<h3><span>परिचय </span><b> </b></h3> <p style="text-align: justify; ">आज की सधन खेती के युग में भूमि की उर्वराशक्ति बनाये रखने के लिए प्राकृतिक खादों में गोबर की खाद, कम्पोस्ट एवं हरी खाद मुख्य है। कम्पोस्ट बनाने के लिए फसल के अवशेष, पशुशाला का कूड़ा –करकट व गोबर को गड्ढे में गलाया व सड़ाया जाता है। इस प्रक्रिया में ज्यादा समय लगता है तथा पोषक तत्वों का भी नुकसान होता है। साधारण कम्पोस्टिंग प्रक्रिया में ज्यादा समय लगने के कारण पर्यावरण भी दूषित होता है। पिछले कुछ सालों से कम्पोस्ट बनाने की एक नई विधि विकसित की गई है जिसमें केंचुआ का प्रयोग किया जाता है। इसे “केंचुआ खाद या वर्मी कम्पोस्ट” कहते है। केंचुआ खाद प्लास्टिक, शीशा, पत्थर के अलावा किसी भी चीज जैसे कूड़ा-करकट, फसल-अवशेष, गोबर, जूट के सड़े हुए बोरे आदि से बड़ी आसानी से बनाया जा सकता है।</p> <h3><span>वर्मी कम्पोस्ट क्या है?</span><b> </b></h3> <p style="text-align: justify; ">केंचुआ भूमि में अपना महत्वपूर्ण योगदान भूमि सुधारक के रूप में देता है। इनकी क्रियाशीलता मिट्टी में स्वत: चलती रहती है। प्राचीन समय में केंचुए प्राय: भूमि में पाये जाते थे तथा वर्षा के समय भूमि पर देखे जाते थे। परन्तु आधुनिक खेती में अधिक रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों के लगातर प्रयोग से केंचुओं की संख्या में भारी कमी आई है, जिससे भूमि में केंचुए नहीं पाये जाते। इससे यह स्पष्ट होता है कि केंचुए की कमी के साथ मिट्टी अब अपनी उर्वरा शक्ति खो रही है।</p> <p style="text-align: justify; ">केंचुआ मिट्टी में पाये जाने वाले जीवों में सबसे प्रमुख है। ये अपने आहार के रूप में मिट्टी तथा कच्चे जीवांश को निगलकर अपनी पाचन नलिका से गुजारते हैं, जिससे वह महीन कम्पोस्ट में परिवर्तित हो जाते है और अपने शरीर से बाहर छोटी-छोटी कास्टिंगस के रूप में निकालते है। इसी कम्पोस्ट को केंचुआ खाद या वर्मी कम्पोस्ट कहा जाता है। केंचुओं के उपयोग से व्यापारिक स्तर पर खेत पर ही कम्पोस्ट बनाया जाना संभव है। इस विधि द्वारा कम्पोस्ट मात्र 45 से 75 दिनों में तैयार हो जाता है। यह खाद बहुत ही प्रभावशाली होती है तथा इसमें पौधों के लिए पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते है तथा पौधे इनको तुरंत ग्रहण कर लेते हैं।</p> <h3><span>केंचुआ खाद तैयार करने के लिए कौन-कौन प्रजातियाँ प्रयोग में लायी जाती है?</span><b> </b></h3> <p style="text-align: justify; ">विश्व के विभिन्न भागों में 4500 प्रजातियाँ बताई जा चुकी है। आज केंचुए की कुछ प्रजातियाँ विकसित कर ली गई है, जिनको पाकर किसान प्रतिदिन के कूड़ा-करकट को एक अच्छी खाद “वर्मी कम्पोस्ट” में बदल सकते है। दो प्रजातियाँ सबसे उपयोगी पाई गई, जिनका नाम ऐसीनिया फोटिडा (लाल केंचुआ) तथा युड्रिलय युजीनी (भूरा गुलाबी केंचुआ) है।</p> <h3><span>केंचुआ खाद में विभिन्न तत्वों की मात्रा </span><b> </b></h3> <p style="text-align: justify; ">केंचुआ की खाद एक उच्च पौष्टिक तत्व वाली खाद होती है। केंचुआ खाद दो नाइट्रोजन (1.2 से 1.4 प्रतिशत), फास्फोरस (0.4 से 0.6 प्रतिशत) तथा पोटाश (1.5 से 1.8 प्रतिशत) के अलावा सूक्ष्म पोषक तत्व भी उपलब्ध होते है। केंचुए की गतिविधियों से निकलने वाला अवशिष्ट पदार्थ प्राकृतिक तत्व से मिश्रित होने के कारण यह खाद अधिक उपजाऊ हो जाती है।</p> <h3><span>केंचुए खाद निर्माण कैसे करें?</span><b> </b></h3> <p style="text-align: justify; ">केंचुए की खाद बनाने की विधि बहुत ही सरल तथा सस्ती है। इससे बेरोजगार नवयुवक काफी पैसा कमा सकते हैं। औद्योगिक स्तर पर केंचुआ खाद तैयार करने की निम्नलिखित दो विधियां हैं।</p> <ol style="text-align: justify; "> <li>विंडरोज विधि </li> <li>मोड्युलर विधि </li> </ol> <p style="text-align: justify; ">चूँकि “मोड्यूलर विधि” में एक बना हुआ बक्सा खरीदने की जरूरत पड़ती है। अत: यह विधि खर्चीली होने के कारण आम किसानों के लिए उपयोगी नहीं है।</p> <p style="text-align: justify; ">“विंडरोज विधि” किफायती होने के कारण अधिक लोकप्रिय है जिसका वर्णन नीचे किया गया है:</p> <p style="text-align: justify; "><b>मूलभूत सुविधा:</b> केंचुआ धूप सहन नहीं कर सकते अत: पहले 5 फुट चौड़ा व 20 फुट लम्बा बाँस या लकड़ी का छप्पर खड़ा करते है। तथा खपड़ा अथवा पुआल से छत बना दिया जाता है। इसकी ऊँचाई इतनी चाहिए कि आदमी आराम से पानी दे सके। इस झोपड़ी के नीचे वर्मी कम्पोस्ट तैयार किया जाता है ताकि अधिक धूप एवं बरसात के पानी से बचाया जा सके। स्थान के चुनाव के समय यह ध्यान देना चाहिए कि वहां पर बरसात का पानी इकट्ठा न हो। अत: हमेशा ऊँची जमीन का चुनाव करना चाहिए।<b> </b></p> <p style="text-align: justify; "><b>जैविक पदार्थो की पूर्व उपचार:</b> जैविक पदार्थ जैसे गोबर, कूड़ा-करकट, पौधों का अवशेष तथा घास फूस, हरी पत्ती आदि से पहले शीशा, पोलीथिन, पत्थर आदि, अगर हो तो चुन कर अलग कर लेना चाहिए। उसके बाद उसका छोटा-छोटा टुकड़ा कर देना चाहिए। सब्जियों के अवशेष कूड़ा-करकट आदि को गोबर के साथ मिलाने के बाद 10 से 15 दिन तक अलग जगह नर आंशिक विघटन के लिए छोड़ दिया जाता है। गोबर एवं अन्य पदार्थो का अनुपात बराबर होना चाहिए। आंशिक विघटन के बाद वर्मी कम्पोस्ट यूनिट में इसे प्रयोग किया जाता है।</p> <p style="text-align: justify; "><b>पहला चरण:</b> शेड के नीचे जमीन को समतल बनाकर इसे भिंगोकर सड़ने वाला पदार्थ रखा जाता है।</p> <p style="text-align: justify; "><b>दूसरा चरण:</b> पहली सतह, धीरे-धीरे सड़ने वाले पदार्थो जैसे – नारियल के पिछले, केले के पत्ते या छोटे टुकड़ों में कटे बांस से तैयार किया जाता है। इसकी सतह की मोटाई लगभग 3” से 4” होना आवश्यक है। इस सतह को बेड कहा जाता है। कठिन समय पर केंचुआ इसे घर के रूप में इस्तेमाल करता है।</p> <p style="text-align: justify; "><b>तीसरा चरण:</b> दूसरी सतह भी करीब 3” से 4” मोटी होती है जो कि बेडिंग पदार्थ के ऊपर बिछाई जाती है। इस सतह में मुख्यत: आधा सड़े गोबर का इस्तेमाल किया जाता है ताकि सड़ने के समय पदार्थ में ज्यादा गर्मी पैदा नहीं हो। अगर इस पदार्थ में नमी की कमी हो तो सतह में पानी का छिड़काव करना आवश्यक है।</p> <p style="text-align: justify; "><b>चौथा चरण:</b> दूसरी सतह के ऊपर केचुओं को हल्के से रखा जाता है। एक वर्ग मीटर जगह के लिए 250 केंचुओं की जरूरत है। केंचुओं को छोड़ने के पश्चात बहुत जल्दी ये दूसरी सतह के नीचे घुस जाते है क्योकि ये अपने को बाहर में खुला रखना पसंद नहीं करते है।</p> <p style="text-align: justify; "><b>पाँचवा चरण:</b> छोटे टुकड़ों में कटा हुआ हरा या सुखा जैविक पदार्थ एवं गोबर आधा-आधा हिस्सा (50-50) में मिलाकर आखिरी सतह में दिया जाता है। यह सतह तकरीबन 4” से 5” मोटी होती है। इस तरह ढेर की ऊँचाई करीब 1.0 से 1.5 फुट हो जाती है।</p> <p style="text-align: justify; "><b>छठवाँ चरण:</b> आखिरी सतह को पूरी क्यारी के लम्बाई के बराबर जूट के कपड़े से ढंक दिया जाता है। पूरे ढेर को ढंकना आवश्यक है। जूट का फटा हुआ बोरा इस काम में इस्तेमाल किया जा सकता है। बोरे के ऊपर नियमित रूप से पानी का छिड़काव आवश्यक है। नमी लगभग 60 प्रतिशत बनी रहनी चाहिए।</p> <p style="text-align: justify; "><b>सातवाँ चरण:</b> जब केंचुआ तैयार हो जाए तो इसमें पानी का छिड़काव बंद कर देना चाहिए तथा उसे सूखने देना चाहिए। इसके बाद ऊपर में आधा सड़े हुए गोबर की एक पतली परत देनी चाहिए। सारे केंचुए इस परत में आ जाते है। तत्पश्चात इन केंचुओं को ऊपर की परत समेत इकट्ठा कर लेते है। मोटी छलनी से छान कर भी केंचुआ को अलग किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify; "><b>आठवाँ चरण:</b> ऊपर के दो स्तर केंचुआ खाद के रूप में इकट्ठा कर लिये जाते है। बेड को सुरक्षित रखा जाता है तथा पुराने बेड के ऊपर दूसरी खेप की तैयारी पुन: पहले चरण से शुरू कर देनी चाहिए।</p> <h3><span>केंचुआ खाद को रखने का तरीका</span><b> </b></h3> <p style="text-align: justify; ">इस खाद को छाया में सुखाकर इसकी नमी कम कर जाती है। इससे यह रखने योग्य हो जाता है। सूखने के पश्चात खाद को बोरे में एक साल की अवधि तक के लिए रखा जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify; ">केंचुआ खाद का इस्तेमाल करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि खेत में किसी तरह की रासायनिक खाद तथा किसी प्रकार की दवा का इस्तेमाल न हो।</p> <h3><span>केंचुआ खाद की प्रयोग – विधि </span><b> </b></h3> <ol style="text-align: justify; "> <li>खेत में अंतिम जुताई के समय 20 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर में केंचुआ खाद डालकर जुताई करें।</li> <li>बीज बोने से पहले पंक्ति में इसे अच्छी तरह छालें, अथवा बिचड़ा या पौधा लगाने से पूर्व इसको अच्छी तरह डाल दें।</li> <li>मिट्टी चढ़ाने के समय भी इसे डाला जा सकता है।</li> <li>निकौनी, गुड़ाई के समय केंचुआ खाद पौधों की जड़ों में डालकर मिट्टी से ढंक दें अथवा पौधों की रोपाई एवं बीजों की बुआई के समय केंचुआ खाद डालकर बुआई रोपाई करें।</li> <li><b>5. </b>अच्छे परिणाम के लिए केंचुआ खाद का प्रयोग करने के बाद पुवाल, सूखी पत्ती पलवार (मल्लिवंग) का उपयोग करें।<b> </b></li> </ol> <h3><span>केंचुआ खाद प्रयोग करने से लाभ </span><b> </b></h3> <ol style="text-align: justify; "> <li>केंचुआ खाद को भूमि में बिखेरने से तथा भूमि में इनकी सक्रियता से भूमि भुरभुरी एवं उपजाऊ बनती है जिससे पौधों की जड़ों के लिए उचित वातावरण बनता है। इससे उनका अच्छा विकास होता है। पौधों की जड़ों के लिए उचित वातावरण बनता है। इससे उसका अच्छा विकास होता है।</li> <li>केंचुआ खाद मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की विधि करता है तथा भूमि में जैविक क्रियाओं को निरंतरता प्रदान करता है।</li> <li>केंचुआ खाद में आवश्यक पोषक तत्व प्रचुर एवं संतुलित मात्र में होते हैं, जिससे पौधे संतुलित मात्र में विभिन्न आवश्यक तत्व प्राप्त कर सकते हैं।</li> <li>केंचुआ खाद के प्रयोग से मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे उसमें पोषक तत्व एवं जल संरक्षण की क्षमता बढ़ जाती है व हवा का आगमन भी मिट्टी में ठीक रहता है।</li> <li>केंचुआ खाद चूँकि कूड़ा-करकट, गोबर व फसल अवशेषों से तैयार की जाती है अत: गंदगी में कमी करती है और पर्यावरण को सुरक्षित रखती है।</li> <li>केंचुआ खाद टिकाऊ खेती के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है तथा यह जैविक खेती की दिशा में एक नया कदम है।</li> </ol> <h3><span>वर्मी कम्पोस्ट से आर्थिक लाभ </span><b> </b></h3> <p style="text-align: justify; ">केंचुओं द्वारा कचड़े का कम्पोस्ट में परिवर्तित होने के साथ-साथ केंचुओं की संख्या पहले से कम से कम दोगुनी हो जाती है। इस प्रक्रिया को लगातार करने से पूरे वर्ष कम्पोस्ट तैयार किया जा सकता है। औद्योगिक स्तर पर इसे तैयार करने से एक चक्र में उत्पादक को लगभग 10,000 रुपया का लाभ होता है।</p> <p style="text-align: justify; "> </p> <p style="text-align: justify; "><b> स्त्रोत: </b><a class="ext-link-icon" href="http://www.jharkhand.gov.in/agri" target="_blank" title="अधिक जानकारी के लिए ">कृषि विभाग</a>, झारखण्ड सरकार</p>