परिचय लेमनग्रास अथवा नींबू घास भारतवर्ष के विभिन्न भागों में उत्पन्न होने वाली वह प्रमुख घास है, जिसका उपयोग सुगंध उद्योग तथा औषधीय कार्यों में होता है भारत में कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, उड़ीसा आदि में लेमनग्रास की खेती बहुतायत की जाती है। लेमनग्रास की मुख्यत: दो किस्में पायी जाती हैं। पूर्वी भारतीय लेमनग्रास अथवा सिम्बोपोंगान फ़लैक्सूओसिस तथा पश्चिमी भारतीय घास जिले सिम्बोंपोगान सिट्रेटस के नाम से जाना जाता है। इनमें से सिम्बोपोंगान फ़्लैक्सूओसिस में आसवित किए जाने वाला तेल जिसे पूर्वी भारतीय तेल अथवा कोचीन तेल के नाम से जाना जाता है। की गुणवत्ता उच्च होती है आतता व्यवसायिक दृष्टि से इसे उपयोगी माना जाता है। लेमन ग्रास की रासायनिक संरचना एक जी.एल.सी, रिपोर्ट के अनुसार लेमनग्रास के तेल में पाए गए प्रमुख घटक निम्नानुसार हैं – सिट्रल ‘ए’ (46.60%), सिट्रल ‘बी’ (27.70%), फर्निसाल (3.00%), बोर्नियाल (1.90%), ट्रिफेनाइल एसिट्रेट (0.90%), अल्फ़ा टर्पिनियोल (2.25%), टर्पीनीन (0.50%), बीटा टर्पिनियोल (0.04%) तथा जिरेनियोल तथा निटौल (1.50%) मध्य भारत की स्थितियों में प्राय: 75% से अधिक सिट्रल वाले लेमनग्रास ऑइल को अच्छी गुणवत्ता का तेल माना जाता है। लेमनग्रास के प्रमुख प्रयोग (क) लेमनग्रास के तेल का उपयोग : लेमनग्रास पत्तों एवं पौधे के के तनें से आसवन विधि प्राप्त किया जाता है। इसके तेल का प्रमुख उपयोग साबुनों के निर्माण में प्रयुक्त की जाने वाली सूगंधियों, परफ्यूमरी, इत्र, अगरबत्ती आदि में किया जात्रा है। इसका उपयोग कई दवाइयों के निर्माण के लिए भी किया जाता है। इसके तेल को प्रक्रियाकृत करके उससे अल्फ़ा आयोनेन तथा बीटा आयोनेन बिटामिन ‘ए’ के निर्माण हेतु महत्वपूर्ण कच्चे माल का कार्य करते हैं। (ख) लेमनग्रास के पत्तों का उपयोग : लेमनग्रास के सूखे पत्तों का उपयोग हर्बल टी, लेमन टी, अथवा ऐसी ही अन्य हर्बल चाय के निर्माण के लिए किया जाता है। खेत की तैयारी लेमनग्रास की खेती की पांच वर्षीय फसल के रूप में की जाती है। अत: खेत की दो से तीन बार डिस्क हैरो से गहरी जुताई की जाती है। जुताई के बाद खेत में प्रति हेक्टेयर 35 टन के लगभग गोबर अथवा कंपोस्ट खाद डाला जाता है। भूमि लेमनग्रास के रेतीली दोमट तथा हल्की कपसिया मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त होती है। वैसे यह हल्की लैटेराईट मिट्टी में उगाई जाती है। सामान्य पी. एच. वाली भूमि इसकी खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है। जलवायु लेमनग्रास के लिए गर्म तथा हल्की कपासिया मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त पायी जाती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी फसल असिंचित फसल के रूप में ली जाती है। बुआई लेमन ग्रास की बुआई बीज अथवा स्लिप्स के द्वारा की जाती है। खेत तैयार होने पर लकड़ी की सहायता से 5 से 8 से. मी. की गहराई पर स्लिप्स लगाया जाता है। सिंचाई एवं उपजाऊ क्षेत्रों में रोपाई करते समय कतार से कतार की दूरी 60 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 30 से 45 सें. मी. रखनी चाहिए। लेमनग्रास की बुआई वर्ष में दो बार जुलाई अगस्त महीने में अथवा फरवरी – मार्च में की जाती है। किस्में व्यवसायिक दृष्टि से सीकेपी – 25, सुगंधी, प्रगति, प्रमाण आर.