु परिवर्तन से कुछ सीमा तक निजात पाने में सक्षम हो सकते हैं ।</p> <h3>भारत में संरक्षण खेती का क्षेत्र</h3> <p style="text-align: justify; ">विश्व के अन्दर 80 प्रतिशत से ज्यादा संरक्षण खेती वर्षा आधारित पारिस्थितिकी तंत्र के तहत आती है जबकि भारत में संरक्षण खेती प्रणाली सिंचित पारिस्थितिकी तंत्र वाले क्षेत्रों में अपनायी जा रही है जिसमें मुख्यतः गंगा के मैदानी क्षेत्र हैं। सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में धान-गेहूँ फसल प्रणाली लगभग 10.3 मिलियन हैक्टेयर में अपनायी जाती है। संरक्षण खेती आधारित तकनीकियों को धान—गेहूँ प्रणाली में लगभग 20 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्रफल में अपनाया जा रहा है जिसका ज्यादातर क्षेत्र जीरो-टिल गेहूँ के अधीन है। वर्षा आधारित पारिस्थितिकी तंत्र वाले क्षेत्रों में पशुओं का प्रति इकाई जमीन पर दबाव अधिक होने के कारण वहाँ पर मृदा सतह को ढकने के लिए फसल अवशेष पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नही होते हैं। भारतीय गंगा के मैदानी क्षेत्रों में धान की पुआल/ फसल अवशेष पशुओं द्वारा नहीं खाये जाने के कारण इसको मृदा सतह के आवरण के लिए मल्चिंग/ पलवार के रूप में काम लिया जाता है तथा गेहूँ की सीधी बिजाई जीरो-टिल ड्रिल द्वारा धान के फसल अवशेषों में कर दी जाती है। संरक्षण खेती प्रणाली के अन्दर धान-गेहूँ की उत्पादकता किसी विशेष स्थान, वातावरण एवं उपस्थित संसाधनों पर निर्भर करती है। संरक्षण खेती को पूर्ण रुप से लागू नहीं करने के कारण फसलों की उत्पादकता पारंपरिक खेती के तुलना में कहीं कम, कहीं अधिक एवं समतुल्य आ रही है। भारत में धान के अलावा दूसरी ऐसी कोई धान्न फसल नहीं है जिसकी पैदावार लेने के बाद फसल अवशेष के रूप में छोड़ सके, इसलिए संरक्षण खेती इस फसल प्रणाली के लिए उपयुक्त प्रणाली है। अन्य फसलों से हमें फसल अवशेष बहुत कम मिलते हैं और यदि मिलते हैं तो किसान उनको काटकर पशुओं को चारे के रूप में खिलाता है। अतः आने वाले समय में धान-गेहूँ प्रणाली में संरक्षण खेती की अपार सम्भावनाएं हैं। भारत के बारानी या वर्षा आधारित क्षेत्रों में यह प्रणाली अभी तक इतनी कारगर साबित नहीं हुई है जिसके मुख्य कारण फसल अवशेषों की कमी, वर्षा का अनियमित होना और मृदा क्षरण जैसी कई समस्याएं हैं। लेकिन यदि इसको इन क्षेत्रों में ठीक ढंग से लागू किया जाये तो यहां इसकी अपार संभावनाएं नजर आती हैं। संसाधनों पर निर्भर करती है। संरक्षण खेती को पूर्ण रुप से लागू नहीं करने के कारण फसलों की उत्पादकता पारंपरिक खेती के तुलना में कहीं कम, कहीं अधिक एवं समतुल्य आ रही है। भारत में धान के अलावा दूसरी ऐसी कोई धान्न फसल नहीं है जिसकी पैदावार लेने के बाद फसल अवशेष के रूप में छोड़ सके, इसलिए संरक्षण खेती इस फसल प्रणाली के लिए उपयुक्त प्रणाली है। अन्य फसलों से हमें फसल अवशेष बहुत कम मिलते हैं और यदि मिलते हैं तो किसान उनको काटकर पशुओं को चारे के रूप में खिलाता है। अतः आने वाले समय में धान-गेहूँ प्रणाली में संरक्षण खेती की अपार सम्भावनाएं हैं। भारत के बारानी या वर्षा आधारित क्षेत्रों में यह प्रणाली अभी तक इतनी कारगर साबित नहीं हुई है जिसके मुख्य कारण फसल अवशेषों की कमी, वर्षा का अनियमित होना और मृदा क्षरण जैसी कई समस्याएं हैं। लेकिन यदि इसको इन क्षेत्रों में ठीक ढंग से लागू किया जाये तो यहां इसकी अपार संभावनाएं नजर आती हैं।</p> <p style="text-align: justify; ">भारतवर्ष की खाद्य सुरक्षा में सिंधु-गंगा के मैदानी क्षेत्र अहम भूमिका अदा करते हैं। हरियाणा राज्य भारतवर्ष के कुल क्षेत्रफल का मात्र 14 प्रतिशत है जिस पर यहां की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर आधारित है। भारतवर्ष में हरियाणा संरक्षण खेती पर काम करने वाला एक अग्रणी प्रान्त है। खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से धान-गेहूँ फसल प्रणाली एक महत्वपूर्ण फसल प्रणाली है लेकिन इस फसल प्रणाली से प्राकृतिक संसाधनों जैसे पानी व मृदा का दोहन भी इस प्रान्त में अधिक हुआ है। हरियाणा के 114 में से 70 खण्डों में पानी का आवश्यकता से अधिक दोहन हो चुका है। पिछले चार दशकों में फसल अवशेषों के गलत प्रबंधन व धान-गेहूँ फसल प्रणाली में कद्दू (पडलिंग) करने की प्रक्रिया से भूमि व वातावरण सम्बंधी गुणों पर विपरीत प्रभाव पड़ने के कारण फसल उत्पादन लागत में वृद्धि हुई है। कृषि मजदूरों की आवश्यकता, पानी के दोहन, उर्जा उपयोग व उत्पादन खर्च को ध्यान में रखते हुये विकल्प तलाशने होंगे जो हमें आनी वाली समस्याओं के समाधान के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का संचय करते हुये खाद्य सुरक्षा में मदद करें। हरियाणा प्रान्त में इन उभरती समस्याओं के समाधान के लिये संरक्षण खेती पर राज्य, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में अनुसंधान कार्य जोर-शोर से चल रहे हैं ताकि खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ उत्पादकता में टिकाऊपन लाया जा सके। वर्तमान में अंतरीष्ट्रीय मक्का एव गेहूँ अनुसंधान केन्द्र (सिमेिट), भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् की विभिन्न संस्थाओं, कृषि विभाग हरियाणा, हरियाणा किसान आयोग, हरियाणा सरकार, निजी क्षेत्र के संगठनों, किसान सहकारी समितियों और लघु उद्यमियों आदि संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य कर रही है। ये संस्थायें दिनों दिन गंभीर होती एवं उभरती चुनौतियों जैसे क्षीण होते प्राकृतिक संसाधनों, घटते जलस्तर, कृषि में श्रम की कमी, बढ़ती ऊर्जा एवं कृषि उत्पादन आदानों की लागत, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों आदि से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार की तकनीकियों के विकसित करने व इनके प्रभावी तरीके से क्रियान्वन के लिए विभिन्न परियोजनाओं जैसे दक्षिण एशिया के लिए खाद्यान्न प्रणाली उपक्रम (सीसा), गेहूँ एवं मक्का पर सी.जी.आई.ए.आर (अंतरीष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पर परामर्श समूह) अनुसंधान कार्यक्रम और जलवायु परिवर्तन के साथ कृषि एवं खाद्यान्न सुरक्षा (सिकफ्स) के तहत मिलकर काम कर रही हैं।</p> <p style="text-align: justify; ">स्त्रोत : केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान(भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद),करनाल,हरियाणा।</p>