परिचय भारतवर्ष में धान का कुल क्षेत्रफल नवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में दशवीं पंचवर्षीय योजना में कमी आई है। वर्ष 2001-02 में धान का क्षेत्रफल 44.9 मिलियन हेक्टेयर से घटकर वर्ष 2004-05 में 41.91 मिलियन हेक्टेयर हो गया, जब कि उस वर्ष में उत्पादन क्रमश: 93.34 मिलियन टन से घटकर 83.13 मिलियन टन हुआ। धान के क्षेत्रफल में कमी होने के बावजूद, कुल उत्पादन में वृद्धि प्रति इकाई धान की उत्पादन में वृद्धि होने से ही भविष्य में खाद्यान्न की पूर्ति संभव है। झारखंड प्रदेश में धान की खेती वर्ष 2007 में लगभग 16 लाख हेक्टेयर में की गई थी और औसत उपज 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से कुल उत्पादन लगभग 28.8 लाख टन थी। क्षेत्रफल में वृद्धि लाना संभव नही दिखता परन्तु धान की खेती में विशेष तकनीक का समावेश करते हुए प्रति इकाई उत्पाकता में वृद्धि लाकर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है और वह एस.आर.आई. तकनीक है। धान खाद्य फसलों में प्रमुख फसल है। इसकी खेती प्राचीन काल से ही प्राय: विश्व के अधिकांश देशों में होती है। विश्व के 193 देशों के 114 देशों में धान की खेती की जाती है। इसकी ख़ास विशेषता है कि तीनों ऋतुओं में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है। यद्यपि अभी तक यही मान्यता रही है अच्छी पैदावार लेने के लिए बहुत अधिक पानी एवं बीज की जरूरत होती है। परन्तु 1980 के दशक में सर्वप्रथम मेडागास्कर के कृषि वैज्ञानिक ने एक ऐसी नई तकनीक को अपनाया, इस विधि में मात्र 2 किलोग्राम प्रति एकड़ धान की बीज की आवश्यकता होती है। उस तकनीक से न सिर्फ बीज की कम मात्रा एवं बीजड़ा तैयार होने में लगने वाला अधिक समय की बचत होती है, बल्कि पहले से प्रचलित विधि द्वारा धान की तुलना में अधिक उत्पादन भी प्राप्त होता है। एस.आर.आई.तकनीक की विशेषताएँ धान की प्रति इकाई उत्पादकता में डेढ़ गुणा तक वृद्धि लाई जा सकती है। मात्र 2 किलोग्राम प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है तथा बिचड़े का उम्र 10-12 दिन (2 पत्ती वाला बिचड़ा) हो, अर्थात 65-70 प्रतिशत बीज की बचत। पानी पर अधिक निर्भरता का कम करना, अर्थात पूर्व प्रचलित विधि की तुलना में एक तिहाई पानी में धान की 15-20 प्रतिशत अधिक उपज आसानी से प्राप्त की जा सकती है। धान के जड़ों का विकास ज्यादा होता है कल्ले भी अधिक निकलते है। इस विधि में बाल की लम्बाई भी पूर्व प्रचलित विधि की तुलना में अधिक होती है तथा दानों की संख्या एवं प्रति हजार दानों का वजन भी अधिक होता है। इस विधि में कार्बनिक खाद की प्रमुखता देने से मिट्टी के भौतिक दशा में सुधार, जल धारण क्षमता में वृद्धि, वायु का मिट्टी में संचार, मिट्टी तापक्रम का नियंत्रण इत्यादि संभव हो पाता है, जो भविष्य के लिए शुभ संकेत है। फसल शीघ्र पककर तैयार होती है, अर्थात कम अवधि में फसल तैयार होती है जिसका फलाफल एक फसली खेती पद्धति को वर्षाश्रित दशा में दो फसलीय खेती पद्धति में बदलने में आसानी होती है। कीटनाशी का कम प्रयोग। मध्यम जमीन (दोन-3 एवं दोन-2) के लिए सबसे उपर्युक्त विधि। किसान को अधिक मुनाफ़ा। एस.आर.आई. तकनीक की आवश्यकताएं 1. शीघ्र रोपाई जैसा की अभी तक धान की रोपाई करने के लिए धान की बुआई के 25-30 दिनों बाद बिचड़ों को इस्तेमाल में लाया जाता है, जबकि इस विधि में मात्र 8-10 दिन के बाद जब बिचड़े में मात्र 2 पत्ती एवं कम जड़ें होती है, रोपाई के लिए इस्तेमाल में लाते हैं। इस अवस्था के बिचड़ों की रोपाई में कुछ सावधानियाँ रखना अति आवश्यक है। इस विधि में रोपाई करने से एक बिचड़ा से बहुत कल्ले निकलते है, एवं मजबूत जड़ों का विकास होता है जो कि अधिक उत्पादन के लिए बहुत जरूरी है। 2. सावधानीपूर्वक रोपाई जैसा की फहले बतलाया जा चुका है कि बिचड़ा का कम दिनों का होने के कारण यह बहुत ही नाजुक होता है, इसलिए बिचड़ों को बीज स्थली से उखाड़ने एवं रोपाई में कुछ सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। बिचड़े को बीजस्थली से निकालने के लिए टीन या लकड़ी का तख्ती या बांये हाथ को इस प्रकार जड़ के नीचे डाला जाना चाहिए जिससे बिचड़ा के जड़ के साथ लगने वाला धान के बीज एवं मिट्टी सहित उखड़ जाय। फिर बिचड़ा को मिट्टी सहित कदवा किये गये खेत में अधिक गहराई में नहीं गाड़ने के बजाय मिट्टी के हल्के सम्पर्क में रोपना उचित होगा, अर्थात बिचड़े को खेत में रखते हुए पहली ऊँगली से जड़ को हल्के से दवा देना चाहिए, जिससे जड़ मिट्टी के सम्पर्क में अच्छी तरह से आ जाय। 3. पौधे से पौधे की दूरी इस विधि द्वारा धान की रोपाई के लिए पंक्ति से पंक्ति एवं पौधों से पौधें की दूरी 25 सें.मी. x 25 सें.मी. रखना है। इस वर्गाकर रोपा विधि में एक जगह एक बिचड़ा ही रोपा जाता है। इस विधि द्वारा रोपा गया एक पौधा से जड़ों की कल्ले के विकास के लिए पर्याप्त जगह, धूप, पोषक तत्व एवं पानी मिलता है, जिससे पौधों के बीच एक बिचड़ा से बहुत सा स्वस्थ कल्ला निकलता है, जिससे धान की पैदावार बहुत बढ़ जाती है। खेतों में खरपतवार नियंत्रण एवं अन्य पोषक के लिए आवश्यक तत्वों के बीच प्रतिस्पर्धा कम होती है। अन्तर्वर्ती क्रियाकलापों के लिए पर्याप्त जगह मिल जाता है। इस विधि में अन्तर्वर्ती फसलें भी आसानी से लगाया जा सकता है। 4. खरपतवार नियंत्रण एवं वात संरघ्राता कतार में रोपाई के कारण खेती में खरपतवार नियंत्रण करने के लिए यंत्र का भी आसानी से इस्तेमाल किया जाता है, जिससे मिट्टी का उपरी भाग भुरभुरा एवं हल्का हो जाता है। इस विधि से एक साथ दो फायदा होता है। पहला यह कि खरपतवार नष्ट होने से फसलों एवं घास के बीच कोई प्रतिस्पर्धा नहीं रहता। दूसरा मिट्टी हल्का होने से जड़ को हवा भी पर्याप्त मिलता है, जिससे जड़ क्षेत्र में लाभदायक वायवीय जीवाणुओं को पनपने में सहायता मिलती है। धान की बाली निकलने की अवस्था आने से पहले चार बार खरपतवार नियंत्रण करने की आवश्यकता होता है, जिससे की फसल पूर्ण रूप से खरपतवार मुक्त हो, परन्तु धान रोपाई के दस दिन बाद ही पहली बार खरपतवार नियंत्रण की जरूरत होती है। तदरोपरान्त हर बार 15-15 दिन के अंतराल पर खरपतवार नियंत्रण करने से प्रति हेक्टेयर एक टन की अतिरिक्त उपज बढ़ती है। खरपतवार नियंत्रन के लिए कोनोविडर खरपतवार नियंत्रण यंत्र उपयोगी सिद्ध हुआ हैं। कोनोविडर द्वारा घास निकालने के लिए पूरब पश्चिम चलाना चाहिए। पुन: उत्तर-दक्षिण दिशा में चलाते हुए दोनों ओर से खरपतवार निकालने की आवश्यकता है। इसके बावजूद धान जड़ के पास घास को हाथ द्वारा निकौनी करनी चाहिए निकौनी से निकले हुए खरपतवार को खेत में ही गाड़ देना चाहिए, जो सड़ कर खाद बनते हैं। 