भूमिका झारखंड राज्य की मिट्टी में अनेक सूक्ष्म तत्वों की कमी पायी गयी है जिसके कारण फलोत्पादन एवं गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव दिखाई पड़ते है। प्रमुख फलों में सूक्ष्म तत्वों की कमी के लक्षण को पहचान कर निदान करने से अच्छी उपज मिल सकती है। आम में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के लक्षण एवं निदान आम के पौधों में जस्ता, ताँबा, मैगनीज इत्यादि की कमी से उपज प्रभावित होती है जिसका लक्षण एवं निदान इस प्रकार है- जस्ता इसकी कमी के लक्षण कम आयु की मुलायम तथा छोटी पत्तियों पर दिखाई देते हैं। प्रभावित पत्तियाँ मोटी व असामान्य हो जाती है। जैसे-जैसे पत्तियाँ बड़ी होती हैं उनके किनारे लहरदार होकर मुड़ जाते हैं तथा अग्र भाग झुक जाता है। उग्रता की दशा में शिराएँ पीली होकर स्पष्ट दिखाई देती हैं। शिराओं के बीच का भाग या तो हरा रहता है अथवा उसमें धब्बे बन जाते हैं। ऐसी पत्तियों का आकार साधारण पत्ती का लगभग आधा होता और विकृत पत्ती दबाने से जल्द टूट जाती है। प्रभावित टहनियां मर जाती हैं। नये पौधों में इसकी कमी से बढ़वार प्रभावित होती है तथा पौधे बौने हो जाते हैं। फूल के गुच्छों के साथ जो पत्तियाँ निकलती हैं वे बहुत छोटी तथा असामान्य आकार की होती है और प्राय: इनमें पुष्पक्रम विकृत हो जाते हैं। ताँबा इस तत्व की कमी के लक्षण आम के पुराने पौधों की अपेक्षा छोटे पौधों पर शीघ्र दिखाई देते हैं। भूमि में इसकी उपलब्धता कम होने पर शीर्ष पर निकलने वाली टहनियाँ झुकी हुई कमजोर दिखाई देती हैं और आगे चल कर सूख जाती है जिसके कारण पैदावार में कमी जाती है। इस तत्व की पूर्ति के इए कॉपर सल्फेट या ताम्रयुक्त फफूंद नाशक दवा जैसे – कॉपर ऑक्सीक्लोराइट का 0.2 प्रतिशत (2 ग्रा./ली.) की दर से घोल बनाकर पौधों पर 2 से 3 बार 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करना चाहिए। मैगनीज इस तत्व की कमी से पौधों की वृद्धि में कमी आती है। कमी के लक्षण एवं महीने पुरानी मुलायम किन्तु पूर्ण विकसित पत्तियों पर परिलक्षित होते हैं। इन पत्तियों का रंग हरा-पीला हो जाता है जिन पर हरी शिराओं की एक महीन जालीनुमा आकृति दिखाई देती है। ये लक्षण अधिकतर ऊपरी सतह पर ही दिखाई देते हैं। पुरानी पत्तियाँ अपेक्षाकृत मोटी हो जाती हैं तथा इनका अग्रभाग गोलाकार हो जाता है। इसके उपचार के लिए मैंगनीज सल्फेट के 0.2 प्रतिशत (2 ग्रा./ली.) घोल का 2 से 3 बार 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना उचित होगा। लीची में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के लक्षण एवं निदान लीची के पौधों पर जस्ता, बोरान एवं मैंगनीज तत्वों का प्रभाव अधिक देखा गया है। इसकी कमी से अनेक विकार दिखाई देते हैं जिनका पहचान करके उचित समय पर निदान फलोत्पादन बढ़ाने में लाभदायक होता है। जस्ता इस तत्व की कमी से पत्तियाँ कांसे के रंग सदृश दिखाई देती हैं। शिराओं के मध्य में पत्ती पीली होने लगती है जबकि शिराये हरी रहती हैं। टहनी में गाठों के बीच की दूरी अधिक हो जाती है। इस तत्व की तीव्र कमी होने पर फूल झड़ने लगते हैं, फलों का आकार छोटा हो जाता है जिसके फलस्वरूप पैदावार पर प्रतिकूल असर होता है। फलों में शर्करा की मात्रा घटने के परिणामस्वरूप गुणवत्ता का ह्रास होता है। इस विकार के प्रबंधन के लिए पौधों पर जिंग सल्फेट के 0.5 प्रतिशत (5 ग्रा./ली.) घोल का छिड़काव 15 दिन के अंतर पर तीन बार करना चाहिए। लोहा लोहे की कमी की दशा में पहले नवजात पत्तियों में असामान्य रूप से हरिमाहीनता (हरे रंग की कमी) दिखाई देती है, जो आगे चल कर पुरानी पत्तियों में भी दिखाई देने लगती हैं और पौधों की बढ़वार रुक जाती है। इस तत्व की पूर्ति के लिए लोहे के किलेट का प्रयोग किया जा सकता है अथवा 0.4 से 0.8 प्रतिशत (4 से 8 ग्रा./ली.) फेरस सल्फेट के घोल का 2 से 3 बार छिड़काव करना लाभप्रद होता है। बोरॉन इस तत्व की कमी से पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है और वे सूखने लगती हैं। पत्तियों के वृंत मोटे हो जाते है। फल गिरने लगते हैं और पैदावार कम हो जाती है। बोरॉन की कमी के निदान हेतु बोरिक अम्ल का 3 से 4 ग्रा. प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। ताँबा लीची में ताँबे की कमी के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों पर दिखाई देते हैं। इसकी कमी से पत्तियों में शिराओं के मध्य का भाग पीला हो जाता है और वे सामान्य आकार से छोटी हो जाती हैं। पौधों के नवजात शीर्ष भाग सूखने लगते है। जिससे बढ़वार पर प्रतिकूल असर होता है तथा पैदावार घट जाती है। तांबे की कमी के निदान के लिए 0.2 प्रतिशत (2 ग्रा./ली.) कॉपर सल्फेट का घोल बनाकर चूने से उदासीन कर लें। इस घोल का 15 दिन के अंतर पर 2 से 3 तीन बार प्रयोग करना लाभदायक रहता है। मैंगनीज इस तत्व की कमी से लीची की पत्तियों में शिराओं के मध्य का भाग पीला पड़ने लगता है एवं पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है जिससे वे असामान्य दिखाई देती है। इसके उपचार के लिए मैंगनीज सल्फेट के 0.2 प्रतिशत (2 ग्रा./ली.) घोल का 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना उचित होगा। केला के पौधों पर सूक्ष्म तत्वों की कमी से होने वाले प्रभाव एवं उनकी पहचान तथा निदान केले के पौधों पर सूक्ष्म तत्वों की कमी से होने वाले प्रभाव एवं उनकी पहचान तथा निदान इस प्रकार है- जस्ता जस्ते की कमी से पत्तियों की शिराओं के समानांतर पीली धारियाँ बनती हैं जो बाद में अधिक चौड़ी एवं सफेद हो जाती हैं। ये पट्टियों के हरे भाग के समानांतर रहती है। नवजात पत्तियों पर जस्ते की कमी के लक्षण तीव्र होते हैं। इस दशा में पूरी पत्ती पीली पड़ जाती है। प्रभावित पौधों की पत्तियाँ छोटी तथा नुकीली हो जाती हैं और इनकी निचली सतह में सफेद धब्बे दिखाई देते हैं। पत्तियों की मध्य शिराओं पर बैंगनी – लाल रंग के गोलाकार धब्बे दिखाई देते हैं। जस्ते की कमी के कारण पुष्प-विभेदन क्रिया एवं पैदावार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस तत्व की पूर्ति के लिए 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक सल्फेट, अन्य खाद एवं उर्वरकों के साथ मिलाकर प्रयोग करें। शीघ्र लाभ के लिये पौधों पर 0.5 प्रतिशत (5 ग्रा./ली.) जिंक सल्फेट घोल का छिड़काव 15 दिन के अंतर पर 2 से 3 बार करना चाहिए। बोरॉन इसकी कमी के कारण अत्याधिक विकृति आने पर नयी पत्तियाँ आकार में अत्यंत छोटी हो जाती हैं और कभी-कभी इनकी केवल मुख्य शिरा ही दिखाई देती है। पत्तियों का आकार असामान्य हो जाता है, इनके किनारे लहरदार हो जाते हैं। पत्तियाँ झड़ने लगती हैं। मुख्य शिरा के साथ नीचे की ओर शिराओं के बीच पीला समकोण आकृति का धब्बा दिखाई देता है। यह बदरंग धब्बा कई छोटे धब्बों के एक साथ मिलने के कारण बनता है। अधिक कमी की दशा में पौधे की सभी प्रकार की वृद्धि रुक जाती हैं। इसकी कमी के लक्षण पौधों में गंधक की न्यूनता के लक्षणों से बहुत मिलते जुलते हैं। इस विकार के प्रबंधन के लिए 8 से 10 कि.ग्रा. बोरेक्स प्रति हेक्टेयर का उपयोग, अन्य खाद एवं उर्वरकों के साथ मिलाकर करना चाहिए। त्वरित लाभ के लिए 1 से 2 ग्रा. बोरिक अम्ल प्रति लीटर की दर से पानी में घोल कर पर्णीय छिड़काव करना अच्छा रहता है। मैंगनीज इस सूक्ष्म तत्व की कमी से क्रमश: दूसरे, तीसरे और चौथे स्तर की नयी से पुरानी पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। तत्पश्चात बहुत तेजी से नई एवं पुरानी पत्तियाँ विकारग्रस्त होने लगती हैं। कमी के लक्षण पहले किनारों पर दिखाई देते हैं जो मध्य शिरा की ओर तेजी से बढ़ते हैं। दो शिराओं के बीच के भाग अधिक समय तक हरे रहते हैं। जिससे कि पत्ती पर कंघी के दातों जैसे आकार दिखाई देते हैं। आगे चलकर पूरी पत्ती गंदा – पीलापन लिए हरी हो जाती है। इस अवस्था में पौधों पर रोग का आक्रमण हो सकता है। मैंगनीज की अधिक कमी की अवस्था में पैदावार में काफी कमी आती है। इस तत्व की पूर्ति के लिये मैंगनीज सल्फेट के 0.2 प्रतिशत (2 ग्रा./ली.) घोल का 15 दिन के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करना लाभकारी रहता है। नींबू वर्गीय फल में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के लक्षण एवं निदान नींबू वर्गीय फलों में सूक्ष्म तत्वों का अध्यधिक महत्त्व है। इसकी कमी से उपज प्रभावित होने के साथ पौधे सूखने भी लगते है। इन फसलों में सूक्ष्म तत्वों की कमी तथा उनके उपचार का विवरण इस प्रकार है- ताँबा ताँबे की न्यूनता से पीड़ित वृक्षों की पत्तियाँ गहरी हरी दिखाई देती हैं। साथ ही अधिकतर पत्तियाँ मुड़ जाती है। ये पत्तियाँ असामान्य रूप से बढ़े हुए प्ररोह पर पायी जाती हैं तथा इन पर अंग्रेजी के अक्षर ‘एस’ के आकार की झांईयाँ दिखती हैं। अधिक प्रभावित होने पर शिराओं के बीच का भाग पीला हो जाता है। छाल तथा तने से गोंदनुमा चिपचिपा स्राव निकलने लगता है। इस विकार के प्रबंधन के लिए 0.4 प्रतिशत (4 ग्रा./ली.) कॉपर सल्फेट का घोल चूना से उदासीन करने के 15 दिन के अंतर पर दो तीन बार प्रयोग करना चाहिए। तृतीया की जगह 0.2 प्रतिशत (2 ग्रा./ली.) कॉपर आक्सिक्लोराइट का प्रयोग भी किया जा सकता है। लोहा लोहा की कमी होने पर प्रारम्भिक अवस्था में पत्तियाँ हल्की पीली हो जाती है जो उग्र अवस्था में गहरी पीली दिखाई देती हैं। इन पत्तियों में शिराओं का जाल हरा रहता है। इसके उपचार के लिए लोहे की किलेट का प्रयोग करें अथवा 0.4 से 0.8 प्रतिशत (4 से 8 ग्रा./ली.) फेरस सल्फेट के घोल का 2 से 3 बार छिड़काव करके भी पीलिया दूर किया जा सकता है। बोरॉन बोरॉन की कमी के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों पर प्रकट होते हैं। प्रभावित पौधों की पत्तियाँ हल्के भूरे रंग की हो जाती हैं और मुड़ जाती है। पत्तियों में शिराएँ पीली एवं कॉर्क के सामान हो जाती है। पौधा कमजोर हो जाता है और उसमें सूखे के प्रति सहनशीलता कम हो जाती है तथा नमी की कमी की अवस्था में भी वह शीघ्र सूख जाता है। फल के छिलके के सफेद भाग में भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं तथा वे रूखे हो जाते है। इस समस्या के निदान के लिए बोरिक अम्ल अथवा बोरेक्स का 0.1 प्रतिशत (1 ग्रा./ली.) की दर से छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त 8 से 10 कि.ग्रा. बोरेक्स प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाना भी लाभदायक पाया गया है। मैंगनीज इस तत्व की कमी की अवस्था में पाये जाने वाले पीले धब्बे जस्ते की कमी की भांति पूरी तरह पत्ती पर नहीं फैलते तथा पत्तियों का आकार ज्यादा छोटा नहीं होता। प्ररोह निकलते समय ये लक्षण अपेक्षाकृत कम उग्र होते हैं परन्तु पत्तियाँ बढ़ने पर मुड़ने लगती हैं और धब्बे गहरे लगते हैं। वृक्ष के छाया वाले भाग में लक्षण अधिक स्पष्ट होते हैं। इसके उपचार के लिए 0.4 से 0.6 प्रतिशत (4 से 6 ग्रा./ली.) मैंगनीज सल्फेट के घोल का 2 से 3 बार छिड़काव किया जा सकता है। जस्ता नींबू प्रजाति के फल वृक्षों में जस्ते की कमी के लक्षण केवल नई वृद्धि पर प्रकट होते हैं। इसकी कमी के कारण पत्तियाँ पीली हो जाती है। कम न्यूनता होने की दशा में पत्तियों तथा टहनियों का आकार अपेक्षाकृत कम घटता है परन्तु अधिक कमी होने पर पत्तियाँ बिल्कुल छोटी तथा टहनी की बढ़वार अत्यधिक कम हो जाती है। पत्तियाँ गुच्छे के रूप में लगी हुई दिखाई देती हैं। पौधे का धूप की ओर के भाग की अपेक्षा अधिक प्रभावित होता है। इस विकार के प्रबंधन के लिए 0.4 से 0.6 प्रतिशत (4 से 6 ग्रा./ली.) जिंक सल्फेट के घोल का छिड़काव करना लाभप्रद पाया गया है। जस्ते की अधिक कमी वाले क्षेत्रों में वर्ष में दो से तीन बार छिड़काव की आवश्यकता पड़ती है। अनन्नास में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के लक्षण एवं निदान अनन्नास के फलों के भरपूर उत्पादन एवं गुणवत्ता के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व अत्यंत ही उपयोगी होते है। अनन्नास के पौधों पर सूक्ष्म पोषक तत्व अत्यंत ही उपयोगी होते है। अनन्नास के पौधों पर सूक्ष्म तत्वों के कमी लक्षण एवं उसके उपचार के जानकारी निम्नलिखित है- मैंगनीज इस तत्त्व की कमी से अनन्नास के पौधे हल्के पीले दिखाई देते हैं तथा पत्तियों की बढ़वार रुक जाती है और पौधों का पूर्ण विकास नहीं होता। फलों की वृद्धि पर भी मैंगनीज की कमी का कुप्रभाव पड़ता है। मैंगनीज की कमी से पौधों की संवर्धन क्रिया (सकर एवं स्लिप पैदा करना) भी प्रभावित होती है। इसकी पूर्ति के लिए 0.4 प्रतिशत (4 ग्रा./ली.) मैंगनीज सल्फेट का 15 दिनों के अंतर पर दो से तीन बाद छिड़काव करना चाहिए। बोरॉन बोरॉन की कमी से पौधों की फलोत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है एवं फल का वजन एवं आकार दोनों में ही असामान्य रूप से कम हो जाते हैं तथा फल फट जाते हैं। पौधों में सकर उत्पादन में कमी आती है। मुख्य जड़ें भूरी हो जाती हैं तथा सिरों पर सड़ जाती हैं। इसकी कमी के कारण पौधों में पोषक जड़ें कम बनती हैं। इसके निदान के लिए 8 से 10 कि.ग्रा. बोरेक्स प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में प्रयोग करना चाहिए अथवा फसल पर 0.3 से 0.5 प्रतिशत (3 से 5 ग्रा./ली.) बोरेक्स का छिड़काव 2 से 3 बार करना चाहिए। ताँबा अनन्नास पर इन दोनों तत्वों की कमी के लक्षण लगभग एक समान दिखाई देते हैं। सबसे पहले मध्य क्रम की पत्तियाँ मुड़ने लगती हैं। जिन पत्तियों का बाद में विकास होता है वे विशेष रूप से पहले हल्के हरे से पीले रंग की हो जाती है और इन पर मोम जैसी एक मोटी परत बन जाती है। ताँबे एवं जस्ते की अत्यंत कमी होने से पौधों के बीच में पत्तियों का गुच्छा बन जाता है और वे झुक जाती हैं। इनकी पूर्ति के लिए 0.4 प्रतिशत (4 ग्रा./ली.) कॉपर सल्फेट का घोल तथा 0.5 प्रतिशत (5 ग्रा./ली.) जिंक सल्फेट का घोल 2 से 3 बार फसल में छिड़कें। लोहा लोहे की कमी के कारण पत्तियों में हल्के हरे रंग के साथ-साथ कुछ लालिमा आ जाती है। प्राय: लोहे की कमी के लक्षण नए पत्तों पर दिखना प्रारम्भ होते हैं। फल अपरिपक्व अवस्था में पकने लगते हैं। जिन क्षेत्रों में मिट्टी का पी-एच मान 8 से अधिक होता है वहाँ सामान्यत: लोहे की कमी देखी जाती है। इसकी पूर्ति के लिए लोहे के किलेट का प्रयोग करना चाहिए। इसके अतिरिक्त 0.4 से 0.8 प्रतिशत (4 से 8 ग्रा./ली.) फेरस सल्फेट के 2 से 3 छिड़काव से भी पीलापन दूर किया जा सकता है। स्रोत एवं सामग्रीदाता: समेति, कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार