नहरों के विस्तार से जहां फसलों की सिंचाई बहुत सुगम हो गयी है, वहीं जल रिसाव के कारण जलभराव व मृदा क्षारीयता कृषि के लिए अभिशाप बनकर सामने आयी है। उत्तर प्रदेश में नहरों का जाल बिछा हुआ है। एक अनुमान के अनुसार यहां एक समय लगभग 13.7 लाख हैक्टर भूमि क्षारीय थी, जिसका 10 से 15 प्रतिशत भाग जलभराव से अभी भी प्रभावित है। उत्तर प्रदेश में ऐसी भूमि मुख्यतः बड़ी नहरों के दोनों तरपफ लगभग 1.0 किमी की चौड़ाई में फैली हुई है। इस भूमि की उत्पादकता बहुत ही कम (<1 टन/हैक्टर/वर्ष) है। जलाक्रांत ऊसर भूमि का सुधार परंपरागत जिप्सम आधारित तकनीक से संभव नहीं है। मत्स्य तालाब आधारित समेकित कृषि प्रणाली के माध्यम से नहरी क्षेत्राों की जलाक्रांत ऊसर भूमि में मृदा एवं जल की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। मत्स्य तालाब आधारित समेकित कृषि प्रणाली में लवण और जल के संतुलन का अध्ययन लखनऊ जनपद स्थित शारदा सहायक नहरी समादेश के ललईखेड़ा गांव में किया गया। प्रायोगिक स्थल, लखनऊ से लगभग 40 कि.मी. दूर स्थित है। इस क्षेत्र की वार्षिक वर्षा 950 मि.मी. है और औसत वार्षिक जलस्तर लगभग 0.00 से 1.5 मीटर के बीच में रहता है। प्रायोगिक क्षेत्र नहर से 50 मीटर की दूरी पर स्थित है। चयनित स्थल की प्रारंभिक मृदा पी-एच मान 0-120 सें.मी. मृदा संस्तर की गहराई में 8.96 से 9.69 और संगत विद्युत चालकता 0.203 से 0.569 डेसी साइमन/मी. पाई गयी। 0-120 सें.मी. मृदा स्तर की गहराई में जैव कार्बन सभी स्थानों पर अत्यधिक न्यून मात्रा में उपस्थित था। मत्स्य तालाब आधारित कृषि प्रणाली खेत की सीमाओं के सीमांकन के बाद जून 2015 में जेसीबी एवं हाइड्रोलिक ट्रैक्टर-ट्राली की सहायता से समेकित कृषि प्रणाली प्रतिरूपों का निर्माण किया गया। उत्थित पटि्टका का समतलीकरण ट्रैक्टर संयोजित लेवलिंग ब्लेड द्वारा किया गया। तालाब का क्षेत्रफल 2356 मीटर एवं उत्थित प्रक्षेत्र का क्षेत्रफल 2336 मीटर था। उत्थित पटि्टका की ऊंचाई भूजल से 2.5 मीटर से अधिक रखी गयी, क्योंकि 2 मीटर से कम ऊंचाई होने से मृदा पर लवणों का प्रभाव आने लगता है और धीरे-धीरे मृदा फिर से ऊसर में परिवर्तन होने लगती है। उत्थित पटि्टका के समतलीकरण के बाद चारों तरफ 50 सें.मी. चौड़ी एवं 30 सें.मी. ऊंची मेड़ बनायी गयी। अधिक वर्षा की स्थिति में उत्थित पटि्टका के कटाव को रोकने के लिए 3 मीटर लंबी 10 सें.मी. व्यास की पाइप का भी प्रयोग किया गया। ऊसर भूमि में जैविक पदार्थ कम होता है। अतः इन खेतों में ढैंचे की हरी खाद ली गयी। इसके साथ ही किसान ने तालाब निर्माण के तीसरे वर्ष में सघन मत्स्योत्पादन किया, जिससे उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ। मत्स्योत्पादन एवं आर्थिक लाभ वर्ष 2017 में एक सघन मत्स्य पालन की योजना बनाई गई। दिनांक 12 मार्च 2017 का पंगेसियस की कुल 12,000 मत्स्य अंगुलिकाओं को तालाब में डाला गया, जिसकी कुल कीमत 33,600 रुपये थी। 12 मार्च 2017 से 30 अक्टूबर 2017 तक मत्स्य पोषण के लिए 300 बोरी (105 क्विटंल) कृत्रिम मत्स्य चारा औक 175 कि.ग्रा. चावल की खुराक दी गयी। मत्स्य चारे की कुल लागत 3,36,150 रुपये आंकी गयी। मत्स्य रक्षण के लिए लाल दवा का उपयोग तालाब के जल में किया गया, जिसकी कुल लागत 620 रुपये आयी। तालाब में साफ जल भरने के लिए 30 घंटा विद्यतुचालित पंप का उपयोग हुआ अत्यधिक गंदे हुए तालाब के पानी को दो बार 40 घंटा डीजल पंप चलाकर निकाला गया। जल भरने एवं निकालने में कुल लागत 2,900 रुपये आयी। तालाब से मछली निकालने पर कुल व्यय 3,000 रुपये हुआ। इस प्रकार मत्स्य उत्पादन में कुल व्यय 3,78,020 रुपये आया। तालाब से 6530 कि.ग्रा. (27.61 टन/हैक्टटर) मछली का उत्पादन हुआ। मछली का थोक मूल्य 9000 रुपये कि.ग्रा. रहा। मत्स्य उत्पादन से सकल आय 5,87,700 रुपये प्राप्त हुई। किसान को मत्स्य पालन से शुरु आय 2,09,680 रुपये प्राप्त हुई। मत्स्य तालाब आधारित समेकित कृषि प्रारुप से मत्स्य उत्पादन का लाभ लागत अनुपात 1.55 पाया गया। टमाटर उत्पादन इसी प्रकार इस किसान ने वर्ष 2017 में उत्थित पटि्टका के 1122 मीटर क्षेत्र पर संकर टमाटर (हिमसोना) का भी सफल उत्पादन किया। खेत की तैयारी में 750 रुपये का व्यय हुआ। उर्वरकों की निर्धारित मात्रा (110 नाइट्रोजन : 60 फॉस्फेट : 60 पोटाश) के अनुसार 15 कि.ग्रा. डीएपी, 20 कि.ग्रा. यूरिया एवं 10 कि.ग्रा. पोटाश आधार मात्रा के रूप में मृदा में डाला गया। 2 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट को भी इन उर्वरकों के साथ मृदा में डाला गया। आवश्यक यूरिया की मात्रा तीन भागों में बांटकर 4 कि.ग्रा. (प्रथम भाग) मृदा में, 3 कि.ग्रा. पौध रोपण के 30-35 दिनों के बाद एवं 3 कि.ग्रा. पौध रोपण से 60-70 दिनों के बाद ऊपर से डाली गयी। यूरिया पर 140 रुपये, डीएपी पर 360 रुपये एवं पोटाश पर 70 रुपये व्यय हुआ। जिंक सल्फेट पर 200 रुपये व्यय हुआ। इस प्रकार उर्वरकों पर कुल व्यय 770 रुपये आया। टमाटर के बीज पर 420 रुपये एवं पौध रोपण पर 100 रुपये व्यय हुआ। पौध रक्षण पर 200 रुपये एवं निराई पर 100 रुपये व्यय हुआ। टमाटर की पौध कूंड़ों पर 100 सें.मी. × 30 सें.मी. के अंतराल पर सितंबर में रोपी गई। टमाटर की फसल को 10 सिंचाई दी गयी। प्रत्येक सिंचाई की गहराई 3 सें.मी. रखी गयी। सिंचाई में लगा कुल समय 8 घंटा एवं व्यय 572 रुपये रहा। सिंचाई पंप का औसत प्रवाह 12 लीटर/ सेकेण्ड था। श्रमिकों का प्रयोग कूंड़ निर्माण (2) पौध रोपण में (1) बांस एवं तार के फ्रेम रचना (2), सिंचाई (1), निराई (1) एवं टमाटर तोड़ने (7) में किया गया। इस प्रकार कुल 14 श्रमिक लगे जिस पर 3,500 रुपये व्यय हुआ। पूरे क्षेत्र पर 20 मीटर लंबे 40 बांस, 30 कि.ग्रा. तार एवं 11 कि.ग्रा. सुतली लगी। बांस को 8 पफीट लंबे टुकड़ों में काटकर औसतन 8 पफीट की दूरी पर गाड़कर उस पर तार बांध दी गयी। पौधों की ऊंचाई में वृद्धि के साथ तार को ऊपर चढ़ाते जाते हैं। बांस, तार एवं सुतली पर हुआ व्यय क्रमशः 4,000 रुपये, 2,250 रुपये एवं 1,100 रुपये रहा। इस प्रकार बांस तार के फ्रेम पर कुल व्यय 7,350 रुपये रहा। फ्रेम की आयु 3 वर्ष आंकी गयी। प्रतिवर्ष बांस तार के फ्रेम पर होने वाला व्यय 3,183 रुपये रहा। इस प्रकार टमाटर उत्पादन में हुआ व्यय 9,315 रुपये (83,021 हैक्टर) या 8.30 रुपये/मीटर) रहा। टमाटर का कुल उत्पादन 45.25 क्विंटल (403.39 क्विंटल/हैक्टर या 4.03 कि.ग्रा./मीटर) हुआ। टमाटर का औसत विक्रय मूल्य स्थानीय बाजार में 15 रुपये/कि.ग्रा. रहा, जिससे 67,875 रुपये (60.49 रुपये/ मीटर) की सकल आय एवं 58,560 रुपये (52.19 रुपये/मीटर) का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। टमाटर से होने वाले आर्थिक विश्लेषण से लाभ लागत अनुपात 1: 7.28 रुपये रहा। मत्स्योत्पादन एवं टमाटर के वार्षिक आर्थिक विश्लेषण से संयुक्त लाभ लागत अनुपात 1: 1.69 रहा। टमाटर की तुड़ाई नवंबर से प्रारंभ होकर मई तक की गई। इस प्रकार 2356 मीटर के तालाब एवं 1122 मीटर की उत्थित पटि्टका से किसान को 2,68,240 रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। यह विधि दशकों से बेकार पड़ी अनुपजाऊ जलाक्रांत ऊसर भूमि के सुधार एवं प्रबंधन में एक कीर्तिमान स्थापित कर रही है। स्त्राेत : राेहित प्रताप ओझा एवं छेदी लाल वर्मा भाकृअनपु-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान, क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)