आर.एल – 16 कृष्णा और कावेरी आदि सर्वाधिक उपर्युक्त प्रजातियाँ हैं। खाद उर्वरकों की आवश्यकता: प्रति हेक्टेयर 150 किलोग्राम नाइट्रोजन 40 किलोग्राम पोटाश तथा 40 किलोग्राम फास्फोरस तथा पोटाश वर्ष के प्रारंभ एम् एक बार डाल देना चाहिए। जबकि नाइट्रोजन का उपनिवेश न प्रत्येक दो महीने में 10-10 किलोग्राम प्रति उपनिवेशन की दर से किया जाना उपयोगी होता है। सिंचाई गर्मी के दिनों में प्रत्येक 10 दिन में एक बार सिंचाई करने से पौधे का विकास अच होता है। अगर नियमित अन्तराल पर सिंचाई न की जा सके तो फसल की थोड़ी सूखने की अवस्था में सिंचाई आवश्यक रनी चाहिए। निदाई – गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण पांच वर्षीय लेमनग्रास की फसल में खरपतवार की समस्या केवल पहले पांच से छ: महीने तक होती है। और जब एक बार लेमनग्रास का पौध पर्याप्त मात्रा में बढ़ जाता है तो यह खरपतवार को पनपने नहीं देता है। इसलिए रोपाई के 40-50 दिनों के बाद एक बार हाँथ से निदाई गुड़ाई करने चाहिए। प्रमुख कीट पतंगे तथा बीमारियाँ लेमनग्रास चूंकि कठोर प्रवृति का पौधा है। अत: इस प्रकार के कीट पतंगों का आक्रमण नहीं होता है, जो इस फसल के उत्पादन को प्रभावित न कर सके। वैसे लेमनग्रास की फसल के प्रमुख रोग लीफ ब्लाईट, लीफ स्पॉट तथा पित्त रोग। लीफ ब्लाईट रोग लगने पर पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और सुखने लगती हैं इसके उपचार के लिए मेकोजेब या डायफेलेटान का 0.3% घोल पत्तियाँ पर छिड़काव उपयोगी होता है। लीफ स्पॉट के लिए डायथेन एम्- 45 के 0.3% घोल का 15-20 दिनों के अन्तराल पर छिड़काव करने से रोग नियंत्रित हो जाता है। फसल की कटाई बुआई के लगभग 5 से 6 महीने के उपरांत लेमनग्रास की फसल में लगभग 3 से 3.5 फीट तक ऊँची हो जाती है। इस अवस्था में इस घास को जमीन से 10 सेंमी. ऊपर से काट लिया जाता है। पहली कटाई में काफी कम मात्रा में घास प्राप्त होती है। किन्तु कटाई के उपरांत फसल तेजी से बढ़ता है। और प्रत्येक 90 से 100 दिनों के अन्तराल पर कटाईयां की जाती है। उपज की प्राप्ति पहली कटाई में प्रति हेक्टेयर मात्र 12 से 15 किलोग्राम तेल प्राप्त होता है। जबकि दूसरे वर्ष के उपरांत प्रति कटाई औसतन 50 किलोग्राम तेल प्राप्त होता है। इस प्रकार प्रथम वर्ष में दो या तीन कटाईयों में अधिकतम 100 किलोग्राम तेल प्राप्ति होती है। जबकि दूसरे वर्ष में औसतन चार कटाईयों में प्रतिवर्ष 200 किलोग्राम तेल प्राप्त होता है। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता: कृषि विभाग, बिहार सरकार