भूमिका भारत में पुष्प व्यवसाय में गेंदा का महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसका धार्मिक तथा सामाजिकअवसरों पर वृहत रूप में व्यवहार होता है। गेंदा फूल को पूजा अर्चना के अलावा शादी-व्याह, जन्म दिन, सरकारी एवं निजी संस्थानों में आयोजित विभिन्न समारोहों के अवसर पर पंडाल, मंडप-द्वार तथा गाड़ी, सेज आदि सजाने एवं अतिथियों के स्वागतार्थ माला, बुके, फूलदान सजाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है। गेंदा के फूल उपयोग मुर्गी के भोजन के रूप में भी आजकल बड़े पैमाने पर हो रहा है। इसके प्रयोग से मुर्गी के अंडे की जर्दी का रंग पीला हो जाता है, जिससे अंडे की गुणवत्ता तो बढ़ती ही है, साथ ही आकर्षण भी बढ़ जाता है। गेंदा के औषधीय गुण अपनी औषधीय गुणों के कारण गेंदा का एक खास महत्व है। गेंदा के औषधीय गुण निम्नलिखित है: कान दर्द में गेंदा के हरी पत्ती का रस कान में डालने पर दर्द दूर हो जाता है। खुजली, दिनाय तथा फोड़ा में हरी पत्ती का रस लगाने पर रोगाणु रोधी का काम करती है। अपरस की बीमारी में हरी पत्ती का रस लगाने से लाभ होता है। अंदरूनी चोट या मोच में गेंदा के हरी पत्ती के रस से मालिश करने पर लाभ होता है। साधारण कटने पर पत्तियों को मसलकर लगाने से खून बहना बंद हो जाता है। फूलों का अर्क निकालकर सेवन करने से खून शुद्ध होता है। ताजे फूलों का रस खूनी बवासीर के लिए बहुत उपयोगी होता है। भूमि गेंदा की खेती के लिए दोमट, मटियार दोमट एवं बलुआर दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है जिसमें उचित जल निकास की व्यवस्था हो। भूमि की तैयारी भूमि को समतल करने के बाद एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई करके एवं पाटा चलाकर, मिट्टी को भुरभुरा बनाने एवं कंकर पत्थर आदि को चुनकर बाहर निकाल दें तथा सुविधानुसार उचित आकार की क्यारियां बना दें। व्यवसायिक किस्में अधिक उपज लेने के लिए परम्परागत किस्मों की जगह केवल सुधरी किस्में ही बोनी चाहिए। गेंदा की कुछ प्रमुख उन्नत किस्में निम्न है: अफ्रीकन गेंदा: इसके पौधे अनेक शाखाओं से युक्त लगभग 1 मीटर तक ऊँचे होते हैं, इनके फूल गोलाकार, बहुगुणी पंखुड़ियों वाले तथा पीले व नारंगी रगं का होता है। बड़े आकार के फूलों का व्यास 7-8 सेमी. होता है। इसमें कुछ बौनी किस्में भी होती है, जिनकी ऊंचाई सामान्यतः 20 सेमी. तक होती है। अफ्रीकन गेंदा के अंतर्गत व्यवसायिक दृष्टिकोण से उगाये जाने वाले प्रभेद-पूसा नांरगी, पूसा बंसन्तु, अफ्रीकन येलो इत्यादि है। 2. फ्रांसीसी गेंदा: इस प्रजाति की ऊंचाई लगभग 25-30 सेंमी. तक होती है इसमें अधिक शाखाएं नहीं होती है किन्तु इसमें इतने अधिक पुष्प आते हैं कि पूरा का पूरा पौधा ही पुष्पों से ढँक जाता है। इस प्रजाति के कुछ उन्नत किस्मों में रेड ब्रोकेट, कपिड येलो, बोलरो, बटन स्कोच इत्यादि है। खाद एवं उर्वरक गेंदा की अच्छी उपज हेतु खेत की तयारी से पहले 200 किवंटल कम्पोस्ट प्रति हेक्टयेर की दर से मिट्टी में मिला दें। तत्पश्चात 120-160 किलो नेत्रजन, 60-80 किलो फास्फोरस एवं 60-80 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग प्रति हेक्टेयर की दर से करें। नेत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें। नेत्रजन की शेष आधी मात्रा पौधा रोप के 30-40 दिन के अंदर प्रयोग करें। प्रसारण गेंदा का प्रसारण बीज एवं कटिंग दोनों विधि से होता है इसके लिए 300-400 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के आवश्यकता होती है जो 500 वर्ग मीटर के बीज शैय्या में तैयार किया जाता ही, बीज शैय्या में बीज की गहराई 1 सेमी. से अधिक नहीं होना चाहिए। जब कटिंग द्वारा गेंदा का प्रसारण किया जाता है उसमें ध्यान रखना चाहिए कि हमेशा कटिंग नये स्वस्थ पौधे से लें जिसमें मात्र 1-2 फूल खिला हो, कटिंग का आकार 4 इंच (10 सेंमी.) लंबा होना चाहिए। इस कटिंग पर रुटलेक्स लगाकर बालू से भरे ट्रे में लगाना चाहिए। 20-22 दिन बाद इसे खेत में रोपाई करना चाहिए। रोपाई गेंदा फूल खरीफ, रबी, जायद तीनों सीजन में बाजार की मांग के अनुसार उगाया जाता है। लेकिन इसके लगाने के उपयुक्त समय सितम्बर-अक्तूबर है। विभिन्न मौसम में अलग-अलग दूरी पर गेंदा लगाया जाता है जो निम्न है: खरीफ (जून से जुलाई) - 60 x 45 सेमी. रबी (सितम्बर-अक्तूबर) – 45 x 45 सेमी. जायद (फरवरी-मार्च) – 45 x 30 सेमी. सिंचाई खेत की नमी को देखते हुए 5-10 दिनों के अंतराल पर गेंदा में सिंचाई करनी चाहिए। यदि वर्षा हो जाए तो सिंचाई नहीं करना चाहिए। पिंचिग रोपाई के 30-40 दिन के अंदर पौधे की मुख्य शाकीय कली को तोड़ देना चाहिए। इस क्रिया से यद्यपि फूल थोड़ा देर से आयेंगे, परन्तु प्रति पौधा फूल की संख्या एवं उपज में वृद्धि होती है। निकाई-गुडाई लगभग 15-20 दिन पर आवश्यकतानुसार निकाई-गुड़ाई करनी चाहिए। इससे भूमि में हवा का संचार ठीक रगं से होता है एवं वांछित खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। फूल की तोड़ाई रोपाई के 60 से 70 दिन पर गेंदा में फूल आता है जो 90 से 100 दिनों तक आता रहता है। अतः फूल की तुड़ाई साधारनतया सांयकाल में की जाती है। फूल को थोड़ा डंठल के साथ तोड़ना श्रेयस्कर होता है। फूलों की पैकिंग फूल का कार्टून जिसमें चारों तरफ एवं नीचे में अखबार फैलाकर रखना चाहिए एवं ऊपर से फिर अखबार से ढँक कर कार्टून बंद करना चाहिए। कीड़े लीफ हापर, रेड स्पाइडर, इसे काफी नुकसान पहुंचाते हैं। इसके रोकथाम के लिए मैलाथियान 0,1% का छिड़काव करें। बीमारी गेंदा में मोजेक, चूर्णी फफूंद एवं फुटराट मुख्य रूप से लगता है। मोजेक लगे पौधे को उखाड़कर मिट्टी तले दबा दें एवं गेंदा में कीटनाशक दवा का छिड़काव करें जिससे मोजेक के विषाणु स्थानांतरित करने वाले कीट का नियंत्रण हो इसका विस्तार एवं दूसरे पौधे में न हो। चूर्णी फुफुन्द के नियंत्रण हेतु 0.२% गंधक का छिड़काव करें एवं फुटराट के नियंत्रण हेतु इंडोफिल एम -45 0.25% का २-3 बार छिड़काव करें। उपज 80-100 किवंटल फूल/हेक्टेयर। स्त्रोत: राज्य बागवानी मिशन , बिहार सरकार