भूमि का चयन और इसे तैयार करना गोभी वर्गीय सब्जियों में मुख्यतः बन्द गोभी और फूल गोभी की फसलें आती हैं। इस सब्जियों की काश्त के लिए मृदा की पी.एच. रेंज 6-6.5 है और जैविक कार्बन एक प्रतिशत से ज्यादा होना चाहिए। ऐसी भूमि बंदगोभी और फूल गोभी की खेती के लिए उपयुक्त होती है। मृदा में पी.एच. स्तर, जैविक कार्बन, गौंण पोषक तत्व (एन.पी.के. -नाइट्रोजन, फास्फोरस पोटाष) खेत में सूक्ष्म जीवों के प्रभाव की मात्रा की जांच के लिए वर्ष में एक बार मृदा परीक्षण करना जरूरी है। यदि मृदा में जैविक कार्बन एक प्रतिशत से कम पाई जाती है, तो खेत में 25-30 टन/है0 की दर से कार्बनिक खाद डाली जाए और खाद को अच्छी तरह खेत में मिलाने के लिए खेत की 2-3 बार जुताई की जाए। बुआई का समय क्षेत्र बंद गोभी फूल गोभी निचले पर्वतीय क्षेत्र अगस्त-सितम्बर जून- जुलाई मध्य पर्वतीय क्षेत्र सितम्बर – अक्तूबर फरवरी-मार्च अप्रैल-मई जुलाई-अगस्त-सितम्बर ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र अप्रैल-जून अप्रैल-मई अनुमोदित किस्में बंदगोभी- प्राइड ऑफ इंडिया, गोल्डन एकड़, पूसा डूम हैड, पूसा मुक्ता। फूल गोभी- अर्ली कुनवारी, इम्पूवड जापानीज, पूसा स्नोबौल-1, पूसा स्नोबॉल के-1, पालम उपहार। बीज दर बंद गोभी- लगभग 500-700 ग्रा./है0 और 40-45 ग्राम/बीघा गोभी का बीज नर्सरी में बिजाई के लिए पर्याप्त होता है। फूल गोभी-अगेती किस्मों के लिए- 750 ग्राम/है0 (60 ग्राम/बीघा) पछेती किस्मों के लिए- 500 से 625 ग्राम/है0 (40-50 ग्राम/बीघा) बीज उपचार 5 प्रतिशत ट्राईकोडर्मा घोल के साथ बीज उपचार किया जाए और बुवाई से पहले छाया में सुखाया जाए। नर्सरी में फसल उगाना नर्सरी क्यारी की मृदा अच्छी तरह तैयार की जाए जिसमें खरपतवार और रोग - जीवाणु बिल्कुल भी नहीं होने चाहिए। सूत्रकृमि के प्रकोप को कम करने के लिए 100 कि.ग्रा. अपघटित कार्बनिक खाद में 100 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडि मिलाकर इसका उपयोग किया जाए। कीट से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए 1 कि0ग्रा0/वर्ग मी0 की दर से नीम की खली का उपयोग किया जाए। नर्सरी क्यारियों की ऊपरी मश्दा को नमी युक्त बनाए रखने के लिए क्यारी पर सूखी घास की पतली परत को फैलाकर बिछाया जाए। पौध उगाने के लिए 8.5 गुणा 10 मी. आकार के साथ 15-20 सें.मी. ऊंचाई वाली उठी हुई बीज क्यारियां तैयार की जाएं। नर्सरी के प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में काइकोराइजा 40 ग्राम तथा एजोसपिरोलियम तथा फास्फोट घोल बैक्टीरिया प्रत्येक 200 ग्राम को कम्पोस्ट और फार्म - यार्ड खाद के साथ मिलाया जाए। 25-30 दिन में पौध तैयार हो जाती है। पौध निकालने से 4-5 दिन पहले पानी देना बंद कर दें और पौधे को ठोस बनाने के लिए इसे खुले स्थान पर धूप में रखें। जब पौध 4-5 सप्ताह की (10-12 सें. मी. ऊंची) हो जाए तो तैयार किए गए खेत में शाम के समय रोपाई करें तथा रोपण के बाद तुरंत पानी दें। बीज की दूरी (नर्सरी) बीज की दूरी 1-2 सें.मी. गहराई में 10 सें.मी. अलग पंक्ति में 4-5 सें.मी. में बीज डाला जाए। पौध उपचार प्रतिरोपण से एक दिन पहले पौध पर 1 मि.ली. मिश्रण की दर से बी.टी. (बैसिलस थूरीनजेनसिस) छिड़का जाए। प्रतिरोपण के समय पौध के जड़ वाले हिस्से को 1 प्रतिशत बोरडोक्स मिश्रण या इससे गड्ढे को भर दें। मृदा प्रबंधन बंदगोभी व फूलगोभी रोपण से 2 माह पहले फलीदार हरी खाद वाली फसलें उगाई जाएं और ढेचा, सनई, लोबिया या कुलथी। खेत में 30 टन कार्बनिक खाद, 1.5 टन वर्मी कम्पोस्ट और 250 कि.ग्रा. नीम की खली के साथ 8 प्रतिशत तेल का प्रयोग किया जाए। नाईट्रोजन की आवश्यकता को फसल परिचक्रण, फली वाली फसलों, कम्पोस्ट, हरी खाद और पलवार के माध्यम से पूरा किया जाए। फास्फेट की अतिरिक्त आवश्यकता को जैविक उर्वरकों के इस्तेमाल से पूरा किया जाए जैसे खली, अस्थिचूर्ण, मछली आहार, सॅफ फास्फेट आदि। पोटाशियम की अतिरिक्त जरूरत को लकड़ी के बुरादे, ग्रेनाईट डस्ट या पोटाशियम सल्फेट से पूरा किया जा सकता है। पोषण तत्वों की जरूरत, गणना में नीचे दी गई आदर्श गणना तालिका सहायक होगी। प्रतिरोपण और दूरी (मुख्य खेत) आम तौर पर 4-5 सप्ताह पुराने स्वस्थ पौध को मुख्य खेत में प्रतिरोपण के लिए चुना जाता है। मेंढ और नालियां बनाई जाती हैं। अगेती किस्मों के लिए 45 सें.मी. x 30 सें. मी. तथा पछेती किस्मों के लिए 60 सें.मी. X 45 सें. मी. की दूरी रखी जाए। सिंचाई और पानी की आवश्यकता कुशलतम तरीके से जल उपयोग और संरक्षण की दृष्टि से टपका सिंचाई बेहतर है। यदि खुली सिंचाई का इस्तेमाल किया जाता है तो जलमग्नता से बचने पर पूरा ध्यान दिया जाए। रोपण से पहले सिंचाई की जाए। तीसरे दिन ‘जीवनवर्धक - सिंचाई' (लाईफ इरीगेशन) की जाए। इसके बाद प्रत्येक 10-15 दिन में सिंचाई की जाए। जब शीर्ष परिपक्व स्थिति में आ जाएं तो इनके टूटने को रोकने के लिए सिंचाई बंद कर दें। संवर्धन क्रियाएं और खरपतवार प्रबंधन नियमित रूप से हाथ से खरपतवार निकालने और मिट्टी चढ़ाने का काम किया जाना चाहिये। खरपतवार को नष्ट करने तथा नमी संरक्षण के लिए पंक्तियों के बीच शुष्क फसल/निकाले गए घास अपषिष्ट से पलवार बिछाई जा सकती है। खरपतवार प्रबंधन की आवश्यकता फसल वृद्धि के 60 दिन तक होती है। फसल संरक्षण (अ) कीट प्रबंधन फसल परिचक्रण से रोग सूत्रकृमि के प्रकोप से रोकथाम होती है और खरपतवार समाप्त होते हैं। रोपण से 10 दिन पहले खेत की मेंड के साथ-साथ सरसों और गेंदे की बुवाई की जाए। इससे फसल पर आक्रमण करने वाले कुछ कीटों की ट्रैपिंग में मदद मिलेगी। व्यस्क कीट की ट्रेप करने के लिए प्रति हैक्टेयर 12 की दर से फेरोमोन ट्रेप लगाए जाएं। इसमें कीटों के आक्रमण की निगरानी में मदद मिलेगी। डायमंड ब्लैक मोथ केटरपिलर: फसल पर जैव नियंत्रण एजेंट जैसे बैसिलस थूरीनजेनसिस वैर0 कुरस्टाकी का छिड़काव फसल के आरंभिक चरण में 2 मि.ली./लीटर की दर से किया जाए। नीम बीज की गुठली के निष्कर्षक (5 प्रतिशत घोल) का छिड़काव बाद के चरण से किया जाए। वकल्पिक चक्र के रूप में बेयूवरिया बेसिएना का छिड़काव किया जा सकता है। रोपण के 60 दिन बाद एक जैव-कार्ड रखा जाए जो परजीवी डायडीगेमा सेमीक्लोसम को 50,000/है. की दर से जारी कर सकता है। लहसून- मर्च के सत्त को तीन बार छिड़का जाए अर्थात दूसरे, चौथे तथा छठे सप्ताह में। माहू (एफिड्स): अगेती बुआई से फसल को एफिडस के प्रकोप के हानिकारक रूप लेने से पहले अच्छी तरह स्थापित होने का समय मिल जाता है। नीम के तेल का 3 प्रतिशत छिड़काव किया जाए। डी.बी.एम. को नियंत्रित करने के लिए बेसिलस थूरिंगजेनोसिस के छिड़काव से भी एफिड्स नियंत्रण में मदद मिलती है। (ब) रोग प्रबंधनः नमी वाली स्थिति अनेक तरह के रोग पनपने में सहायक होती है। कोई भी कार्य जिसमें पत्तियां सूखती हैं, इससे इस तरह के पत्ती रोगों को बढ़ने में रोक लगाई जा सकती है। पूर्व-पश्चिम दिशा में फसल के पौधों की पंक्तियां और अधिक सघनता से बचने से भी मृदा को सूरखने में मदद मिलती है और पौधे की छत्रक में नमी तत्व में कमी आती है। क्लब रूट (जड़): क्लब रूट (जड़) संक्रमण में उस समय काफी कमी आती है, जब टमाटर, खीरा या बीज को फसल परिचक्रण में शामिल किया जाता है। रोकथाम- निम्नलिखित विवरण के अनुसार स्यूडोमोनस का उपयोग किया जाए- बीज उपचार के लिए 10 ग्राम/कि.ग्रा. बीज दर से। पौध उपचार के लिए /5 ग्राम/लीटर पानी में भिगोयें। मृदा प्रयोग के लिए 2.5 कि.ग्रा. को कम्पोस्ट के साथ मिलाएं। यह सलाह दी जाती है कि संक्रमित क्षेत्र में 3 वर्ष के लिए फसल चक्र अपनायें। कमर तोड़ रोगः इस रोग के लक्षण, रोग चक्र, अनुकूल वातावरण तथा रोकथाम टमाटर की तरह है। इसके अतिरिक्त बीज का उपचार गर्म पानी - स्ट्रेप्टोसाइकलिन (1 ग्रा./10 लीटर पानी के घोल में 30 मिनट तक) से अवश्य करवाएं। तना विगलनः यह रोग प्राय: दिसंबर मास में पौधों पर मिट्टी चढ़ाने के साथ ही शुरू हो जाता है। पौधों के तनों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे तथा सड़न शुरू हो जाती है तथा कोयले की तरह लगते हैं। फूल सड़ने शुरू हो जाते हैं। रोकथाम- रोगग्रस्त क्षेत्रों में गोभी- धान का फसल चक्र अपनाएं। रोगग्रस्त पत्तियों को हर सप्ताह निकालें तथा नष्ट करें। खेत में दिसंबर मास के शुरू में सूखी पत्तियों का बिछौना बिछाएं। डाऊनी मिल्ड्यू: पत्तियों की निचली सतह तथा तनों पर छोटे-छोटे लोहित रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। इन धब्बों पर फफूदी की सफेद मृदुरोमिल वृद्धि का पाया जाना है। इसके लक्षण फूल पर भी दिखाई देते हैं। फूल सड़ने शुरू हो जाते हैं तथा गले- सड़े भाग का रंग भूरा तथा किनारे काले हो जाते हैं। बन्द गोभी के संक्रमित बन्द परागमन के दौरान सड़ जाते हैं। इस रोग का प्रकोप तभी होता है जब तापमान में एकदम गिरावट आ जाए। ठंडा तथा नमी वाला मौसम इस रोग की वृद्धि के लिए सहायक है। रोकथाम- रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों तथा गोभीय वर्गीय खरपतवारों को नष्ट कर दें। रोगमुक्त बीज का चयन करें तथा बीज का उपचार ट्राईकोडर्मा व बीजामृत से करें। काला विगलन: रोगग्रस्त पौधों के पत्तों के किनारों पर तिखुटे आकार के पीले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। जो बढ़कर पत्ते के अधिकतर भाग को घेर देते हैं। इन धब्बों की मुख्य तथा अन्य शिराएं गहरे भूरे अथवा काले रंग की हो जाती हैं। मार्च-अप्रैल के महीनों में जब तापमान में वृद्धि शुरू हो जाती है तो रोग से प्रभावित फसल एकदम सूख जाती है। इस रोग का जीवाणु प्रायः रोगी बीज में जीवित रहता है तथा बीज द्वारा एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में फैलता है। गोभी वर्गीय खरपतवारों में भी यह जीवाणु जीवित रहता है। अधिक वर्षा इस जीवाणु तथा रोग को फैलाने में सहायक है। रोकथाम- रोगग्रस्त क्षेत्रों में कम से कम दो वर्ष का फसल चक्र अपनाएं। स्वस्थ बीज का चयन करें। जल निकासी का पूरा इंतजाम करें। बीज का उपचार ट्राईकोडर्मा व बीजामृत से करें। बीज का उपचार गर्म पानी (52° से.) तथा स्ट्रेप्टोसाइकलिन (1 ग्राम/10 लीटर पानी में 30 मिनट तक) से करें। फसल कटाई/तुड़ाई ठोस फूलों/कंदों को जमीन की सतह से चाकू या दराटी से काटा जाता है। फसल कटाई/तुड़ाई के दौरान बाहरी परिपक्व बिना मुड़े पत्तों को हटा दिया जाए। यदि यहां कोई लम्बा ठोस ढूंठ है तो उसे भी हटा दें। इन शीर्षों को आकार और गुणवत्ता के अनुसार वर्गीकृत किया जाए और बोरी या प्लास्टिक क्रेट में पैक करके ट्रक में भरकर बाजार में लाया जाता है। उत्पाद की तुड़ाई शाम को या सुबह-सुबह की जाए और फलों को छाया वाले स्थान या कमरे में रखा जाए जहां अच्छा वायु संचरण हो। पैदावार/उपज- बंदगोभी- अगेती प्रजातियां-25-30 टन/हैक्टेयर पछेती प्रजातियां-40-50 टन/हैक्टेयर फूलगोभी- अगेती प्रजातियां-19-25 टन/हैक्टेयर पछेती प्रजातियां-17-20 टन/हैक्टेयर बीजोत्पादन बंदगोभी- व्यावसायिक स्तर पर बीज ठडे क्षेत्रों में तैयार किया जाता है, जैसे किन्नौर, भरमौर, लाहौल घाटी, ऊपरी कुल्लू घाटी। नौहराधार (सिरमौर) व कटराई (कुल्लू) के क्षेत्रों में बन्दों को शीत ऋतु में खेत में ऐसे ही या उन पर मिट्टी चढ़ाकर छोड़ दिया जाता है। अधिक ठडे क्षेत्रों में (कल्पा- किन्नौर) बन्दों को 2 x 1 x 1 मीटर के आकार की नाली या खत्ती में रखा जाता है। बन्द के ऊपर के पत्ते उतार दिए जाते हैं तथा इन्हें नाली में एक परत के रूप में रखा जाता है तथा दोनों ओर वायु के आवागमन के लिए छिद्र रखे जाते हैं। बर्फ पिघलने पर मार्च-अप्रैल में इन बन्दों को खेत में रोपित कर दिया जाता है। इस समय 3 सै.मी. गहरा चीरा बन्द के ऊपर दिया जाता है और वहां से फूल के कल्ले निकलते हैं। फूलगोभी- फूलगोभी कोमल फसल है। इसका रोपण फूल बनने पर संभव नहीं है। जब पौधे बड़े हो जाते हैं, तब उनकी गहरी गुड़ाई नहीं करनी चाहिए। अगेजी व मध्यम मौसमी किस्मों के बीज मैदानी भागों तथा निचले पहाड़ी क्षेत्रों में उत्पादित किए जाते हैं। परंतु पछेती किस्मों के बीज समुद्र तल से 1200-1500 मीटर तक की ऊंचाई वाले मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में जहां पर आम तौर पर तापमान 30° सै. से अधिक न हो, पैदा किए जा सकते हैं। विश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त उत्तम गुणवत्ता वाले बीज से ही पौधे तैयार करें। सामान्य फसल की तरह खेती करें। अवांछनीय पौधा निष्कासन (रोगिंग) बंदगोभी- तीन अवस्थाओं में फसल का निरीक्षण करें- 1) वानस्पतिक वृद्धि अथवा पर रोगी, बंदरहित तथा अन्य किस्म के पौधे निकाल 2) बन्द बनने पर उसके आकार, रंग व कठोरता के लिए निरीक्षण करें। 3) फूलते समय खरपतवार और रोगी पौधों को निकाल दें। फूलगोभीः अंवाछनीय व रोगी पौधों को निम्न चार अवस्थाओं पर निकालना आवश्यक (1) वनस्पति बढ़वार होने पर। (2) फूलगोभी के फूल बनने पर। (3) फूलगोभी तैयार होने पर। (4) फूलते समय। पृथकीकरण बीज प्राप्त करने के लिए ध्यान रखा जाए कि फूलगोभी या उसके परिवार की दूसरी किस्मों/फसलों के बीच 1000 लीटर तथा 1600 मीटर की दूरी क्रमशः प्रमाणित तथा आधार बीज तैयार करने के लिए रखें। बीज की कटाई व सुरखाना- जब फलियां पक जाएं तो उन्हें शाखा सहित काट लें तथा इनके गठे बनाकर ढेर में सुखा लें तथा पूरे सूख जाने पर पूरे बीज की झड़ाई करें तथा बीज को सुखाकर पूरी तरह से सुरक्षित भंडार करें। बीज प्राप्ति बंदगोभी- अगेती किस्में- 500-600 कि.ग्रा./है. (40-48 कि.ग्रा./बीघा) पछेती किस्में 700-750 कि.ग्रा./है. (55-60 कि.ग्रा./बीघा) फूलगोभीः अगेती किस्में- 500-600 कि.ग्रा./हैक्टेयर (40-48 कि.ग्रा./बीघा) पछेती किस्में- 300-400 कि.ग्रा./हैक्टेयर 24-32 कि.ग्रा./बीघा) स्रोत: इंटरनेशनल कॉम्पीटेंस सेंटर फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर