नई फसल की शुरुआत आलू की जन्मभूमि दक्षिण अमेरिका मानी जाती है। पेरू के लोग आज से २००० वर्ष पूर्व आलू की खेती करने लगे थे। भारत में वीं, सदी के शुरू में आलू की खेती प्रारम्भ की गई। यरोप के रास्ते भारत आने वाले पुर्तगाली अपने साथ इस नई फसल को ले आये। भारत में सबसे पहले गोआ, सूरत और कर्नाटक के इलाकों में इसकी खेती शुरू की गई। धीरे-धीरे इसकी खेती देश के सभी भागों में की जाने लगी। एक सैनिक अधिकारी ने १९ वीं सदी के प्रारम्भ में देहरादून की पहाड़ियों पर इसकी खेती करनी शुरू की। शीघ्र ही इसकी खेती उत्तर प्रदेश के सभी क्षेत्रों मि की जाने लगी। उत्तर प्रदेश के फरुखाबाद, मेरट, इलाहाबाद, बरेली, हल्द्वानी, देहरादून आदि जनपदों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। संस्कृत भाषा में अरबी, रताल, जैसी कंदमूल वाली फसलों को ‘आलू’ या ‘आलुक’ कहा जाता है। कन्द की यह नई फसल शायद इसीलिए आलू कहलाई। फसल एक, उपयोग अनेक आलू सब्जियों का राजा कहा जाता है। इसके अनेकों तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाये जाते हैं। जैसे रसीली-सुखी आलू की सब्जी, आलू की टिकिया, हलुआ खीर, चिप्स, पापड़ बड़ी आदि। इससे अच्छी किस्म का स्टार्च और इसे सुखाकर आटा भी बनाया जाता है। हमें अपने भोजन में इसका आधिक से आधिक उपयोग करना चाहिये। पौष्टिकता की खान आलू दूसरे अनाजों से पौष्टिकता में भी पीछे नहीं है। सौ ग्राम आलू में १.६ ग्राम बढिया प्रोटीन, ०.१ ग्राम चिकनाई, ९.७ मिलीग्राम लोहा, १० मिलीग्राम कैल्शियम और १८ से २२ प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। विटामिन ए.बी. और सी के लिए आलू अच्छा श्रोत है। आधा किलो आलू प्रतिदिन खाने से विटामिन ‘सी’ की हमारी दैनिक आवश्यकता पूरी हो जाती है। एक एकड़ आलू की खेती से हमें गेहूं और चावल दोनों की तुलना में अधिक कैलोरी, कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन मिलती है। यह भी अब पता चला है कि आलू खाने से मुटापा नहीं बढ़ता है। यह एक अच्छा भोज्य पदार्थ है। पोलैंड में एक वर्ष में एक व्यक्ति २४० किलो तक आलू का उपयोग कर लेता है। जबकि भारत में एक व्यक्ति केवल ३७ किलो आलू का उपयोग कर रहा है। हमे इसको अधिक खाने कि आदत डालनी चाहिये। गेहूं तथा दूसरे अनाजों के मुकाबले इसकी पैदावार भी अधिक है और इसका उपयोग सस्ता पड़ता है। भूमि का चुनाव आलू कि खेती के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी सबसे अधिक उपयुक्त है। रेतीली दोमट मिट्टी में इसकी पैदावार अधिक होती है। जो भूमि इसकी खेती के लिए चुनी जाय उसमें पानी कि निकास अच्छा होना जरुरी है। हल्की तेजाबी भूमि में इसकी फसल अच्छी चलती है। खारी भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। गांव के पास कि गौहानी मिट्टी में इसकी फसल अच्छी होती है। खेत की तैयारी एक-दो जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद ५-६ जुतैई देशी हल से करनी चाहिए। ७ से ९ इंच कि गहराई तक मिट्टी भुरभुरी बना लेनी चाहिए। यदि गोबर कि खाद डालनी हो तो बुबाई से एक माह पूर्व खेत में मिला दें। उर्वरकों कि बताई गयी मात्रा आखिरी जुताई के साथ डालें। बुवाई गुलाबी जाड़े का मौसम आलू कि बुवाई के लिए अधिक उपयुक्त है। पौधों में आलू बनते समय भी ठंडे मौसम का होना जरुरी है। इस प्रकार देश के किसी न किसी भाग में आलू कि खेती बारहों महीने होती रहती है।उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में मार्च के महीने में इसकी फसल बोई जाती है। निचली पहाड़ी घाटियों में सितम्बर और फ़रवरी माह में इसकी बुवाई की जाती है। मैदानी क्षेत्रों में इसकी अगैती किश्मे १५ सितम्बर से १० अक्टूबर और पिछौती किस्में १ नवम्बर से १५ दिसंबर तक बोई जाती है। महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में बरसात में भी की जाती है। कुफरी देवा और सिंदूरी किस्में दिसम्बर में बोने से अच्छी पैदावार देती है। उन्नतिशील किस्में कुफरी चंद्रमुखी (ए. २७०८): यह ९० से १०० दिन में पकने वाली अगैती किस्म है। मैदानी इलाकों के लिये यह अधिक उपयुक्त है। इसके आलू सफ़ेद और अंडाकार होते हैं। कुफरी ज्योति : यह भी अगैती किस्म है। जो बुवाई के ८० दिन बाद खुदाई के लिए तैयार हो जाती है इस किस्म पर झुलसा रोग का कम असर होता है। हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों के लिए यह किस्म अधिक उपयुक्त है। कुफरी सिंदूरी (सी.१४०): यह पिछौती किस्म है। इसकी फसल ११५ से १२० दिन में पककर तैयार हो जाती है। आलू गोल गुलाबी रंग का होता है। मैदानी इलाकों के लिए यह किस्म अच्छी मानी गई है। कुफरी देवी (सी. ३८०४) यह भी एक पिछौती किस्म है। जिसकी फसल ११० से १२० दिन में तैयार होती है। आलू गोल सफ़ेद रंग के होते हैं। मैदानी इलाकों में इसकी पैदावार अधिक होती है। कुफरी ज्योति (जी. २४२५): और कुफरी शितमान : यह किस्में ऊँचे पर्वतीय इलाकों के लिए अच्छी मानी गई हैं। निचले पहाड़ी इलाकों में जी. २५२४ अधिक उपज देती है। इस किस्म का आलू बड़ा और लम्बा होता है। जिसे उपभोक्ता अधिक पसंद करते हैं। इसमें दूसरे आलू की किस्मों के मुकाबले दुगनी करोतिनया या विटामिन ‘ए’ पाया जाता है। बीज कोल्ड स्टोरेज (शीत घर ) में रखा हुआ रोग रहित अच्छी किस्म का बीज ही इस्तेमाल करना चाहिए। वुवाई से पहले बीज को ‘एरिटन’ के ०.२५ प्रतिशत घोल में पांच मिनट डुबाकर दस बारह घंटे तक छाया में फैला देना चाहिए। इससे रोग और कीटाणुओं का असर कम हो जाता है। बड़े आलूओं को हमेशा उनकी लम्बाई की दिशा में काट कर बोयें। प्रतियेक टुकड़े में दो तीन आंखे होना आवश्यक है। एक एकड़ में बुवाई करने के लिए ८ से १० क्विंटल बीज की जरुरत पड़ती है। आलू का बीज ६ से. से ८ सेंटीमीटर की गहराई पर कतारों में बोया जाता है। कतार से कतार की दूरी १५ से २० सेंटीमीटर रखी जाती है। १५ अक्टोबर से पहले बोने वाले आलुओं को ‘देयाथिन’ ऍम – ४५’ नामक फफूंदी नाशक दवा के २५ प्रतिशत घोल में ५ मिनट तक डुबोकर बोयें। खाद आलू की अची फसल लेने के लिए ४० इ ४८ किलो नेत्रजन, २४ से ३२ किलो फासफोरस और २४ से ३२ किलो फास्फोरस और २४ से ३२ किलो पोटाश वाले उर्वरकों की प्रति एकड़ जरुरत होती है। बलुई मिट्टी में उर्वरकों की वास्तविक आवश्यकता का पता लगाने के लिए मिट्टी की जाँच करा लेना अच्छा रहता है। सिंचाई वाले पहाड़ी क्षत्रों में ३२ से ४० किलो नाइट्रोजन, ४० से ४८ किलो फास्फोरस और ३२ से ४० किलो पोटाश की जरुरत प्रति एकड़ पड़ती है। असिंचित पहाड़ी इलाकों पर २४ से ३२ किलो नाइट्रोजन और इतनी ही मात्रा में पोटाश और फास्फोरस वाले उर्वरकों को एक एकड़ फसल में प्रयाप्त होता है। आखिरी जुताई के साथ फास्फोरस, पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा मिट्टी में मिला दी जाती है। एक चौथाई नाइट्रोजन पौधों पर पहली बार मिट्टी चढ़ाते समय और शेष यूरिया के पांच प्रतिशत घोल के रूप में या खड़ी फसल में सिंचाई के समय डालें। सिंचाई बलुई भूमि में औसतन ६ से ८ सिंचाइयों की जरुरत पड़ती है। निचले पहाड़ी क्षेत्रों में जहां हर माह थोड़ी-थोड़ी वर्षा होती रहती है दो तीन सिंचाइयों से भी काम चल जाता है। बोये गये आलू जब ५ प्रतिशत उग आयें तब पहली सिंचाई करनी चाहिए, सिंचाई करते समय इस बात का ध्यान रखा जाय कि पानी मेढ़ के ऊपर न चढ्ने पाए। सिंचाई कि आवश्यकता वर्षा पर निर्भर करती है। निराई-गुड़ाई पहली सिंचाई के बाद खरपतवार निकालने के उद्देश्य से हल्की निराई-गुडाई करनी चाहिये। यदि आलू समतल खेत में बोये गये हैं तो दूसरी सिंचाई के बाद उसके तनों पर ६ से ८ इंच ऊंचाई तक मिट्टी चढ़ाना चाहिये। यदि समय पर मिट्टी नहीं चढाई जाती तो आलू हरे रंग के हो जाते हैं और उनकी पैदावार भी कम हो जाती है। भुरभुरी मिट्टी में आलू अच्छा बैठता है। रोग और कीड़ें फफूंदी रोग : इस रोग से छुटकारा पाने के लिए बुवाई के ३ दिन बाद दयाथिन एम् -४५ या दयाथिन ७८ नामक फफूंदी नाशक दवाओं का छिडकाव अच्छा रहता है। एक हजार लीटर पानी में ढाई किलो दवा का घोल बनाकर एक हेक्टेयर के हिसाब से छिड़कना चाहिए जरुरत पड़ने पर इसी दवा का छिड़काव दो तीन बार और करें। चेपा और लस्सी :इन रोगों का रोकथाम के लिए मेटासिस्टाक्स नामक दवा का छिड़काव करें। १००० लीटर पानी में एक लीटर दवा का घोल बनाकर छिड़कें। यह घोल ढाई एकड़ के लिए काफी है। बालदार सुंडी : इसको थायोडान से मारा जा सकता है। एक हजार लीटर पानी में डेढ़ लीटर थायोडान घोलकर छिड़कें। यह घोल एक हेक्टेयर के लिए काफी होता है। दीमक : खेत की तैयारी करते समय आखिरी जुताई के साथ ४५ किलो द्रदिन (५ प्रतिशत ) या ७५ किलो हेप्टाक्लोर (३ प्रतिशत) धूल को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में मिलायें। रस चूसनेवाले कीड़े : इनसे फसल को बचाने के लिये बुवाई से पहले १० या १५ किलो थीमेट दवा प्रति हेक्टेयर काम में लायें। स्रोत : हलचल, ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान