वर्तमान स्थिति रसायनों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण आज किसानों को प्रतिकूल प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है। पंजाब का यदि उदाहरण देखें तो यहां के किसानों के लिए भूमि का उपजाऊपन अब केवल कीटनाशकों और उर्वरकों पर ही निर्भर रह गया है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि किसानों की समस्याओं का हल कैसे खोजा जाए। इसका जवाब है जैविक खेती यानी ऑर्गेनिक फार्मिंग। स्पष्ट रूप से मानना है कि जैविक खेती किसानों के लिए समृद्धि का कारक है और साथ ही साथ यह मिट्टी के लिए भी फायदेमंद है। जैविक पद्धति को अपनाना जरुरी जैविक खेती और जैविक खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल स्वास्थ्य के प्रति जागरुक होते समाज के हित में है। पिछले लगभग पांच दशकों के दौरान खेती में रसायनों और कीटनाशकों ने अपनी जड़ें गहराई तक जमा ली हैं। जैविक खाद्य, क्या सच में ही सही मायनों में जैविक है, कैसे और कौन सी संस्था जैविक खाद्य पदार्थों को तय करती है, इसके बाद उपभोक्ता कहीं जैविक के नाम पर ठगा तो नहीं जा रहा है। विश्व में जैविक खाद्य के बारे में इस तरह की बहस छिड़ी हुई है। जैविक खाद्य पदार्थों में भी कीटनाशकों के अवशेष पाए गए हैं। हमारे खाद्य पदार्थों और खेती में जहरीले कीटनाशकों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। हमें यह राष्ट्रीय संकल्प लेना होगा कि हमारी खेती पूरी तरह से जैविक पद्धति पर आधारित हो। मिट्टी का प्राकृतिक विकास रसायन आधारित खेती से अलग जैविक कृषि में प्राकृतिक उत्पादों का पुनर्चक्रीकरण किया जाता है। हरी खाद, जीवामृत और पंचगव्य वगैरह से मिट्टी की उर्वरक क्षमता में भी वृद्धि होती है। इसके साथ ही मिट्टी में नमी भी बढ़ती है। ये पफसलों के लिए तो लाभदायक होती है, साथ ही सूखे की स्थिति से भी आसानी से निपटा जा सकता है। दिलचस्प तथ्य है कि स्वस्थ मिट्टी में जैव विविधता का भंडार भी होता है। आंकड़ों के अनुसार एक ग्राम मिट्टी में 30 हजार प्रोटोजोआ, 50 हजार कवक और 4 लाख फफूंद होते हैं। इससे अभिप्राय है कि मिट्टी में पाए जाने इन सूक्ष्मजीवों के कारण पौधों के प्राकृतिक विकास में मदद मिलती हैं। जैविक खेती में इन्हीं के द्वारा फसलें और खाद्य पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं। रासायनिक खेती में इन सभी का क्षरण हो जाता है। लैटिन में मिट्टी को 'ह्यूमस' कहा जाता है यानी जीवित मृदा, इसी से ह्यूमन यानी मनुष्य शब्द की उत्पत्ति हुई है। देश में जैविक खाद का उत्पादन हम सभी मृदा से जुड़े हुए हैं। प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में स्वस्थ मृदा से प्राप्त उपज को खाकर हम सभी स्वस्थ रहेंगे। जब मृदा रोगी होगी तो उपज भी वैसी ही प्राप्त होगी और परिणामस्वरूप लोगों को भी पूरा पोषण नहीं मिल पाएगा। दरअसल बंजर भूमि का कारण है मिट्टी में जैविक पदार्थों का वापस नहीं हो पाना। इसी का दंश आज हम देश में देख रहे हैं। हर साल एक बड़ा क्षेत्रफल बंजर हो रहा है। ह्यूमसयुक्त मृदा में लगभग 90 फीसदी तक पानी को सोखने की क्षमता होती है। स्वस्थ मृदा पानी और उपजाऊ तत्वों को अपने में सुरक्षित रखती है। देश में लगभग 13.5 लाख मीट्रिक टन जैविक खाद्य पदार्थों का उत्पादन वर्ष 2015-16 में हुआ। हमारे देश में 235 जैविक खाद्य उत्पाद निर्यातक है। वर्ष 2015-16 में 839 करोड़ रुपये के जैविक खाद्य पदार्थों का भारत ने निर्यात किया, जो एक अच्छा परिणाम है। देश में 5.70 लाख जैविक खेती करने वाले किसान है। इस प्रकार देखें तो भारत में 10 लाख हैक्टर भूमि पर जैविक खेती होती है, जिसमें से 50 फीसदी पर खाद्य पदार्थ की खेती होती है। 431 लाख हैक्टर जैविक कृषि भूमि विश्वभर में है। विश्व के 170 देशों में जैविक खेती को बढ़ावा देने के प्रयास चल रहे हैं। इसके पफलस्वरूप 170 देशों की 431 लाख हैक्टर भूमि को जैविक प्रमाणिक भूमि के रूप में बदला जा चुका है। वर्ष 2015-16 तक लगभग 34 प्रतिशत दर से बढ़ा जैविक फल-सब्जियों का बाजार। भारत में 15 प्रतिशत की वृद्धि दर है जैविक डेरी पदार्थों के बाजार की। पोषक तत्वों की पूर्ति देश में हरित क्रांति के परिणामस्वरूप खाद्यान्न फसलों के साथ ही सब्जियों की फसलों में भी उन्नत एवं अधिक उपज क्षमता वाली प्रजातियों का विकास हुआ है। इन प्रजातियों की समुचित वृद्धि एवं विकास के लिए पारंपरिक प्रजातियों की अपेक्षा अधिक मात्रा में पोषक तत्वों यानी नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की आवश्यकता होती है और इन तत्वों की बाह्य स्रोतों जैसे-खाद एवं रासायनिक उर्वरकों से पूर्ति की जाती है। संकर प्रजातियों से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए उन्नत प्रजातियों की अपेक्षा अधिक मात्रा में खाद एवं उर्वरकों की आवश्यकता होती है। इसके परिणामस्वरूप रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग निरंतर बढ़ता गया। इनके अधिक मात्रा में प्रयोग करने से मृदा की भौतिक एवं रासायनिक संरचना पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों की मांग और बढ़ती कीमत तथा पूर्ति के बीच बढ़ते अंतर को ध्यान में रखते हुए मानव/पशु/मृदा स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए जैविक कृषि तकनीक, भूमि की उर्वरता एवं फसलों की उत्पादकता को अधिक समय तक स्थिर बनाए रखने के साथ-साथ मृदा में द्वितीयक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी नही होने देते हैं। ट्राइकोडर्मा यह एक जैविक फफूंदनाशक है, जो आलू, हल्दी, अदरक, प्याज, लहसुन आदि फसलों के जड़ सड़न, तना गलन, झुलसा आदि रोग जो फफूंद से पनपते हैं, के प्रबंधन में काफी प्रभावी होता है। इसके साथ ही टमाटर एवं बैंगन के जीवाणु मुरझान रोग की रोकथाम के लिए भी यह उपयुक्त पाया गया है। इसका प्रयोग फसल बुआई के समय 2-4 ग्राम/कि.ग्रा. बीज उपचार हेतु पौधशाला में करना चाहिए या 1.5-2.0 कि.ग्रा. प्रति एकड़ खेत में अंतिम जुताई के समय 10-15 कि.ग्रा. सड़े गोबर की खाद में मिलाकर बिखेर देना चाहिए। जैविक खाद जैविक खाद मृदा की भौतिक एवं रासायनिक संरचना तथा जैविक गुणों पर लाभदायक प्रभाव डालती है। अतः मृदा में जैविक पदार्थों की पर्याप्त उपलब्धता के लिए जैविक खादों का प्रयोग अनिवार्य है। जैविक खादों तथा विभिन्न फसलों की खलियों में पाए जाने वाली पोषक तत्वों की मात्रा सारणी-1 में बताई गई है। हरी खाद हरी खाद के प्रयोग से मृदा में जैविक पदार्थ के अतिरिक्त नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त जीवों द्वारा रासायनिक प्रक्रिया में तीव्रता भी आती है तथा पोषक तत्वों का संरक्षण भी बढ़ जाता है। हरी खाद में पायी जाने वाली औसत नाइट्रोजन की मात्रा सारणी-3 में दर्शाई गयी है। इसके अतिरिक्त गिरिपुष्प (गिलरिसीडिया) एवं सूबबूल (ल्यूकायना) लगाकर उनके पत्तों का हरी खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। गिलरिसीडिया की एक टन हरी पत्तियों में 30-40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 3.0-3.2 कि.ग्रा. फॉस्फोरस एवं 15-25 कि.ग्रा. पोटाश मिलता है। फॉस्फोरस को घुलनशील बनाने वाले जैव उर्वरक भारतीय मृदाओं में फॉस्फोरस का स्तर मध्यम से निम्न है। कुल मृदा फॉस्फोरस का 1/5 प्रतिशत भाग ही पौधे ग्रहण कर पाते हैं। शेष भाग अघुलनशील अवस्था में होता है। फसलों में उपयोग किये जाने वाले कुल उर्वरक का 30 प्रतिशत भाग फसल को प्राप्त होता है। शेष भाग रासायनिक क्रियाओं के द्वारा अघुलनशील हो जाता है। कुछ जीवाणु जैसे कि बैसिलस तथा स्यूडोमोनास, कवक जैसे कि पेनिसीलियम एवं एस्परजिलस मृदा फॉस्फोरस को घोलने के साथ-साथ फसल में दिये गये उर्वरक की उपयोग क्षमता को भी बढ़ाते हैं। इन जैव उर्वरकों के प्रयोग से 15-25 प्रतिशत फॉस्फोरस उर्वरकों के प्रयोग में बचत होती है। दलहनी फसल मुख्यतः दलहनी फसलों को सब्जी एवं मसालों के साथ अंतः फसल के रूप में उगाने पर पौधों की वृद्धि काफी उत्साहजनक, उपज अधिक एवं गुणवत्तायुक्त होती है। दलहनी फसलें खेत में उगाने से वायुमंडलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण होता है। इसलिए इसका लाभ पौधों को प्राप्त होता है। दलहनी फसलों द्वारा नाइट्रोजन का यौगिकीकरण सारणी-2 में दर्शाया गया है। फसल अवशेष मृदा में फसलों के अवशेषों के प्रयोग से जैविक कार्बन में वृद्धि के साथ-साथ कई पोषक तत्वों की उपलब्धता में भी वृद्धि होती है तथा मृदा की भौतिक संरचना में भी सुधार होता है। केंचुआ खाद यह उच्च कोटि की संतुलित जैविक खाद है, जो केंचुओं द्वारा तैयार की जाती है। इसमें नाइट्रोजन 1.0-2.0 प्रतिशत, फॉस्फोरस 1.0-1.5 प्रतिशत तथा पोटाश 1.5-2.0 प्रतिशत के अलावा अन्य सभी सूक्ष्म पोषक तत्व एवं विभिन्न प्रकार के एंजाइम उपलब्ध होते हैं, जो पौधों के लिए आवश्यक होते हैं। यह मृदा की उर्वराशक्ति तथा जलधारण क्षमता को बढ़ाती है। केंचुआ खाद का प्रयोग फसल बुआई से पहले 4.0-5.0 क्विंटल/हैक्टर की दर से मृदा में मिलाकर किया जाता है। इसे अधिक प्रभावी बनाने के लिए मृदा में मिलाने के उपरांत इसे पुआल, सूखी पत्तियों या कूड़ा-करकट से मृदा की ऊपरी सतह को ढक दिया जाता है। जैव उर्वरक जैव उर्वरक प्राथमिक रूप से सक्रिय सूक्ष्मजीव होते हैं, जो कि पौधों की वृद्धि में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर नाइट्रोजन में परिवर्तित कर मृदा फॉस्फोरस को घुलनशील बनाकर हार्मोन, विटामिन इत्यादि पदार्थों कों संतुलित मात्रा में बढ़ाते हैं। जैव उर्वरकों के प्रयोग की विधियां मृदा उपचार इस विधि में 10-15 कि.ग्रा. बीज के लिए 200 ग्राम जैव उर्वरक की आवश्यकता होती है। जैव उर्वरक को 400 मि.ली. पानी में घोलकर बीजों के ऊपर डाल देते हैं। घोल को हाथों से बीजों में अच्छी तरह मिला देते है। बीजों को छाया में सुखाकर तुरंत बुआई कर देनी चाहिए। पौध उपचार सर्वप्रथम एक कि.ग्रा. जैव उर्वरक को 10-15 लीटर पानी में घोल देते हैं। एक एकड़ क्षेत्रफल के लिए पौधों के छोटे-छोटे बंडल बनाकर उनकी जड़ों को 15-20 मिनट तक के लिए घोल में डुबो देते हैं। इसके बाद पौधों की तुरंत रोपाई कर देते हैं। इस विधि से प्याज, गोभी, टमाटर आदि फसलों का उपचार करते हैं। कंद उपचार कंदीय फसलें जैसे कि आलू, जिमीकंद, चुकन्दर, अदरक आदि का उपचार इस विधि से करते हैं। इस विधि में एक कि.ग्रा. जैव उवर्रक को 50-60 लीटर पानी में घोल देते हैं। कटे हुए टुकड़ों या सम्पूर्ण कंदों को 10-15 मिनट तक घोल में डुबो देते हैं। इसके बाद कंदों को घोल से निकालकर छाया में सुखा देते हैं। कंदों की तुरंत रोपाई कर देते हैं। उपरोक्त जैव उर्वरक की मात्रा एक एकड़ क्षेत्रफल के लिए पर्याप्त है। स्लरी उपचार आधा कि.ग्रा. जैव उर्वरक को 40 लीटर पानी में घोल लेते हैं। 2 कि.ग्रा. गुड़ को एक लीटर पानी में घोलकर अच्छी तरह उबाल लेते है। ठंडा होने पर इसको जैव उर्वरक के घोल में मिला देते हैं। 80 कि.ग्रा. कंदों को इस घोल में आधा घंटे के लिए डुबो देते हैं। इसके बाद कंदों को छाया में सुखाकर बुआई कर देते हैं। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित उपायों द्वारा भी फसल की सुरक्षा कम खर्च में की जा सकती है। बेसिलस थुरेजेंसिस इसे संक्षेप में बी.टी. के नाम से भी जाना जाता है, जो फूलगोभी एवं पत्तागोभी पर हीरक पीठ (डायमंड बैंक मॉथ) का नियंत्रण करता है। 500-1000 ग्राम कल्चर प्रति हैक्टर 650 लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अंतराल पर इसका छिड़काव किया जाता है। नीम आधारित कीटनाशक इसका उपयोग सफेद मक्खियों, भृंग, फुदका (जेसिड) कटुआ कीट, टहनी तथा फलछेदक सूंडी पर किया जाता है। यह कीटों के जीवन चक्र को कमजोर बनाता है। सब्जी फसल के लिए लगभग 700 लीटर नीम घोल की आवश्यकता एक हैक्टर के लिए होती हैं। नीम बीज का घोल बनाने के लिए 34 कि.ग्रा. नीम के बीज को पीसकर 100 लीटर पानी में मिलाकर घोल तैयार करते हैं तथा 12 घंटे बाद इसे कपड़े में छानकर फसलों में छिड़काव करते हैं। दलहनी एवं गैर-दलहनी फसल का सब्जी फसल के साथ सफल परीक्षण कृषि विज्ञान केन्द्र, पाली द्वारा केंद्र के अधिदेश के तहत वर्ष 2013-14, 2014-15 एवं 2015-16 में अंतर्वर्ती फसल के रूप में भिण्डी के साथ लोबिया का प्रक्षेत्र परीक्षण किया गया। इसमें भिण्डी तथा लोबिया क्रमशः 2:1 के अनुपात में लगाया गया था, जिसकी औसत पैदावार क्रमशः 63.86 क्विंटल/ हैक्टर (भिण्डी) तथा 27.30 क्विंटल/हैक्टरन(लोबिया) तथा लाभ : लागत अनुपात 3.70 पाया गया। सााथ ही साथ मृदा में औसतन 40-60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन का यौगिकीकरण भी हुआ। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), लेखक: हेमलता सैनी सहायक प्राध्यापक (प्रसार शिक्षा), आनंद कृषि विश्वविद्यालय, आनंद (गुजरात) और मोती लाल मीणा वैज्ञानिक (कृषि प्रसार), भाकृअनुप-काजरी, कृषि विज्ञान केन्द्र, पाली-मारवाड़ (राजस्थान)।