परिचय जनसंख्या की वृद्धि के साथ-साथ अनाज के उत्पादन में भी वृद्धि होना आवश्यक है। उत्पादन बढ़ाने के दो ही उपाय हैं, या तो कृषि योग्य भूमि का रकबा बढ़ाय जाए या पति एकड़ उपज बढ़ाया जाए। कृषि योग्य भूमि का क्षेत्र बढ़ाने की संभावना बहुत कम हैं। इसलिए उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रति एकड़ बढ़ाना ही एकमात्र उपाय है। कृषि निदेशालय एवं कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक सतत प्रयत्नशील है। अहिक उपज के लिए अच्छे बीज, समय पर बुआई, उचित पौधा संरक्षण, उचित पौष्टिक तत्व, अच्छे खेत के तैयारी एवं उचित दुरी में बुआई इत्यादि जरूरी है। अच्छे खेत की तैयारी, समय पर बुआई, उचित पौधा संरक्षण, सामयिक खरपतवार नियन्त्रण, फसल कटाई एवं जुताई के लिए उन्नत कृषि यंत्रों की आवश्कता है। झारखण्ड के पठारी क्षेत्रों की मिट्टी जलसाधारण क्षमता कम और जल्द ही भूमि के ऊपरी सतह की नमी की कमी आ जाती है। किसानो को खेती की तैयारी एवं बुआई के लिए बहुत कम समय मिलता है। उन्न्त कृषि यंत्रों की कमी के कारण किसानों को बाध्य होकर बीज को जमीन उपस्थिति में जमीन पर छिड़क देना पड़ता है। इसमें किसानों को अधिक बीज भी लगाना पड़ता है, साथ-साथ अनुकरण भी कम एवं असमान होता है। जुताई यंत्र अविकसित जुताई यंत्र (देशी हल) से अच्छी तरह जमीन की तैयारी नहीं हो सकती है। जिसके कारण पौधे के जड़ों का विकास ठीक तरह से नहीं हो पाटा है और पौधा पूर्ण स्वस्थ एवं विकसित नहीं हो पाटा है। फलतः उपज में कमी हो जाती है। देशी हल के स्थान पर अगर किसान मिट्टी पलटने वाला हल (मोल्बोर्ड हल) या बिरसा रिजर हल से करें तो अच्छी जुताई के साथ-सतत समय का भी बचत होता है। मोल्बोर्ड हल से जुताई करने से “L” आकार का कुड बनता है जिसमें एक ही जुताई में सपूर्ण खेत की जुताई हो जाती है। वहीं पर एशि हल से जूताई करने से “V” आकार का किड बनता है जिसमें सपूर्ण जुताई के लिए कम से कम तीन बार जुताई करनी पडती है। देशी हल से जुताई करने पर ढेला उठता है वहीं मिट्टी पलटने वाला हल से ढेला नहीं उठता है जिससे जमीन तैयारी करने में आसानी होती है। मोल्डबोर्ड हल बहुत आकार में उपलब्ध है। पशु चालित मोल्डबोर्ड हल 15 एवं 20 सेमी, में उपलब्ध है रप यह हल यहं के बैलों की शक्ति का आकलन कर 10 सेंमी. का हल बनाना जिसे यहाँ के स्थानीय बैल आसानी से खींच लेते हैं। इस हल से दिन भर में 0.16 हेक्टेयर की जुताई की जा सकती है। अगर किसान ट्रेक्टर द्वारा जुताई करें अरु 4.0 सेमी. आकार क हल वाला बटम प्रयोग करें तो दिन भर में 7 से 8 हेक्टेयर जुताई कर सकते हैं।जहाँ पर मिट्टी चिपचिपा हो, अधिक कड़ी हो या कंकड़ल पथरीली हो वहाँ मोल्डबोर्ड हल से अच्छी जुताई नहीं होआ सकती हैं वैसे स्थान पर तवादार हल का उपयोग करना चाहिए। तवादार हल भारी होती है, इसलिए बैलों द्वारा चलाना संभव नहीं है। यह ट्रैक्टर चालित हल है। प्रथम जुताई मिट्टी पलटनें वाले हल से करने बाद खेत की पूर्ण तैतयारी के लिए पशुचारित बरिसा रिजर हल या पांच फारा या तीन फारा कल्टीवेटर से करें। कल्टीवेटर जिस किसान के पास हैं वे कल्टीवेटर या त्वदार हैरों द्वारा खेत की तैयारी करें । तवादार हैरों खतपतवार को काटकर छोटा कर देता है और खेत में मिला देता हैं। खेत को बुआई के लिए समतल करना जरती है के लिए उन्त्र पाटा का उपयोग करना चाहिए। यह पाटा बैल चालित एवं ट्रैक्टर चालित दोनों में उपलब्ध है। पाटा चला देने से ढेला टूट जाता है एंव बचा हुआ खतपतवार भी बाहर निकल जाता है। बुआई यंत्र झारखण्ड के किसान इस वैज्ञानिक युग में भी पुरानें औजारों का ही उपयोग मुखतः धान, गेहू या अन्य फसलों की बुआई के लिए कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण उन्नत बुआई यंत्रों एवं उनसे फायदे के बारे में किसानों को सही जानकारी नहीं मिल पाना है। बुआई यंत्र उपयोग न कर किसान बीज को तैयार कहत के उपर छिडक देते हैं। जिसके कारण सभी बीज को उचित नमी नहीं मिल पाता है और अंकुरण नहीं हो पाटा है साथ ही साथ पौधे असामन दुरी पर उगते हैं जिससे सभी पौधों को एक सामान जमीन से पोषक तत्व नहीं मिला पाटा है। छिड़काव विधि से बुआई किये हुए फसल में खरपतवार नियत्रण करना कठिन है, क्योंकि कोई भी निकाई-गुडाई यंत्र उपयोग नहीं किया जा सकता है। बाजार में पशुचारित एवं ट्रैक्टर चालित बुआई एवं यंत्र उपलब्ध है। किसान आवश्कतानुसार किसी भी यंत्र का उपयोग कर सकते हैं। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने पशु चालित बुआई यंत्र विकसित किया है जिसे “बिरसा बीज-सह-खाद ड्रिल” के नाम से जाना जाता है। इस यंत्र से कई प्रकार के फसलों की बुआई की जाती है। जैसे- धान, गेहू, राइ, सरसों, सरगुजा, मुंग चना, मसूर, कुसुम इत्यादि। इसके डरा बोआई के समय पाउडर अथवा दानेदार रासायनिक खाद बीज के बगल में 3 सेमी. हटकर तथा 3 सेमी. नीचे पट्टी में गिराया जाता है। इसके मुख्य भाग हैं कुड खोलने भाग बीज नियत्रक प्रणाली सीड प्लेट बीज नली खाद नियंत्रक संयंत्र हरीस बुआई के समय पर ध्यान हे की पहिया बराबर जमीन से लगा रह नहीं तो बीज का गिरना रुक जाएगा। हाँ अंतर लेते समय जब बीज गिराना न चारे तो मशीन को बांयी ओर झुका कर पहिए को उठा सकते हैं जिससे उसका चलना रुक जाता है। इस यंत्र से औसतन प्रतिदिन 0.2 हेक्टेयर जमीन की बुआई की जा सकती है तथा खर्च 500 से 600 रूपये प्रति हेक्टेयर पड़ता है। इसको छोटे बैल भी आसानी से खींच सकते हैं। किसान अधिक जानकारी एवं खरीदने के लिए कृषि अभियन्त्र विभाग, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, कांके, रांची से प्राप्त कर सकते हैं। इस बुआई यंत्र के अलावा डीप फर्रों सीडर ड्राईलैंड सीडर, मल्टीरो सीडर उपलब्ध है। उपलब्धता के अनुसार कोई भी बुआई यंत्र किसान खरीद कर उपयोग कर सकते हैं। ट्रैक्टर चालित बुआई यंत्र बाजार में उपलब्ध है यह यंत्र खरीदते समय यह ध्यान रखें की बुआई यंत्र उसी मेक का हो जिस मेक का ट्रैक्टर है। निकाई-गुडाई यंत्र यह यंत्र मानव चालित, पशु चालित या ट्रैक्टर चालित होते हैं चाहे यह यंत्र मानव, पशु या ट्रैक्टर द्वारा चालित जाएँ पर इन यंत्रों के मुख्य दो भाग होते हैं। एक मिट्टी के अंदर कम रक्त अहै जिसे फाल कहते हैं, दूसरा भाग जिससे फाल जुडा होता है जिसे जत्था कहते हैं। परम्परागत मावन चालित यंत्र में खुरपी, कुदाल, फल्वड़ा प्रमुख हैं। उन्न्त यंत्रो में डच हो, ग्रब्रर ड्राईलैंड विडर, पहियादार व्हील हो प्रमुख हैं। निकाई-गुडाई का कार्य अगर खुरपी से किया जाता है तो एक हेक्टेयर निकाई के लिए 50 मजदूर की आवश्कता होगी, वहीं अगर डच हो से किया जाता है तो 15 मजदूर एवं ग्राबर 10 से 12 मजदूर प्रति हेक्टेयर लगाना पड़ता है। पशु चालित यंत्र में कल्टीवेटर एवं ब्लेडो हैरो प्रमुख है। बिहार कल्टीवेटर पांच फारा यंत्र, पिछले दोनों फारों को खोलकर या तीन फार वाला कल्टीवेटर बन जाता है। गन्ने की खेती में पांच फार वाला यंत्र बहुत उपयोगी सिच्छ हुआ है। अन्य फसलों के लिए तीन फारा कल्टीवेटर ज्यादा इस्तेमाल होता है। पांच फारा वाला कल्टीवेटर से दिनभर में 0.8 से 1.0 एकड़ तथा 3 फार वाले कल्टीवेटर से 0.4 से 0.6 एकड़ एक जमीन की निकाई-गुडाई की जा सकती है। ब्लेड हैरो या बखर भी खतपतवार नियन्त्रण के लिए प्रमुख यंत्र है। जब खेत में फसल न हो तो गर्मी या अन्य मौसम में इस यंत्र को चलाने से खतपतवार कट जाते हैं या उखड़ जाते हैं जो कड़ी चुप में सुखकर नष्ट हो जाते हैं। इस यंत्र से दिनभर में 0.5 से 1.0 एकड़ तक की निकाई-गुडाई की जा सकती है। । निकाई-गुड़ाई के लिए ट्रैक्टर चालित यंत्र 7 से 15 सोवेल वाला कल्टीवेटर उपयोग में लाया जाता ही। इन यंत्रों से एक घंटे में लगभग 1. 0. से 1.5 एकड़ तक की निकाई-गुडाई की जा सकती है। । रोपा धान, जिसकी रोपाई पंक्ति में हुई है, निकाई-गुडाई के लिए जपानी पैडी विडर, एवं कोनो पैडी विडर उपयोग में लाए जाते हिन्। जापानी पैडी विडर 15 सेमी. एवं 25 सेमी, के दो साइजों में उपलब्ध है। कोनो विडर अभी सिर्फ 15 सेमी, के दो साइजों में उपलब्ध है। इन यंत्रों को एक आदमी खड़ा होकर कतारों में आगे पीछे करके चलाया जाता है ताकि मिट्टी और पानी एक दूसरे से मिल जाए तथा घास एवं खरपतवार नष्ट हो जाए। इस यंत्र से एक आदमी दिनभर में लगभग 0.२ एकड़ जमीन की निकाई-गुड़ाई कर लेता है। फसल कटाई यंत्र भारत में आज भी फसल की कटाई के लिए अधिकांश खेतों पर हंसिए का उपयोग किया जाता है। देशी हंसिया (वैभव एवं नवीन) का उपयोग करना चाहिए। देशी हंसिया से जहाँ एक मजदूर से केवल एक डिसमिल प्रति घंटा की कटाई की जाती है वहीं वैभव या नवीन हसिया से करीब २.5 डिसमिल प्रति घंटा फसल की कटाई की जा सकती है। अब फसल कटाई के लिए छोटा मशीन उपलब्ध है। जिसे सेल्फ प्रोपेल्ड भरटिकल कानवेयर रीपर कहते हैं। यह यंत्र यहाँ के किसानों के लिए उपयोगी हैं क्योंकि इसे छोटे-छोटे खेतों में भी चलाया जा सकता है। इसे 3 या 5 अश्व शक्ति के इंजन के द्वारा चलाया जाता है। इंजन डीजल या किरासन तेल से चलाया जाता है। इंजन का उपयोग कटरबार को चलाने के लिए किया जाता है। कटरबार की लबाई 1.0 मीटर से 1.२ मीटर होती है। इस मशीन से एक घंटा में 0.275 हेक्टेयर धान एवं 0.२ हेक्टेयर गेंहू की कटाई की जाती है। रीपर से फसल कटाई का खर्च देशी हंसिया की तुलना में 12-13 गुना कम है। इससे दाना नहीं झड़ता है। इंजन में तेल की खपत लगभग एक लीटर प्रति घंटा है। गहाई (दौनी) यंत्र भारत वर्ष में फसलों की गहाई (दौनी) मुख्यतः मानव द्वारा या बैलों द्वारा रौंदकर की जाती है। इस विधि में तकनीकी जानकारी की आवश्कता नहीं पडती है। पशु चालित ओल पाड दौनी मशीन उपलब्ध है। यह एक लोहे की मशीन है जिसमें बीस तवे तीन पंक्तियों में लगे होते हैं। इस म्ह्सिं को एक जोड़ी बैल से खीचा जाता है इस मशीन से 16 घंटों में लगभग 5 से 6 किवंटल भूसा निकाला जा सकता है। सूखे फसल को पशुओं के स्थान परट्रैक्टर द्वारा रौंदकर की जाती है। इस विधि से करीब 150 से 200 किलो प्रति घंटा दौनी कर दाना अलग किया जाता है। दौनी यंत्र हमारे देश में अधिकतर किसान के पास पूंजी एवं तकनीक जानकारी की कमी है। फिर भी शक्ति चालित मशीन का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। दाने को फसल से अलग करने के अलावा कई दौनी मशीन से सफाई करने, छटाई करने तथा बोर में भरने का प्रावधान भी होता है। दौनी मशीन में सूखे फसल को हाथ से फीडिंग इकाई में डाला जाता है। वहाँ से स्वतः थ्रेसिंग इकाई में चला जाता है। थ्रेसिंग इकाई में दांतदर, हैमरमील टाइप, रास्पबर टाइप इत्यादि में किसी एक टाइप का सिलिंडर लगा होता है जिससे घुमने से फसल से दाना अलग हो जाता है तथा दाना और भूसा का मिश्रण को दोलन छलनी के ऊपरी सतह पर गिरते समय हवा का झोंका प्रवाहित किया जाता है। जिससे दाना और भूसा अलग हो जाता है। दानों को छोड़कर चुश्क (एस्पिरेटर) या पंखा भूसे, तिनके आदि को चूसकर या उड़ाकरमशीन से बाहर फ़ेंक देता है। साफ दाने तो दूसरे छलनी पर गिर जाते हैं था दौनी नहीं हो पाए दानों के अंश बड़े आकार के भूसे समेत ऊपरी छलनी के ऊपर से जमीन पर गिर जाते हैं। कुछ थ्रेसर में ठीक से दौनी नहीं हुए दानों आदि को पुनः सिलिंडर में भेजने की व्यवस्था होती है। दूसरी छलनी से दानों को धुल तथा छोटे कणों एवं खतपतवार को बीजों से अलग करने जमीन पर गिरा दिया जाता है। कुछ थ्रेसरों में छलनी से आये हुए साफ दानों को उठाकर बोरियों में भरने का भी प्रावधान होता है। इस मशीन द्वारा एक घंटा में करीब 200 से 250 किलो दाना दौनी किया जाता है। किसान को अभी भी केवल कीमत को ध्यान में रखकर सस्ते कीमत की निम्नकोटि का कोई भी यंत्र नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि अंततः ऐसे मशीन प्रचलन में महंगी पडती है। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : समेति, कृषि विभाग , झारखण्ड सरकार