लवणीय एवं क्षारीय मृदा सुधार हेतु यांत्रिक, रासायनिक, जैविक एवं शस्य विधियों की संस्तुति की जाती है। लवण प्रभावित भूमि के सुधार के लिए उपयोग में लाए जाने वाले अन्य तरीके जैसे जल निकासी द्वारा लवण निक्षालन,मृदा सतह पर एकत्रित लवणों का खुरचना इत्यादि आर्थिक रूप से कम व्यावहारिक तरीके हैं।इन क्षेत्रों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए लवण सहनशील प्रजातियों का विकास एक व्यवहारिक उपाय दृष्टिकोण है जिसे छोटे तथा सीमान्त किसान सुचारू रूप से उपयोग कर अधिक आय प्राप्त कर सकते हैं। यांत्रिक विधि से सुधार उपसतही जलनिकास तकनीक सुधार के लिए उपसतही जलनिकास तकनीक का विकास किया गया है। केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान द्वारा उपसतही जलनिकास तकनीक को 1980 के दशक के शुरूआती दौर में लवणीय जलग्रस्त भूमि के सुधार एवं प्रबधन के लिए विकसित किया गया था | हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों में इस तकनीक को अपनाकर जलग्रस्त भूमि का सफलतापूर्वक सुधार जलनिकास तकनीक को उत्तर-पश्चिमी भारत की जलोढ़ मृदाओं में लगाने के लिए 65,000 रुपये प्रति हैक्टर किया जा रहा है। भूमिगत जलनिकास तकनीक के अंतर्गत छिद्र युक्त पाइप भूमि सतह से 1.5-2.0 मीटर गहराई तथा 60–65 मीटर के अन्तराल पर खाई खोदने वाली (ट्रेन्चर) मशीन द्वारा बिछाए जाते हैं। इससे भूमि में पानी के स्तर को लागत आती है तथा महाराष्ट्र एवं कर्नाटक की भारी गठन वाली मृदाओं में 75,000 रुपये प्रति हैक्टर की लागत आती है। इस उपसतही जलनिकास प्रणाली में सामाग्री एवं स्थापन की लागत कुल लागत की लगभग आधी होती है। स्थिर करने तथा लवणों के निक्षालन में सहायता मिलती है। सभी समानान्तर नालियों को एक संग्राहक नाली द्वारा जोड़कर प्राकृतिक ढलान के अनुरूप 3-4 मीटर गहरे कुएँ सम्प में पहुँचा दिया जाता है। इस कुएँ से पानी को पम्प द्वारा निकाल कर खुली जलनिकास नाली में डाल दिया जाता है। इस प्रकार भूमिगत जल को वांछित स्तर पर स्थिर किया जा सकता है तथा घुलनशील लवण प्रभावित क्षेत्र से बाहर निकाले जा सकते हैं। संग्राहक नाली से निकलने वाले जल की गुणवत्ता ठीक हो तो पानी किसी प्राकृतिक नाले, नदी या नहर में भी डाला जा सकता है। एक-दो वर्ष के बाद जब इस पानी में लवणों की मात्रा कम हो जाय तो उसका परीक्षण करने के बाद फसलों की सिंचाई के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों के लगभग 50,000 हैक्टर जलग्रस्त लवणीय मृदाओं में उपसतही जलनिकास अपनाने के बाद फसल सघनता (25–100 प्रतिशत), फसल उपज (धान-45 प्रतिशत, गेहूँ-111 प्रतिशत, कपास–215 प्रतिशत) एवं किसानों की आय में तीन गुणा आशातीत् वृद्धि हुयी है। इस तकनीक के द्वारा 128 अतिरिक्त कार्य दिवस प्रति हेक्टर प्रति वर्ष रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होते हैं। उपसतही उपसतही जलनिकास तकनीक का आय-व्यय अनुपात 1.47 है जोकि 13 प्रतिशत आन्तरिक प्राप्ति दर एवं मूलधन के वापस प्राप्ति की 5 वर्ष अवधि पर आधारित है। बरमा छेद तकनीक क्षारीय मृदा जिनकी उपसतह में कंकर की परत होती है। उनमें वृक्षारोपण करने के लिए ट्रैक्टर चालित बरमा छेद तकनीक कारगर साबित हुयी है। इस तकनीक के तहत् ट्रैक्टर चालित बरमें से 20 सेंमी. व्यास के 120-140 सेंमी. गहरे गड्ढे बनाये जाते हैं। गडढों की गहराई ककर की परत की गहराई पर निर्भर करती है। इस विधि द्वारा ककर परत को तोड़ा जाता है। इन गड्ढों को इन्हीं से निकली मृदा + 3-5 किलोग्राम जिप्सम + 8-10 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद + 20 ग्राम जिंक सल्फेट के बने हुऐ मिश्रण से भरकर वापस इनमें क्षार सहनशील वृक्षों की प्रजातियां लगायी जाती हैं। पौध रोपण के बाद 3-4 सिंचाई बाल्टी की सहायता से करते हैं तथा इसके बाद सिंचाई नालियां बनाकर करते हैं। जिन मृदाओं का पीएच मान 9.6 से कम होता है उनमें फलदार वृक्ष जैसे करौदा, आंवला, अमरूद, अनार, बेर तथा जामुन आदि की खेती बरमा छेदक तकनीक की सहायता से सफलतापूर्वक की लवणग्रस्त मृदाओं में अधिक पीएच मान वाली मृदाओं में कृषि-वानिकी के तहत वृक्ष प्रजातियों को लवणीय मृदाओं में आसानी से उगाया जा सकता है। रासायनिक विधि से सुधार जिप्सम का प्रयोग इसके तहत क्षारीय भूमि सुधारने के लिए रासायनिक भूमि सुधारक पदार्थों जैसे जिप्सम, पाइराइट, फॉस्फोजिप्सम एवं गंधक का अम्ल आदि का प्रयोग किया जाता है किन्तु जिप्सम आसानी से बाजार में उपलब्ध हो जाता है तथा सस्ता एवं अत्यन्त प्रभावी होने के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय है। जिप्सम रासायनिक रूप से केल्शियम सल्फेट है जिसमें कैल्शियम और गंधक होता है। क्षारीय भूमि सुधार के लिये यह आवश्यक है कि प्रयोग किये जाने वाले जिप्सम की शुद्धता 70 प्रतिशत से कम न हो । यदि मृदा का पीएच मान अधिक है तो जिप्सम का प्रयोग सीधे खेत में करें और यदि भूमिगत जल में अवशिष्ट सोडियम कार्बोनेट की मात्रा 2 से अधिक है तो जिप्सम बैड तकनीक को उपयोग में लाना चाहिए। क्षारीय भूमि सुधार से पूर्व खेत से मिट्टी का नमूना लेकर प्रयोगशाला में उसकी जांच करा लें और भूमि सुधार के लिये आवश्यक जिप्सम की मात्रा की जानकारी प्राप्त कर लें। मृदा के पीएच मान के अनुसार 10 से 15 टन प्रति हैक्टर जिप्सम की आवश्यकता पड़ती है। जिप्सम उपयोग विधि सर्वप्रथम खेत को लेजर लेवलर की सहायता से समतल करके चारों ओर 35 से 40 सेंमी. ऊँची मेड़ बना लेनी चाहिए तथा आवश्यकता से अधिक वर्षा जल की निकासी हेतु उपयुक्त जलनिकास की नालियाँ बना दें तथा खेत में अधिक जलभराव होने से रोकें। जिप्सम को बारीक चूर्ण के रूप में जून के प्रथम सप्ताह में खेत की सतह से 10 सेंमी. की गहराई तक जुताई करके भलीभांति मिला देना चाहिए। जिप्सम डालने के बाद खेत में पानी भर देवें तथा 10-15 दिनों तक खेत में पानी भरा रहने के बाद धान की रोपाई करनी चाहिए । जिप्सम का प्रयोग करने से 3-4 वर्षों में क्षारीय भूमि का पीएच मान तथा वैद्युत चालकता कम होने के परिणामस्वरूप मृदा की भौतिक एवं रासायनिक दशा में अनुकूल परिवर्तन होने लगता है तथा भूमि सामान्य अवस्था में आ जाती है। जैविक एवं सस्य विधियों से सुधार फसल का चुनाव लवणीय सिंचाई जल वाले क्षेत्रों में लवण सहनशील फसलों को उगाना लाभदायक होता है जिनमें लवणों को सहन करने की अधिक क्षमता हो ताकि उत्पादन में न्यूनतम कमी हो सके। अनाज वाली फसलें तुलनात्मक रूप से लवणों के प्रति अधिक सहनशील होती हैं । तिलहनी फसलें, जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है, अधिक लवणीय जल को सहन कर सकती है जबकि दलहनी फसलें लवणीय जल के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। विभिन्न फसलों में लवण सहनशीलता की सीमा तालिका 4 में दी गई है। जिसके अनुसार फसलों का चुनाव करना चाहिए। विभिन्न फसलों में वैद्युत चालकता का फसलों की उपज पर प्रभाव फसल फसल सापेक्ष उपज के लिये अधिकतम वैद्युत चालकता 100 प्रतिशत 90 प्रतिशत 75 प्रतिशत 50 प्रतिशत 0 प्रतिशत धान 3.0 3.8 5.1 7.2 11.0 गेहूँ 6.0 7.4 9.5 13.0 20.0 जो 8.0 10.0 13.0 18.0 28.0 गन्ना 1.7 3.4 5.9 10.0 19.0 कपास 7.7 9.6 13.0 17.0 27.0 मक्का 1.7 2.5 3.8 5.9 10.0 ज्वार 6.8 7.4 8.4 9.9 13.0 मूंगफली 3.2 3.5 4.1 4.9 6.6 सोयाबीन 5.0 5.5 6.3 7.5 10.0 लोबिया 4.9 5.7 7.0 9.1 13.0 चुकन्दर 7.0 8.7 11.0 15.0 24.0 स्त्रोत-मास एवं हौफमेन(1977),ए.एफ.ओ फसलों की लवणसहनशीलता उन्नतशील प्रजातियों का चुनाव फसलों की लवण सहनशीलता उनकी प्रजातियों एवं मृदा के प्रकार पर भी निर्भर करती हैं। तुलनात्मक रूप से अधिक लवणीय जल का हल्की एवं रेतीली मृदा में उपयोग आसानी से किया जा सकता है | फसलों के साथ ही लवणों को अधिक सहन करने वाली प्रजातियों का चयन भी प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिये क्योंकि एक ही फसल की विभिन्न किस्मों की लवण सहनशीलता भिन्न नमी की मात्रा सामान्य मृदा की अपेक्षा भारात्मक रूप से 5 प्रतिशत तथा आयतनात्मक रूप से 8 प्रतिशत कम होती है। ऊसर मृदा की जल चालकता कम होने से निचली सतह से उपरी सतह की ओर जल संचालन वाष्पोत्सर्जन की आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाता जिसके परिणामस्वरूप सतह में उपलब्घ जल तीव्र गति से समाप्त हो जाता है, अतः सिंचाई का अंतराल कम रखना चाहिए। जिन क्षेत्रों में अच्छी गुणवत्ता वाला जल सीमित मात्रा में उपलब्ध हो वहाँ इसे लवणीय जल के साथ मिला कर होती है। सिंचाई जल की लवणता/क्षारीयता को सहन करने एवं अधिक उपज देने वाली विकसित की गई विभिन्न फसलों की किस्मों का विवरण तालिका 5 में दिया गया है। तालिका 5: फसलों की लवण सहनशील प्रजातियां फसल लवण सहनशील प्रजातियां क्षार सहनशील प्रजातियां धान सीएसआर 30, सीएसआर 36, सुमती एवं भूतनाथ सीएसआर 10, सीएसआर 13, सीएसआर 23, सुमती एवं भूतनाथ सीएसआर 30, सीएसआर 36, सीएसआर 43, सुमती एवं भूतनाथ गेहूं डब्ल्यूएच 157, राज 2560, राज 3077, राज 2325 केआरएल 1–4, केआरएल 19, केआरएल 210, केआरएल 213, राज 3077, सरसों सीएस 52, सीएस 54, सीएस 56, सीएस 330–1, पूसा बोल्ड, आर एच 30 सीएस 52, सीएस 54, सीएस 56 डीआईआरए 336 चना करनाल चना 1 करनाल चना 1 बाजरा एचएचबी 60, एमएच 269 एमएच 331, एमएच 427 एचएचबी392, एमएच 269, एमएच 280, एमएच कपास डीएचवाई 286, सीपीडी 404, जीडीएच 9, जी 17060 एचवाई 6, सर्वोत्तम, एलआरए 5166 ज्वार सीएचएस 11, एसपीवी 475, एसपीवी 881 एसपीवी 678, एसपीवी 669 सीएचएस 11, सीएचएस 14, सीएचएस 1, एसपीवी 475, एसपीवी 669, जौ रत्ना, आरएल 345, आरडी 103, आरडी 137, के 169 डीएल 4, डीएल 106, डीएल 120, डीएचएस 12 कुसुम एचयूएस 305, ए–1, भीमा मजीरा, एपीआरआर 3, ए 300 उपयुक्त फसल चक्र का चुनाव लवण सहनशील फसलों को उपयुक्त फसल चक्र अपनाकर लवणग्रस्त मृदा को हानि पहुँचाए बिना अधिक फसलोत्पादन लिया जा सकता है। लवणीय क्षेत्रों में प्रायः उन फसलों तथा फसल चक्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए जिनको पानी की कम आवश्यकता पड़ती है ताकि भूमि में सिंचाई जल द्वारा लवणों की कम से कम मात्रा एकत्रित हो। सके। सिंधु-गंगा के मैदानों में सघन फसल चक्र में अगर धान फसल चक्र का एक घटक है तो भूमि सुधार के प्रारंभिक 3-4 वर्षों में धान-गेहूँ-ढेचा (हरी खाद) फसल चक्र अपनायें तथा खेत को अधिक समय तक खाली न छोड़ें और खेत में अनावश्यक पानी खड़ा न रहने दें। सुधार के प्रारम्भिक दौर में फसलों की लवण सहनशील किस्मों का ही प्रयोग करना चाहिए और इसमें सिंचाई के साथ पर्याप्त मात्रा में जिप्सम का प्रयोग आवश्यक है। सिंचाई जल का प्रबंधन जल प्रबंधन में सिंचाई निर्धारण का विशेष स्थान है, जिसमें प्रत्येक सिंचाई, सिंचाई अंतराल तथा लगाए जाने वाले पानी की गहराई मुख्य कारक है। सिंचाई के बीच अंतराल कम या अधिक होने से फसल उत्पादकता घटती है तथा जल उपयोग क्षमता कम होती है। मृदा की उच्च सोडियम विनिमयता सिंचाई जल व्यवहार को सार्थक रूप से प्रभावित करती है इसलिए ऊसर समस्या के समाधान में जल प्रबन्धन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऊसर भूमि में सिंचाई लवणीय एवं अच्छी गुणवत्ता वाले जल का चक्रीय उपयोग करने से अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है अथवा इन क्षेत्रों में यदि नहरी जल भी उपलब्घ हो तो फसलों को प्रारम्भिक अवस्थाओं में एवं फूल बनने के समय अच्छी गुणवत्ता वाले जल द्वारा सिंचाई करने से भी अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर 2 सिंचाईयां अच्छे जल से तथा1 सिंचाई लवणीय जल से या एक बार अच्छे जल तथा 1 बार लवणीय जल से सिंचाई करके सामान्य फसलोत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। फसल की प्रारम्भिक अवस्थाओं में अच्छा जल एवं बाद की अवस्थाओं में लवणीय जल का उपयोग लाभदायक होता है। खाद एवं उर्वरकों का प्रबंधन उर्वरकों का उपयुक्त व संतुलित प्रयोग भी लवणग्रस्त मृदा प्रबंधन नीति का एक अहम भाग है। सामान्यतः लवणग्रस्त मृदा में सामान्य मृदा की तुलना में उर्वरकों की अधिक आवश्यकता होती है। इसका मुख्य कारण लवणग्रस्त मृदाओं में परासरणीय दबाव अधिक हो जाने के कारण पोषक तत्वों की उपलब्धता सामान्य मृदाओं की तुलना में कम हो जाती है जिसके फलस्वरूप फसल की पोषण लेने की क्षमता कम हो जाती है। सिंधु-गंगा मैदानी क्षेत्र के किसान ऊसर भूमि सुधार के बाद नत्रजन उर्वरकों का अधिक उपयोग करते हैं जिससे मुख्य पोषकों का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। किसानों की प्रवृति रहती है कि वे धान में पोटाश का उपयोग नहीं करते हैं व फास्फोरस का कम उपयोग करते हैं | अधिक पोषक तत्व शोषण करने वाली धान-गेहूँ फसल प्रणाली में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कम मात्रा में आवश्यकता होती है परन्तु अधिकांशतः इनकी आपूर्ति नहीं की जाती है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली में सिंचाई जल के प्रक्रिया को फर्टिगेशन कहते हैं। फर्टिगेशन द्वारा उर्वरक की खपत 25-40 प्रतिशत कम हो सकती है। इस प्रक्रिया में घुलनशील उर्वरकों को सिंचाई जल के साथ मिश्रित कर दिया जाता है। खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए। अनाज वाली फसलों में 10-15 टन एवं सब्जी वाली फसलों में 20–25 टन गोबर की खाद का उपयोग करते रहने से मृदा में लवणों द्वारा होने वाले दुष्प्रभावों को कुछ सीमा तक कम किया जा सकता है। लवणीय मृदाओं में सामान्य मृदाओं की तुलना में सिफारिश किये हुये नत्रजन उर्वरकों की 25प्रतिशत अधिक मात्रा का प्रयोग करना चाहिए। क्लोराइड अधिकता (70 प्रतिशत से अधिक) वाले पानी से सिंचित भूमि में 50 प्रतिशत अधिक फॉस्फोरस उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। हरी खाद के रूप में ढेचा एवं मूंग का समावेश, अपनाने से रासायनिक पोषकों की काफी मात्रा को बचाया जा सकता है तथा यह पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं। धान-गेहूँ फसल चक्र में हरी खाद का प्रयोग या मूंग की खेती को अपनाकर मृदा की भौतिक स्थिति, जैविक कार्बन मात्रा व पोषक तत्व भंडार को बढ़ाया जा सकता है। नत्रजन उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए खाद की पूरी मात्रा को तीन बार में बांटकर प्रयोग करना चाहिए। लवणग्रस्त मृदाओं में उर्वरकों का उपयोग सिंचाई जल के साथ करना एक अच्छा विकल्प साबित होता है। सिंधु-गंगा मैदानी क्षेत्रों की क्षारीय भूमि में धान-गेहूँ फसल प्रणाली में नत्रजन की संस्तुत मात्रा के साथ 25 किलोग्राम जिक सल्फेट प्रति हैक्टर की दर से धान में प्रयोग करना चाहिए। सुधार के प्रारंभिक 4-5 वर्षों में फसलों में फॉस्फोरस तथा पोटाश उर्वरक देने की आवश्यकता नहीं होती है। नत्रजन उर्वरकों की आधी मात्रा बुआई के समय और आधी मात्रा प्रथम व द्वितीय सिंचाइयों के बाद दो बार में प्रयोग करें। पंजाब व हरियाणा राज्यों में गेहूँ की कटाई के बाद ढेचा और मूंग लगाकर हरी खाद के रूप में प्रयोग करने से आगामी धान की फसल को 75 किलोग्राम नत्रजन प्रति हैक्टर मिलने के साथ-साथ भूमि सुधार में भी सहायता मिलती है। गहरी जुताई लवण प्रभावित क्षेत्रों में खेत की तैयारी के समय लवण निक्षालन एक आवश्यक प्रकिया है। अगर खेत परती है, तो गहरी जुताई करनी चाहिए जिससे निक्षालन सही रूप से हो सके। मृदा में जमा लवणों को निक्षालन द्वारा प्रभावी रूप से हटाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए पर्याप्त पात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। विशेषतौर से अधिक पौध सघनता वाली फसलें जैसे गाजर, प्याज, मूंगफली इत्यादि एवं लवण निक्षालन उन फसलों के लिए भी अत्यन्त आवश्यक है जो लवणों की अधिक मात्रा के प्रति संवेदनशील होती है जैसे कि मटर, गन्ना इत्यादि । ये फसलें शुरूआती दिनों में अधिक संवेदनशील होती हैं। लवण निक्षालन पूरे खेत से समान रूप से होना चाहिए तथा गीले एवं सूखे खेत में अन्तर नहीं होना चाहिए। भूमि का समतलीकरण समान रूप से पानी का वितरण निश्चित करने के लिए खेत को सावधानीपूर्वक समतल करना आवश्यक है। समतलीकरण से खेत समान रूप से बराबर हो जाता है। जिससे पानी की गहराई खेत में एक समान रहती है जो उच्च जल उपयोगी क्षमता प्रदान करती है। समतलीकरण द्वारा पादप पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होता है जिसके कारण जल एवं उर्वरकों की लागत कम आती है, तथा खेत में अधिक जल इकट्ठा नहीं हो पाता तथा उसकी निकासी भी आसानी से हो जाती है। खेत में ऑक्सीजन का विसरण भी समान रहता है जो पौधों को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समतलीकरण के उद्धेश्य को पूरा करने हेतु नवविकसित तकनीक लेजर लैण्ड लेवलर का प्रयोग अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हुआ है। यह तकनीक जल एवं पोषक तत्वों को समान रूप से अवशोषित करने में सहायक होती है जिससे पौधों की समान एवं सुदृढ़ बढ़वार होती है। खेत के समान रूप से समतल हो जाने के कारण इसके क्षेत्रफल में भी लगभग 3 प्रतिशत तक वृद्धि हो जाती है। इस तकनीक द्वारा 15 से 25 प्रतिशत तक सिंचाई जल बचाया जा सकता है। पलवार (मल्च) का उपयोग दो सिंचाई व परती के बीच अंतराल में उच्च वाष्पोत्सर्जन के दौरान निक्षालित लवण पुनः मृदा की उपरी सतह पर आने की प्रवृति रखते हैं ऐसी कोई भी गतिविधि जो वाष्पीकरण को कम करे तथा मृदा जल प्रवाह को नीचे की सतहों में बढ़ाती हो, मृदा लवणीयता को रोकने में सहायक होती है। शुरूआती दिनों में जब घुलनशील लवणों की सघनता अधिक होती है उस समय पलवार सार्थक रूप से सहायक सिद्ध होती है। पलवार की हुयी मृदा में बार-बार जल छिड़काव से मृदा की निक्षालन क्षमता में वृद्धि होती हैजिससे फसल उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली सीमित अंत:स्पंदन क्षमता की वजह से क्षारीय मृदाओं की जल अवशोषक क्षमता कम होती है। इन मृदाओं की जल आपूर्ति क्षमता और भी कम हो जाती है क्योंकि इनका जल संचालन कम होता है। क्षारीय भूमि में जल गति इतनी कम होती है कि यह निचली सतहों से जल आपूर्ति करके वाष्पोत्सर्जन की आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाता है, परिणामस्वरूप मृदा सतह में उपलब्ध जल शीघ्र समाप्त हो जाता है जिसकी पुनः पूर्ति हेतु कम अतंराल पर नियमित सिंचाई देनी पड़ती है। सामान्य मृदा की अपेक्षा क्षारीय मृदा सिंचाई सतही सिंचाई की अपेक्षा अधिक लाभदायक सिद्ध होती है। टपका विधि, सिंचाई की ऐसी तकनीक है जिसमें जल नियंत्रित रूप में बूंद— बूंद लगाया जाता है। इससे मृदा में उच्च नमी की मात्रा बनी रहती है तथा अंतःस्रवण कम मात्रा में होता है। इस विधि की उपयुक्त विशेषताएं क्षारीय जल को भी कृषि में उपयोगी बनाती है। अन्य सस्य क्रियाएं लवणीय मृदाओं में फसलों को मेड़ के बीच में एक साइड में लगाना चाहिए ताकि लवणों का प्रभाव पौधों की जड़ों पर कम पड़े। वहीं दूसरी ओर क्षारीय मृदाओं में फसलों की बुआई खूड में करनी चाहिए। सामान्य भूमि में तैयार की गई 35 से 40 दिनों वाली धान की पौध जुलाई के प्रथम सप्ताह में कद्दू किये गये खेत में रोपाई करें। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 15 से 20 सेंमी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंमी. रखे एवं प्रत्येक स्थान में 3-4 पोध लगायें । पौधे से पौधे तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी को कम करना चाहिए तथा 20 से 30 प्रतिशत अधिक बीज दर का प्रयोग करना चाहिए। सूखी भूमि या कम नमी पर बुआई के बाद फुआरे से हल्की सिंचाई करने पर फसलों का जमाव अच्छा होता है। सतही सिंचाई में फसल की आवश्यकता से अधिक जल की मात्रा का उपयोग करना चाहिए, जिससे लवणों की अधिक मात्रा का निक्षालन जड़ क्षेत्र से हो सके। जैविक सुधारक इसमें गन्ना मिल का प्रेसमड, शीरा, धान की पुआल, भूसी, में जड़ों का फैलाव उपरी सतह में रहना, जल धारण क्षमता कम होना, कम जल बहाव इत्यादि के कारण यह अनिवार्य हो जाता है कि हल्की सिंचाई कम अंतराल से सुनिश्चित की जाए। ऐसी परिस्थितियों में टपका एवं फव्वारा विधि सेतापीय विद्युत गृह की राख, जलकुंभी, कम्पोस्ट खाद, गोबर की खाद, कच्चा गोबर इत्यादि कार्बनिक पदार्थों का प्रयोग भी ऊसर सुधार के लिये किया जाता है। जैविक पदार्थ का उपयोग करने से भूमि की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा में परिवर्तन होने के फलस्वरूप क्षारीय भूमि का सुधार होने लगता है। इसके बाद ढेचा की हरी खाद का प्रयोग पालक आदि उगायी जा सकती है जिससे भूमि का भलीभांति सुधार हो जाता है। यह विधि प्राकृतिक होने के कारण सस्ती है किन्तु सुधार में अधिक समय लगता है। लवणग्रस्त मृदाओं में कृषि-वानिकी कृषि-वानिकी के तहत् सिल्वी-पासटोरल प्रणाली में विभिन्न प्रकार के वृक्षों जैसेः टेसेरिक्स अIfटंकुलाटा (फराश) अकोॉषया निलोटिका (बबूल), अकोषिय7 फ़ारनेॉषय/ना (गुह बबूल), प्रोस्रोणिस जुलीफ़लोर7 (विलायती बबूल/जंगली कीकर), प/रकिनसोनिया एकुलियेटा (राम बबूल), कोणुरिन7 ग्लुका (स्वेम्प ओक), कोणुरिना इक्वीलेॉटफोलिय7 (जंगली सारू) एवं युकोलिप्टस टेरेटिकोर्नीस (सफेदा) आदि वृक्ष प्रजातियों को विभिन्न प्रकार की घास जैसेः लेप्टोकलोअ7 फुरका (कलर घास), क्लोरिस गयाना (रोढ्स घास) ब्रेकियfरया युटिका (पैरा घास) ऐनिकस स्पीसिज (बनसा) आदि के साथ लवणीय मृदाओं में आसानी से लगाया जा सकता है। जलमग्न व लवणग्रस्त भूमियों में जैविक कार्बन की मात्रा कम होती है तथा इन्हें सुधारने के लिए शीघ्र एक कारगार नीति है | सफेदे का जैव-जलनिकास के लिए कतार में रोपण कर जलनिकास के साथ-साथ कार्बन का स्थिरीकरण भी किया जा सकता है। वृक्षारोपण द्वारा मृदा कार्बन में वृद्धि एक महत्वपूर्ण कार्बन भंडार (सिंक) की तरह भी कार्य करती है। अतः सफेदा रोपण भूमिगत जल स्तर को नीचे करने के अलावा कार्बन स्थिरीकरण के रूप में अतिरिक्त लाभ प्रदान करता है। लवणीय मृदाओं में वृक्षारोपण के लिए उपसतही या खूड विधि अपनायी जाती है जिसमें ट्रैक्टर द्वारा नालियां बनाने वाले यंत्र से 50 सेंमी. चौड़ी और 60 सेंमी. गहरी नालियां बनायी जाती हैं। चूनेदार/काली मृदाओं में नालियों के मध्य में बरमा छेदक से गड्ढा बनाकर उसको मृदा मिश्रण (पैत्रिक मृदा + सड़ी हुयी गोबर की खाद + कीटनाशक) से भर दिया जाता है। लवणीय सिंचाई जल से भी इन नालियों में सिंचाई की जा सकती है। वृक्षारोपण के उद्धेश्य को ध्यान में रखते हुये कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की दूरी को निर्धारित किया जाता है।स्त्रोत :कृषि किरन,गजेन्द्र, राजेन्द्र कुमार यादव, हनुमान सहाय जाट, प्रबोध चन्द्र शर्मा एवं दिनेश कुमार शर्मा भाकृअनुप-केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल (हरियाणा)