<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">भूमिका</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-right" title="" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/92c93f93993e930-93093e91c94d92f-92e947902-91594393793f-92a94d93092393e932940/92c93f93993e930-92e947902-92e93893e93294b902-915940-916947924940/dhania.jpg/@@images/b070d895-2ad0-44d3-bc28-094a65988c9f.jpeg" alt="" /></p> <p style="text-align: justify;">रबी मौसम में उगाये जानेवाले मसालों में धनिया का प्रमुख स्थान है। यह बहुवर्षों बूटी है जो 30-90 से.मी. होती है। इसमें सफेद और गुलाबी फूल छतरी के रूप में लगते हैं। फल गोल, रेशेदार, पीले-भूरे और व्यास में 2-3.5 मि.मी. होती है। दबाने से फल दो पलाशकों में बँट जाता है जिसमें एक-एक बीज होता है। धनिया भूमध्य सागरीय क्षेत्र का मूलवासी है और भारत के सभी प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">धनिया की शाखाओं, पत्तियों और फलों से सुहावनी गंध आती है। जब पौधा छोटा होता है तो पूरा पौधा चटनी बनाने के काम आता है और इसकी पत्तियों से सब्जियों को सजाते हैं। फलों को पीसकर भांति-भांति की भोजन सामग्रियों, जैसे-अचार, सब्जियां, मांस इत्यादि में मसाले की तरह मिलाया जाता है। फल, कुछ मिठाइयों, पेस्ट्री एवं केक को भी स्वादिष्ट बनाने के लिए प्रयुक्त होता है।</p> <p style="text-align: justify;">चिकित्सा में धनिया के बीज वायुनाशक, पाचक्र , पित्तनाशक एवं तापहर समझे जाते हैं। यह विशेष रूप से दूसरी औषधियों की गंध को दबाने के काम में आता है। मुंह की दुर्गध दूर करने के लिए बीज चबाते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">भूमि और उसकी तैयारी</h3> <p style="text-align: justify;"><a href="../../../../../../agriculture/crop-production/91593e93094d92f92a94d93092393e93293f92f94b902-91593e-938902915941932/90992694d92f93e92893f915940-92b938932947902/92792893f92f93e-90992494d92a93e926928-915940-924915928940915/92792893f92f93e-915940-916947924940">धनिया की खेती </a>सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है परन्तु जल निकास वाली दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। भूमि की तैयारी से पहले 20-25 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद समान रूप से खेत में बिखेर दें। इसके बाद मिट्टी पलटने वाले हल से जूताई करें और फिर एक-दो बार कल्टीवेटर या हैरो चलायें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य दें ताकि मिट्टी भुरभुरी, नमी बनी रहे एवं खेत समतल हो जाय।</p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरक</h3> <p style="text-align: justify;">उचित मात्रा में उर्वरक का प्रयोग न करने से ऊपज कम मिलती है। अत: मिट्टी की जांच के बाद उर्वरकों का प्रयोग करना लाभप्रद होता है। यदि किसी कारणवश मिट्टी की जाँच नहीं हो सके तो 200 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 50 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हेक्टर की दर से अन्तिम जूताई के समय खेत में डालें । इसके अतिरिक्त 50 किलो नेत्रजन प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। अत: 55 किलो यूरिया पहली सिंचाई के बाद तथा 55 किलो यूरिया फूल आने से पहले खड़ी फसल में उपरिवेशन करें।</p> <h3 style="text-align: justify;"><span style="text-align: justify;">धनिया की </span>उन्नत किस्में</h3> <p style="text-align: justify;">राजेन्द्र स्वाति, पू डी-20, पन्त हरीतिमा एवं एल.सी.सी.-133</p> <h3 style="text-align: justify;">बुवाई का समय</h3> <p style="text-align: justify;">धनिया की बुवाई का समय इस बात पर निर्भर करता है कि आप बीज या हरी पत्तियों के उत्पादन हेतु उगा रहे हैं या दोनों के लिए । खरीफ मौसम में इसे अगस्त-सितम्बर में पत्तियों के लिए उगाया जाता है। बीज के लिए सर्वोत्तम समय अक्टूबर का तीसरा या चौथे सप्ताह है।</p> <h3 style="text-align: justify;">बुवाई की विधि</h3> <p style="text-align: justify;">अधिक ऊपज हेतु धनिया की बुआई पंक्तियों में करें। पंक्तियों से पंक्तियों की दूरी 30 सेमी. एवं पौधों की दूरी 20 सेमी. रखें। जब पौधे 5-6 सेमी लम्बे हो जायें तब घने पौधों को उखाड़ कर हरी पत्ती के रूप में व्यवहार करें। बीज को बोने से पहले उन्हें कुचलकर दो भागों में कर लें और 10-12 घंटे पानी में भिंगाने के बाद बुआई करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">बीज की मात्रा</h3> <p style="text-align: justify;">पत्तियों के लिए उगायी जाने वाली फसल की तुलना में बीज वाली फसल के लिए कम मात्रा में बीज की आवश्यकता होता है। पंक्तियों में बुआई करने पर औसतन 12-18 किलो बीज एक हेक्टेयर भूमि के लिए पर्याप्त होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">बीजोपचार</h3> <p style="text-align: justify;">बीज को उपचारित करने के लिए 3 ग्राम थिरम प्रति किलो बीज या 4 ग्राम ट्राइकोडरमा प्रति किलो बीज की दर से अच्छी तरह मिलाकर बुआई करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">सिंचाई</h3> <p style="text-align: justify;">पहली सिंचाई बुआई के तुरन्त बाद तथा दूसरी सिंचाई अंकुरण के 7 से 10 दिनों के बाद करें। रबी की फसल के लिए 4 से 6 सिंचाई पर्याप्त होती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">निकाई-गुड़ाई</h3> <p style="text-align: justify;">जब पौधे 4-5 सेमी. के हो जायें तब खेत से खर-पतवार निकाल दें तथा हल्की गुड़ाई कर दें। पौधों में फूल आने से पहले पौधे के चारों तरफ मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">कटाई</h3> <p style="text-align: justify;">साधारणतया बुआई के 40–45 दिनों के बाद पत्तियों की कटाई प्रारम्भ करते हैं तथा पुनः 15 दिनों के अन्तर पर काटें। किस्मों के अनुसार बीजोत्पादन हेतु बुआई के 120-150 दिनों के बाद फसल काटने लायक हो जाती है। जैसे ही दाने सुनहरे पीले रंग के हो जायें फसल की कटाई कर 5-6 दिनों तक छाया में सुखायें तथा उसके 7-8 दिन बाद धूप में सुखायें।</p> <h3 style="text-align: justify;">ऊपज</h3> <p style="text-align: justify;">यदि वैज्ञानिक विधि से खेती की जाय तो 50-75 क्विंटल हरी पत्तियाँ एवं 12-18 क्विंटल बीज की ऊपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">रोग ओर कीट</h3> <p style="text-align: justify;">धनिया में फफूंदी और गलने की बीमारियाँ लगती हैं। जब पौधे फूलते हैं, विशेषकर यदि मौसम नम और गीला हो, इसका प्रभावशाली उपचार इन्डोफिल एम-45 के 2.5 ग्राम प्रति ली. पानी में घोल कर छिड़काव करें।</p> <p style="text-align: justify;">धनिया स्वयं एक ट्रैप फसल के रूप में कार्य करता है एवं कीटों को अपनी ओर आकर्षित कर मुख्य फसल को कीटों के आक्रमण से बचाता है।</p> स्रोत: <a class="external_link ext-link-icon external-link" title="नए विंडोज में खुलने वाली अन्य वेबसाइट लिंक" href="https://dbtagriculture.bihar.gov.in/" target="_blank" rel="noopener"> कृषि विभाग, बिहार सरकार </a></div>