5. जल प्रबंधन एस.आर.आई. विधि द्वारा धान की खेती करने में समुचित जल प्रबंधन सबसे प्रमुख हैं। यह विधि वैसे क्षेत्रों में सफलतापूर्वक किया जाता है, जहां सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था हो, ताकि खेतों में उचित नमी बनाए रखने के लिए जरूरत पड़ने पर पानी दिया जा सके। इस विधि की ख़ास विशेषता यह है कि खेतों में लगातार पानी नहीं रखना है। बार-बार कुछ अंतराल पर खेतों में पानी डालना एवं खेतों को सूखा (पानी रहित) रखना पड़ता है, ताकि मिट्टी में वायु संचार होता रहे। मिट्टी को निश्चित अंतराल पर गीला एवं सूखा रखने से पौधों में जड़ एवं कल्लों का विकास अधिक होता है। सभी उर्वरकों की उपलब्धता भी अच्छा होने के साथ-साथ नत्रजन उर्वरकों की बर्बादी नहीं होती है, बल्कि पोषक तत्वों का उपयोग क्षमता बढ़ जाता है। इस विधि से पौधों की उचित वृद्धि होने से उत्पादन बढ़ जाता है। 6. कम्पोस्ट का इस्तेमाल एस.आर.आई. विधि द्वारा की जाने वाली खेती में रासायनिक उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा के अलावा संतुलित उर्वरक एवं मिट्टी की भौतिक दशा सही रखने के लिए 40 क्विंटल प्रति एकड़ की मात्रा आवश्यक है। वैसे मान्यता है कि इस विधि में मात्र जैविक खाद ही प्रयोग होनी चाहिए, ताकि कम पानी में खेती संभव हो सके। परन्तु वर्तमान में अपेक्षित उपज प्राप्त करने के लिए जैविक खाद के अलावा रासायनिक खाद का उपयोग आवश्यक होगा। गर्मी मौसम में गहरी खेत जुताई उपरान्त मौसम पूर्व वर्षा होने पर हरी खाद हेतु ढैंचा या सनई या उरद बीज 12.5 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बुआई करनी चाहिए। कदवा समय हरी खाद फसल को एक या दो दिन सड़ने के उपरान्त अंतिम रूप से कदवा कर रोपाई करनी चाहिए। इसके अलावा रोपाई के 10-15 दिन पूर्व कम्पोस्ट 40 क्विंटल प्रति एकड़ या वर्मी कम्पोस्ट 8 क्विंटल की सहायता आवश्यक होगी। अतएव संतुलित उर्वरकों की सहायता आवश्यक है। रोपनी समय यूरिया 44 किलोग्राम, सिंगल सुपर फ़ॉस्फेट 125 किलोग्राम एवं म्यूरेट ऑफ़ पोटाश 17 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से प्रयोग किया जाना चाहिए। रोपनी के 20 दिन एवं 40 दिन पर क्रमश: यूरिया 22 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से उपरिवेशन विधि द्वारा प्रयोग किया जाना चाहिए। एस.आर.आई. विधि द्वारा खेती करने के लिए क्षेत्र का चुनाव इस तकनीक से खेती करने के लिए भूमि का चुनाव अति महत्वपूर्ण है। इसके लिए वैसे क्षेत्रों का चयन जरूरी है, जहां सिंचाई के लिए पर्याप्त जल हो। नदी का कमाण्ड क्षेत्र सबसे उपयुक्त है, जहां जरूरत के अनुसार खेतों में पानी दिया जा सके। ऐसे क्षेत्रों में प्रत्यक्षण के लिए उपयुक्त होता है, जहां धान के पैदावार को क्षमतानुसार लिया जा सके। बीजस्थली की तैयारी एवं बिचड़ा तैयार करना एस.आर.आई. तकनीक में बीजस्थली का चयन, तैयारी एवं उसमें धान का बिचड़ा तैयार करना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके बिना उक्त विधि से खेती करना बहुत मुश्किल है। बीज स्थली की तैयारी हेतु वैसे खेतों का चयन करना चाहिए, जहां सिंचाई की सुविधा के साथ-साथ जल निकासी की भी व्यवस्था हो। इसकी तैयारी बरसाती, बागवानी सब्जियों के लिए जैसे बीजस्थली को तैयार किया जाता है, उसी प्रकार तैयार करते हुए आधा भाग भुरभुरा मिट्टी एवं आधा भाग भुरभुरा सड़ी हुई गोबर खाद मिश्रण से 15 सें.मी. ऊँचा बीज स्थली तैयार करना चाहिए। इसके अलावे निम्न बातों पर भी ध्यान रखना जरूरी है। 3 फीट चौड़ा, 6 इंच ऊँचा और आवश्यकतानुसार लम्बाई रखते हुए तैयार बीजस्थली को पानी डालकर गीला करने के उपरान्त बीजस्थली के चारों कोना में 9 इंच लकड़ी की पट्टी लगा देने से प्रत्येक बीजस्थली की मिट्टी बाहर नहीं बहता। धान बीज को 12 घंटा पानी में भिंगोने के बाद भींगे जूट बोरे में भरकर अंकुरण हेतु 36 घंटा के लिए छायादार स्थान पर रखना चाहिए तथा बीच-बीच में बोरे में नमी को बनाये रखना चाहिए। अब अंकुरित धान बीज को सावधानी पूर्वक बीजस्थली के ऊपर अच्छी तरह समान रूप से छिड़ककर 1 इंच मोटा मिट्टी एवं सड़ी गोबर खाद मिश्रण को डालकर ढक देना चाहिए तथा ऊपर से हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए ताकि बिचड़ा जल्द तैयार हो। इसके बाद बीजस्थली को पुआल से ढक देना चाहिए, ताकि अधिक समय तक नमी बनी रहे। बीजस्थली के ऊपर पानी डालने के बाद इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि कहीं भी जल जमाव नहीं हो। बीज अंकुरण मिट्टी से बाहर निकलते ही ऊपर से पुआल से ढकना बंद कर देना चाहिए। बीजस्थली से बिचड़ा उखाड़ने की विधि बीजस्थली से 8-10 दिन पुरानी बिचड़ा जब मात्र दो पत्ती की अवस्था में हो तो रोपनी करने के लिए बीजस्थली से सावधानी पूर्वक उखाड़ना अति आवश्यक है। इसके लिए पूर्व में ही विस्तार से चर्चा की गई है। जिससे रोपाई में बिचड़ा के जड़ को गीली मिट्टी में हल्के ढंग से मिट्टी के सम्पर्क में रोपना चाहिए। रोपा के लिए खेत की तैयारी एस.आर.आई. तकनीक से धान की खेती करने के लिए खेतों की तैयारी भी ठीक उसी तरह से किया जाता है। जैसा की पूर्व में किया जाता था। इसमें खेत को पूर्ण रूप से समतल किया जाना जरूरी है, ताकि पूरे खेत में एक समान पानी दिया जा सके एवं कहीं भी जल जमाव न हो। रोपा के समय पौधा से पौधे से पौधें एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 से.मी. x 25 से.मी. रखना है। इसके लिए पतली रस्सी में 25 सें.मी. की दूरी पर चिन्ह लगाकर दोनों ओर से पंक्ति की दूरी निश्चित करने के बाद वर्गाकार विधि से दोनों पंक्ति के मिलाने बिंदु एक साथ मात्र एक बिचड़ा रोपा करना उचित होगा। इससे खरपतवार नियंत्रण एवं अन्तर्वर्ती फसल लगाने में सुविधा होगी। इसके लिए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची द्वारा विकसित मार्कर-यंत्र का प्रयोग किया जाना चाहिए। समूचे खेत में जल निकासी के लिए प्रत्येक 5 मीटर की चौड़ाई पर एक नाली का निर्माण करना, जिसके सहारे खेतों में जरूरत से अधिक पानी को समयानुसार बाहर निकाला जा सके। रोपाई एवं खेतों की देखभाल रोपाई के समय सबसे जरूरी ध्यान देने की बात है कि पौधा एवं पंक्ति की दूरी 25 सें.मी. x 25 से.मी. पर ढंग से एक जगह सिर्फ एक ही बिचड़ा रोपना है। खेतों को नियमित अंतराल पर गीला एवं सूखा रखना आवश्यक है। इसके लिए हमेशा हल्का सिंचाई की जरूरत होती है। जिससे भूमि में हमेशा नमी बनी रहे एवं दूसरी ओर जल-जमाव की भी स्थिति नहीं आती है। जहां पर संकर धान की खेती होती है, वहां श्री तकनीक को अपनाकर उत्पादकता को 45-50 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। इस विधि से न केवल 70 प्रतिशत बीज की बचत होगी, बल्कि 30-40 प्रतिशत पानी की भी बचत होती। परिणामस्वरूप बिजली एवं डीजल (30-40 प्रतिशत बचत) की भी बचत होती है। इसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के द्वारा सिद्ध कर दिया है कि संकर धान श्री विधि के द्वारा उन्नतिशील प्रजातियों की तुलना में अधिक पैदावार देता है। इस तकनीक से खाद एवं बीज दोनों की बचत होती है। एक ख़ास बात यह भी है कि अगली फसल को बिना विलम्ब किए हुए उस खेत में सही समय पर अगले फसल को लगाया जा सकता है। उन्नत किस्में माध्यम खेत (दोन-3) – वंदना, अंजली, बिरसा धान-109 एवं बिरसा धान-110 । माध्यम खेत (दोन-2) – नवीन, अभिषेक, ललाट, आई, आर-64 । संकर धान प्रो एग्रो-6444 (बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची द्वारा अनुमोदित) श्री तकनीक एवं परंपरागत विधि की ख़ास विशेषताएँ घटक श्री विधि परंपरागत विधि 1. बीज की अवधि 5 किलोग्राम/हें. 40 किलोग्राम/हें., 15 किग्रा./हें. (संकर किस्म) 2. बिचड़े की अवधि 8-10 दिन 20-25 दिन 3. बीजस्थली पूर्ण सड़ा हुआ गोबर/ कम्पोस्ट को मिट्टी की सहत पर डालकर अंकुरित बीज डालना है ताकि रोपाई के लिए उखाड़कर एक-एक बिचड़ा मिट्टी सहित अलग करके रोपा जा सके। क्षेत्र 35-40 वर्ग मी. एक हें. रोपाई के लिए। घना बिचड़ा 2-3 बिचड़ा एक साथ मिट्टी सहित रोपा जाता है। क्षेत्र 35-40 वर्ग मी. एक हें. रोपाई के लिए। 4. पौधें एवं पंक्ति की दूरी 25 सें.मी. x 25 सें.मी. (पौधे से पौधे एवं पंक्ति से पंक्ति) 20 सें.मी. x 10 सें.मी. या 15 सें.मी. x 15 सें.मी. पौधे एवं पंक्ति से पंक्ति। 5. खाद/उर्वरक कार्बनिक कार्बनिक एवं अकार्बनिक (रासायनिक) 6. जल प्रबंधन खेत का हमेशा गीला एवं सूखा रखना है। खेत में जल जमाव नहीं रखना है, उतम जल निकासी की व्यवस्था होनी चाहिए। खेत में जल जमाव किया जाता है हमेशा 2-3 सें.मी. पानी लगा रहता है। 7. खरपतवार यांत्रिक विधि से खरपतवार को मिट्टी में मिला दिया जाता है। ताकि मिट्टी में वायु संरघ्रता बनी रहे। रासायनिक खरपतवार नाशी का इस्तेमाल किया जाए। श्री विधि को अपनाने वाले राज्य 1.आंध्र प्रदेश, 2. तमिलनाडू, 3. कर्नाटक, 4. पश्चिम बंगाल, 5. बिहार, 6. उत्तर प्रदेश, 7. पंजाब, 8. छ्त्तीसगढ। श्री विधि को अपनाने वाले देश 1.मेडागास्कर, 2. भारत, 3. फिलीपिंस, 4. नेपाल, 5.कम्बोडिया, 6. म्यांमार, 7. इंडोनेशिया, 8. श्रीलंका, 9. जाम्बिया, 10. चीन, 11. जपान। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार