परिचय पपीता अपने स्वास्थ्यप्रधान गुणों एवं अधिक लाभ के कारण बहुत ही लोकप्रिय फल है। इसकी खेती उष्ण एवं समशीतोष्ण क्षेत्रों में अधिक होती है। छोटानागपुर क्षेत्र पपीते के लिए काफी प्रसिद्ध है। यहाँ की स्थानीय जातियां उत्तम गुणों वाली तथा पैदावार में काफी वृद्धि देनी वाली होती है। पपीते के पौधे ६.५ से लेकर ७.०० पी. एच. वाली मिट्टी में अच्छी तरह उगते हैं। यदि भूमि का पी.एच. कम हो तो उसे भूमि में चूना डालकर सुधार लेना उचित होगा। चूने के प्रभाव से मिट्टी की सरंचना में बदलाव आता है तथा मिट्टी की अम्लीयता कम हो जाती है। इसके अतिरिक्त यौगीकृत तत्व पौधों को आसानी से मिलने लगते हैं। किस्में पपीते की अनेक किस्में हैं लेकिन छोटानागपुर में स्थानीय रांची, पूसा ड्वार्फ, पूसा डेलीसियस एवं पूसा मैजेस्टिक की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। नर्सरी लगाना एक हेक्टयर भूमि में पपीता लगाने के लिए २५०-३०० ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। इस क्षेत्र में अक्टूबर में बीज बोना उचित रहता है। इसकी रोपाई फरवरी में करनी चाहिए।उपरोक्त समय के बुआई करने से बीमारी का प्रकोप कम होता है तथा अधिकतम पैदावार भी मिलती है। जुलाई में बुआई करने पर सबसे अधिक बीमारी का प्रकोप पाया गया।पौधे विशेष रूप से तैयार की गई क्यारियों अथवा पोलीथीन की थैलियों में उगाये जा सकते हैं। एक दो माह में लगाने योग्य हो जाते हैं। जल निकास एवं रोगों का समय से निदान पौधशाला में अच्छे पौधे तैयार करने के लिए अति आवश्यक है। खेत की तैयारी एवं रोपाई खेत का चुनाव करने के बाद २X२ मी. दूरी पर 45X45X45 से. मी. आकार के गड्ढे खोदकर एकसप्ताह के लिये खुला छोड़ दें ताकि मिट्टी में अच्छी तरह धूप लग जाये। इस तरह कीड़ों एवं रोगों का प्रकोप कम हो जाता है। इसके बाद गडडों की ऊपरी १५-२० से.मी. मिट्टी में १० कि.ग्रा. गोबर की खाद, १ कि.ग्रा हड्डी का चूर्ण एवं १००-१५० ग्रा. एल्ड्रिन धूल मिलाकर भर देना चाहिए। जब पौधे करीब दो माह के हो जायें तो उन्हें इन गड्ढों में लगाया जा सकता है। एक गड्डे में ३ पौधे त्रिकोण विधि से लगाने चाहिए जिन्हें लिंग भेद के बाद छांट कर एक पौधा प्रति गड्डा कर दिया जाता है। द्विलिंगी किस्मों में एक पौधा प्रति गड्डा की दर से लगाना चाहिये। अंतरसयान पौधों के बीच कि खाली जगहों में दाल वाली फसलें अथवा सब्जियां जैसे: मटर, सेम इत्यदि लगाई जा सकती है। लिंग भेद एवं अनावश्यक पौधों की छटाई पौधों में फूल आने के बाद लिंग भेद आसानी से हो जाता है। अच्छी फसल के लिये १०-१६ प्रतिशत नर पौधे आवश्यक हैं। जब प्रत्येक गड्डे पर एक पौधा रह जाये तो पेड़ के चारों तरफ ३० से.मी. कि गोलाई में ८-१० सें. मी. ऊँची मिट्टी अवश्य चढ़ा दें। पूसा देलिसियास जाति में अलग से नर पौधे लगाने कि आवश्यकता नही है। इसमें शत प्रतिशत मादा एवं द्विलिंगी फूल आते हैं। उर्वरक पपीते कि अच्छी पैदावार के लिये ४०० ग्रा. यूरिया, १२५० ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा ३५० ग्रा. मुरियेत आफ पोटाश प्रति पौधा की दर से देना चाहिए। इन उर्वरकों का आधा भाग बरसात के समाप्त होने के समय सितम्बर माह में देना चाहिए। सिंचाई पपीते के बाग में जाड़ों में १५-२० दिन पर तथा गर्मियों में १२-१५ दिन पर सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई करते समय ध्यान रहे कि पानी का सम्पर्क पौधों के तने से न हो तथा खेत में पानी न जमा रहे। निराई-गुड़ाई लगातार सिंचाई करते रहने से मिट्टी की सतह कड़ी हो जाती है जिससे पौधों कि वृद्धि पर कुप्रभाव पढ़ता है। इसलिए यह जरुरी है कि हर तीन सिंचाइयों के बाद अच्छे मौसम में हल्की सी गुड़ाई करें। पाला, आँधी एवं तूफान से रक्षा सिंचाई एवं घास फूस से ढक कर पाले से पौधों की रक्षा की जा सकती है। बाग के चारों तरफ जैत या अन्य हवा अवरोधक पौधे लगाने से ठंडी अथवा तेज हवाओं से पौधे की रक्षा की जा सकती है। बीमारियाँ एवं रोकथाम १. विषाणु (वायरस) : पपीते में कई प्रकार के वायरस रोग लगते हैं, जिनके कारण फलों कि गुणवत्ता काफी प्रभावित होती है तथा फल निम्न कोटि के होते हैं। इस बीमारी का कोई उचित नियन्त्रण नहीं है। फिर भी पौधे लगाने के समय में परिवर्तन एवं बीमारी को फ़ैलाने वाले कीड़े की रोकथाम करके उक्त बीमारियों से बचाव किया जा सकता है। २. जड़ तथा तनों का सड़ना : यह बीमारी एक फफूंदी के कारण होती है। इसकी रोकथाम एक प्रतिशत बोर्डो मिश्रण के छिड़काव द्वारा की जा सकती है। ३. फलों का सड़ना : यह बीमारी भी एक फफूंद के कारण होती है। इसमे फल सड़ने लगते हैं। इसकी रोकथाम डायथेन जेड -७८ (०.२%) अथवा बाविस्टिन (०.१%) के छिड़काव से की जा सकती है। पैदावार वैज्ञानिक तरीके से खेती करके प्रति हेक्टेयर ८०-९० टन फल प्राप्त किये जा सकते हैं। एक हेक्टेयर पपीते के बाग से साधारणतया २०,०००-२५,००० रूपये तक आर्थिक लाभ प्राप्त हो जाता है। पपीते के रोग तना या पाद सड़न रोग करकी : पिथियम बफेनिदार्मेतं पिथियम दिबेरिअनाम रैजोकतोनिया सोलेनइए फैतोप्थोरा पैरासितिका लक्षण : तने के निचले भाग के छाल पर जलीय (गीले) चकते बनते हैं जो बाद में बड़ कर तने को चारों तरफ घेर लेते हैं। ऊपरी पत्तियां मुरझा कर पीली हो जाती हैं और पत्तियां गिर जाती हैं। रोगी पौधों में फल नहीं बनते हैं और यदि बन भी जाते हैं तो गिर पड़ते हैं। तने के आधार के सड़ जाने के कारण पूरा पौधा टूट कर गिर जाता है। पौधशाला में छोटे पौधे आर्द्र पतन के लक्षण प्रकट करते हैं। नियन्त्रण के उपाय १. बगीचे में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए। २.रोगी पौधों को जड़ सहित उखाड़ कर जला देना चाहिए और रोगी पौधों के स्थान पर दूसरे पौधे को नहीं लगाना चाहिए। ३. जून, जुलाई और अगस्त के महीनों में पौधों पर आधार से सें. मी. कि ऊंचाई तक बोर्डो पेस्ट (१:१:३) लगाकर मिट्टी में तनों के चारों तरफ बोर्डो मिश्रण को (६-६-५० संद्ता वाले ) ५ लीटर प्रति पौधा डालना चाहिए। ४. पौधशाला की मिट्टी को कैस्ताफ़ (०.२%) से उपचारित करना चाहिए, और बीज को भी उपचारित करना चाहिए। फल सड़न रोग कारक : कई कवक जैसे कोलेतोत्रिकम पपायी, ग्लओस्पोरियम पपायी, बन्त्त्योदिप्लोदिया, एस्कोकैता कैरकी एवं मिक्रोफोमिना फैजिओलाए। लक्षण : अधपके एवं पके फल रोगी होते हैं। इन पर छोटे, गोल, पीले धब्बे बनते हैं। बाद में ये बढ़कर आपस में मिल जाते हैं तथा इनका रंग भूरा हो जाता है। ये फल में धंसे तथा घेरे वाले होते हैं। अंत में फल सड़ जाते हैं। नियन्त्रण के उपाय : १. फल लगने के एक महीने बोर्डों मिश्रण (२:२:५०) या ब्लैएटोक्स-५०.२ ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। १५-२० दिनों के बाद ३-४ छिड़काव अधिक लाभदायक होता है। पत्ती का चित्ती रोग कारकी : फएलोस्तिकता, हेल्मिन्थोस्पोरिम,कर्बुलेरिया एवं मैकोस्त्फिरेला की जातियां। लक्षण : पत्तियों पर गोल से अनियमित,गीले से शुष्क,पीले भूरे रंग के धब्बे बनते हैं। बाद में अधिक धब्बों के बन जाने के कारण पूरी पत्तियां सूख जाती हैं। नियन्त्रण के उपाय १. रोगी पौधों को इकट्टा करके जला देना चाहिए। २. ब्लैताक्स – ५० या इंडोफिल ऍम -४५ कि २.५ ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोल कर आवश्यक मात्रा में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। पत्ती का सिकुड़न रोग कारकी : वायरस लक्षण : रोगी पत्तियां छोटी एवं झुर्रीदार हो जाती हैं और इनके शिराओं (नसों) का रंग पीला हो जाता है। रोगी पत्तियां नीचे की तरफ मुड़ कर प्याले का आकार ले लेती हैं। इन पत्तियों की नसें नीचे एवं गहरे रंग की हो जाती हैं। फूल एवं फल कम लगते हैं। पौधों की वृद्धि रुक जाती है तथा पत्तियां गिर पड़ती हैं। पपीता की वैज्ञानिक खेती करना सीखें| देखें सभी जानकारी इस विडियो में स्त्रोत: हलचल, ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान