<div id="MiddleColumn_internal"> <h3><span>आलू कन्द की फसल</span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>आलू की फसल हिमाचल प्रदेश की आर्थिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखती है क्योंकि यहां की जलवायु बीज के आलू उत्पादन के लिए अनुकूल है। प्रदेश के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में जहां समशीतोष्ण जलवायु के साथ-साथ तेज हवा और कम आर्द्रता होती है और तेले का प्रकोप भी बहुत कम होता है</span>, <span>रोगमुक्त बीज के आलू पैदा किए जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में (</span>2008-09) <span>आलू की खेती लगभग </span>16.0<span> हैक्टेयर में की गई तथा </span>173.73<span> हजार टन उत्पादन हुआ व उत्पादन </span>108.58<span> क्विंटल/हैक्टेयर रहा। </span></p> <h3><span><span>अनुमोदित किस्में</span></span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>कुफरी चंद्रमुखी</span>, <span>कुफरी ज्योति</span>, <span>आलू-राजमाश /मटर/फ्रांसबीन अंतरा फसल </span></p> <h3><span>भूमि </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>अच्छे निकास वाली</span>, <span>उपजाऊ दोमट मिट्टी आलू की फसल के लिए सबसे उत्तम है।</span><span> </span><span>यद्यपि अच्छे प्रबंध द्वारा इसे विभिन्न प्रकार की भूमियों में भी उगाया जा सकता है। </span></p> <h3><span><span>भूमि की तैयारी </span></span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और </span>2-3<span> जुताईयां देसी हल से करनी</span><span> </span><span>चाहिए ताकि आलू की फसल के लिए अच्छे खेत बन सके। खेत में पर्याप्त नमी होनी</span><span> </span><span>चाहिए। खेत समतल होना चाहिए ताकि जल निकासी सही हो सके। </span></p> <h3><span><span>बीज की तैयारी </span></span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बिजाई के लिए अच्छे बीज की निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए </span>-</p> <ol type="1"> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बीज शुद्ध प्रजाति का होना चाहिए। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बीज स्वस्थ</span>, <span>रोग रहित</span>, <span>विषाणु</span>, <span>सूत्रकृमि तथा बैक्टीरिया से मुक्त होना चाहिए। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बीज अंकुरण की सही अवस्था में होना चाहिए। </span></li> </ol> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>कन्द के आकार के अनुसार इसे समूचे तथा छोटे टुकड़ों में काटकर बोया जा सकता है। यदि कन्द का आकार बड़ा हो तो इस प्रकार काटें कि प्रत्येक टुकड़े में कम से कम दो आंखे हों और प्रत्येक</span><span> </span><span>टुकड़े का भार </span>30<span> ग्राम से कम न हो। कटे हुए टुकड़ों को डाईथेन एम-</span>45/<span>इंडोफिल एम-</span>45 (0.05<span> प्रतिशत) के घोल से उपचार करने से</span><span> </span><span>अच्छी फसल व उपज प्राप्त होती है। </span></p> <h3><span>बिजाई का समय </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>निचले पर्वतीय क्षेत्र (</span>800<span> मीटर ऊंचाई तक) </span></p> <ul type="disc"> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>पतझड़ वाली फसल</span>- <span>मध्य सितंबर - मध्य अक्तूबर </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बसंत वाली फसल</span> - <span>जनवरी - फरवरी </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>मध्य पर्वतीय क्षेत्र (</span>800-1600<span> मी.) </span>- <span>मध्य जनवरी </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र (</span>1600-2400<span> मी.) </span>-<span> मार्च-अप्रैल </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बहुत ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र (</span>2400<span> मी. से अधिक) </span>-<span> अप्रैल-मई शुरू</span></li> </ul> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "> </p> <h3><span>बीज की मात्रा तथा बिजाई का ढंग </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>आलू को </span>50-60<span> सें. मी. की दूरी में नालियों/खलियों में ढलान की विपरीत दिशा में बोना चाहिए तथा बिजाई के तुरन्त बाद मेढे बनानी चाहिए। कन्द से कन्द का अंतर </span>15-20<span> सें. मी. होना चाहिए। यदि बीज के आलुओं का भार </span>30<span> ग्राम से कम न हो तो </span>20-25<span> क्विंटल/हैक्टेयर बीज पर्याप्त होगा। </span></p> <h3><span><span>खरपतवारों की रोकथाम </span></span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>आलुओं की फसल को जब खरपतवारों के साथ बढ़ना पड़ता है तो उपज में बहुत अधिक कमी आ जाती है। अत: यह आवश्यक है कि फसल को प्रारंभिक अवस्था में</span><span> </span><span>खरपतवारों से मुक्त रखा जाए। निराई-गुड़ाई उचित रूप से एवं कम खर्च से तभी हो सकती है यदि फसल की बिजाई पंक्तियों में की हो। पहली निराई-गुड़ाई फसल की </span>75<span> प्रतिशत अंकुरण पर करनी चाहिए और यह अवस्था बिजाई के लगभग </span>30<span> दिनों के बाद आती है। जब पौधे </span>15-20<span> सें. मी. लम्बे हो जाएं तो दूसरी निराई-गुड़ाई करके मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।</span></p> <h3><span>जल प्रबन्ध </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>आलू की फसल में सिंचाई की संख्या एवं समय</span>, <span>मिट्टी की बनावट</span>, <span>मौसम</span>, <span>फसल की वृद्धि की अवस्था तथा उगाई गई किस्म पर निर्भर करती है। फिर भी कुछ क्रांतिक अवस्थाओं में जैसे कि भूमि के अंदर तने से भूस्तारी तथा आलुओं के बनते तथा बढ़ते समय सिंचाई करना बहुत आवश्यक होता है। अतः इन अवस्थाओं में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। हल्की और बार-बार सिंचाई देना भारी सिंचाई देने की अपेक्षा अच्छा है। मेंढों तक खेतों में पानी भर देना हानिकारक है जबकि सिंचाई करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि नालियां पानी से आधी भरें ताकि मेढ़ों में पानी के रिसाव से स्वयं नमी</span><span> </span><span>आ जाये जो कि फसल की बढ़ौतरी के लिए सही है। प्रायः बसंत की फसल में </span>5-7<span> सें. मी. गहराई की </span>5-6<span> सिंचाईयां पर्याप्त होती हैं।</span></p> <h3><span>घास-पत्तियों का प्रयोग </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बसंत की फसल में घास - पत्तियों का प्रयोग </span>10<span> टन/हैक्टेयर की दर से करना</span><span> </span><span>आवश्यक है ताकि भूमि में पर्याप्त नमी व सिंचाई का सही उपयोग हो सके। इससे सिंचाई के पानी का बचाव होता है और साथ में आलूओं के आकार में वृद्धि होती है। जिससे उपज में बढ़ौतरी होती हैं।</span></p> <h3><span>फसल की खुदाई एवं श्रेणीकरण </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>जब फसल पूरी तैयार हो जाए तो आलुओं की खुदाई करनी चाहिए। आलुओं के तैयार हो जाने पर उन्हें भूमि के अंदर देर तक नहीं रहने देना चाहिए। खुदाई के समय भूमि न सूखी न अधिक गीली होनी चाहिए। पौधों की शाखाओं का थोड़ा सूचना तथा रगड़ने पर आलू के छिलके का न निकलना फसल तैयार होने के संकेत देते हैं। आलू का निम्नलिखित विधि से श्रेणीकरण किया जा सकता है </span>–</p> <ul type="disc"> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>ए श्रेणी (बड़ा आकार)</span>- 75<span> ग्राम से अधिक भार वाले </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बी श्रेणी (मध्यम आकार)</span>- 50-75<span> ग्राम भार वाले </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>सी श्रेणी (छोटा आकार)</span>- 50<span> ग्राम से कम भार वाले</span></li> </ul> <h3><span>पौध संरक्षण </span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; ">(<span>क) कीट प्रबंधन</span></p> <table class="grid listing"> <tbody> <tr> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>कटुआ </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>सफेद सुंडी</span>, <span>कटुआ कीट</span>, <span>हड्डा बीटल</span>, <span>जैसिड और एफिड एवं</span><span> </span><span>पतंगा</span></p> </td> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>पौधों को जमीन की सतह से काट देता है जबकि सफेद सुंडी व वाइट वर्म आलुओं को खाते हैं। बड़े कीट व सुंडियां पत्ता</span><span> </span><span>को खाकर छलनी कर देते हैं। कीट पत्तों व फूलों के रस को चूसकर हानि पहुंचाते हैं। तथा विषाणु रोग फैलाने में सहायक होते हैं। आलू का पतंगा खेतों में लार्वे के रूप में जमीन से बाहर निकलकर और गौदाम में आलुओं को हानि पहुंचाते हैं। यह पत्तों में सुरंगे बनाते हैं व तने के अंदर चले जाते हैं। गोदामों में लार्वे आलुओं पर आंखों के रास्ते अंदर जाते हैं व सुरंगे बना देते हैं। आलू के अंदर जाने के रास्ते के बाहर मल का इकट्ठा होना इसका लक्षण है। उसके बाद अन्य जीवाणुओं के आक्रमण द्वारा आलू सड़ने शुरू हो जाते हैं। </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>रोकथाम </span>–</p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>·<span> </span></span><span>फसल की बिजाई के लिए स्वस्थ आलू बीज का प्रयोग करें।</span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>·<span> </span></span><span>मेढ़ों पर मिट्टी पूरी तरह चढ़ाएं ताकि आलू भूमि से बाहर न दिखाई दें।</span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>·<span> </span></span><span>आलुओं की खुदाई के बाद खेत में उन पर तरपाल/चादर ढक दें</span>, <span>ताकि पतंगे उन पर अडे न दे सके। </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>·<span> </span></span> <span>गोदाम में स्वस्थ आलुओं को सूखे पत्तों व सूखी रेत से </span>2<span> सें.मी. तह तक ढक</span><span> </span><span>आलुओं को गोदाम में रखने से पहले आलुओं को पंचगव्य से उपचारित करें। जिन गोदामों में आलू भंडारण किए जाते हैं उसकी साफ-सफाई का खास</span><span> </span><span>ख्याल रखें। </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>·<span> </span></span><span>भृगों व सुंडियों को शाम के समय रोगग्रस्त पौधों से इकट्ठा करें तथा उन्हें मार</span><span> </span><span>दें </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>·<span> </span></span><span>खेत में नीम ऑयल </span>3<span> मि.ली./लीटर से छिड़काव करें। </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>·<span> </span></span><span>कीड़ों के नियंत्रण के लिए खेत में चिपचिपे बोर्डों का प्रयोग करें। </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>·<span> </span></span><span>बीज का उपचार बीजामृत व ट्राईकोडर्मा से करें।</span></p> </td> </tr> <tr> <td colspan="2"> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>(ब) बीमारियां -</span></p> </td> </tr> <tr> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>अगेता झुलसा</span></p> </td> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>पत्तों पर गोल चक्र रूप में भूरे धब्बे बनते हैं</span>, <span>जिसके कारण पत्ते शीघ्र गिर जाते हैं। </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span> </span></p> </td> </tr> <tr> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>पछते झुलसा</span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span> </span></p> </td> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>पत्तों पर छोटे गोल बिंदुओं की तरह धब्बे बनते हैं। बीमारी वाले भाग के चारों ओर पीलापन बनता है और उसके बाद भूरे से गहरे भूरे धारियों वाले धब्बे बनते हैं।</span></p> </td> </tr> <tr> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>कॉमन स्कैब </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span> </span></p> </td> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>रोगग्रस्त आलुओं का छिलका भद्दा हो जाता है</span>, <span>जिसमें गहरे छेद पड़ जाते हैं। आलुओं पर भूरे से काले कार्क की तरह धब्बे बन जाते हैं।</span></p> </td> </tr> <tr> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>ब्लैक स्कर्फ</span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span> </span></p> </td> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>आलुओं से उगती हुई शाखाएं मर जाती हैं। भूमि के अंदर वाले भागों में कैंकर जैसी बढ़ौतरी बनती है और आलुओं पर भूरे से काले बीमारी के अंश प्रकट होते हैं।</span></p> </td> </tr> <tr> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>पाऊडरी स्कैबः </span></p> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span> </span></p> </td> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>आरंभ में आलुओं पर उभरी हुई कीलें प्रकट होती हैं और बाद में गड्ढे /छेद बन जाते हैं</span>, <span>जिसके अंदर फफूद भर जाती है</span>, <span>जो पतले छिलके से घिरे रहते हैं।</span></p> </td> </tr> <tr> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बैक्टीरियल विल्ट</span></p> </td> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>इस बीमारी के लक्षण पौधों व पत्तों का मुरझाना तथा नीचे झुकना है। इसके बाद पौधा पूरी तरह मुरझा जाता है और आलुओं के अंदर भूरापन आ जाता है।</span></p> </td> </tr> <tr> <td> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>रोकथाम</span></p> </td> <td><ol type="1"> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बिजाई के लिए स्वस्थ व रोग रहित बीज का प्रयोग करें।</span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>प्रमाणित बीज ही प्रयोग में लाएं।</span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>रोगग्रस्त खेतों में फसल न लगाएं।</span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>प्रतिरोधी किस्मों का इस्तेमाल करें</span>, <span>जैसे कि कुफरी स्वर्ण</span>, <span>कुफरी ज्योति।</span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "> <span>बिजाई के समय बीज के आलुओं को ट्राईकोडर्मा तथा बीजामृत से उपचार करें।</span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>खेत में अच्छी तरह गली-सड़ी गोबर की खाद डालें</span>, <span>कच्ची खाद का प्रयोग न करें। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "> <span>मक्की व अन्य फसलों के साथ फसल चक्र अपनाएं। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बिजाई के समय मेढ़ों पर मिट्टी अच्छी तरह से चढ़ाएं। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>जहां तक संभव हो</span>, <span>मध्य अगस्त तक फसल के ऊपरी भागों को काट दें।</span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span> यूवेरिया बेसिना का इस्तेमाल करें। घोल बनाने के लिए </span>200<span> लीटर पानी में </span>2<span> कि.ग्रा. यूवेरिया शुष्क पाउडर मिलाएं। पाउडर को पानी में मिलाकर पूरक चूर्ण में भरें</span>, 30<span> मिनट तक सैट होने दें और उसके बाद पत्तों पर छिड़काव करें। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>डाईपल (बेसीलस थूरीनजेनसिस) का </span>500<span> मि.ली./है. छिड़काव करें। फफूद (पेईसिलोमाइसिस लीलासीनस) आलू में जड़-गांठ सूत्रकृमि के लिए प्रयोग में लाएं। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>रोग और सूत्रकृमि को रोकने में फसल चक्र काफी महत्वपूर्ण है। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>फसल को विशिष्ट रोग से बचाने के लिए आलू</span>, <span>टमाटर</span>, <span>मिर्च और बैंगन जैसी फसलों के साथ खेती न की जाए क्योंकि यह एक ही कुल से संबंध रखती हैं। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>जैव नियंत्रण एजेंट जैसे बेसीलस सब्टिल्स का </span>2<span> कि.ग्रा./है. से छिड़काव करें। इस छिड़काव को जरूरत के अनुसार </span>5-7<span> दिनों में पुनः छिड़काव करें। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "> <span>बोरेक्स मिश्रण एक प्रतिशत का छिड़काव भी उपयुक्त माना गया है।</span><span> </span></li> </ol></td> </tr> </tbody> </table> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span> </span></p> <h3><span style="text-align: justify; ">स्थानीय किस्में </span></h3> <p class="MsoNormal"><span style="text-align: justify; "> </span><span style="text-align: justify; ">20-25</span><span style="text-align: justify; "> टन/हैक्टेयर</span></p> <h3><span>पैदावार</span></h3> <p class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>संकर किस्में : </span>30-35<span> टन/हैक्टेयर</span></p> <h3><span>बीज वाले आलू का उत्पादन</span></h3> <ol type="1"> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>विश्वसनीय स्रोत से ही रोग-रहित बीज को प्राप्त करें। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बीज वाली आलू की फसल की अप्रैल के मध्य में बिजाई करें। शीघ्र बिजाई करने से कुफरी ज्योति किस्म के आलुओं पर दरारें आ जाती हैं। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बिजाई के लिए स्वस्थ व बड़े (</span>4-6<span> सें.मी. परिधी) जिसमें काफी आंखें हों</span>,<span>प्रयोग करें। इससे कई गुणा अधिक विषाणु रहित आलू पैदा होते हैं। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>जब फसल </span>10<span> सें.मी. के लगभग लम्बी हो जाये तो किसी कीटनाशक जैसे कि नीम के तेल का छिड़काव करें। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>बिजाई के शीघ्र ही आलुओं पर मिट्टी चढ़ा दें और जल्दी ही निराई-गुड़ाई </span>| <span>करें</span>, <span>ताकि बाद में पौधों की बढ़ौतरी की अवस्था में कम से कम बाधा पहुंचे। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>फसल की बढ़ौतरी में </span>2-3<span> बार निरीक्षण करें। अन्य किस्म के एवं रोग ग्रसित पौधे जिनके पत्तों में पीलापन</span>, <span>मौजेक</span>, <span>झुरियां</span>, <span>मुड़े हुए आदि लक्षण दिखाई दें</span>, <span>ऐसे पौधों को निकाल दें। पहला परीक्षण उस समय करें जब पौधे </span>15<span> सें.मी. लंबे हों। दूसरी बार निराई-गुड़ाई फसल में फूल आने के समय करें। फसल की अन्तिम अवस्था में भी यदि कुछ पौधे रोग - ग्रस्त दिखाई दें तो उन्हें भी उखाड़ दें।</span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>मध्य जुलाई में फसल में तेले का प्रकोप प्रकट होता है। अतः जुलाई-अगस्त में नीम तेल का </span>2-3<span> बार छिड़काव करें। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>जुलाई के अंत में रोगग्रस्त किस्मों से पौधों की शाखाओं को काट दें व नष्ट करें। इन्हें खेत में न छोड़े। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>पौधों की शाखाओं को काटने के बाद और शाखाएं निकलें तो उन्हें भी काट दे।</span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>जैसे ही बारिशें बंद हो जाएं फसल को निकाल लें। आलुओं को अच्छी तरह सुखा लें और सड़े व कटे हुए आलुओं को निकाल दें। वर्गीकरण के पश्चात आलुओं को बाजार में बेचने के लिए बोरियों का इस्तेमाल करें। अगले साल की बिजाई के लिए पर्याप्त मात्रा में बीज का रखाव भली-भांति से करें। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>आलुओं को पंचगव्य से उपचारित करें। </span></li> <li class="MsoNormal" style="text-align:justify; "><span>खाने वाले आलू के लिए दी गई सिफारिशों को भी पूरी तरह अपनाएं।</span></li> </ol><span><br /></span><ol type="1"> </ol> <div id="_mcePaste"></div> स्रोत: <a class="external_link ext-link-icon external-link" href="http://www.iccoa.org/" target="_blank" title=" इंटरनेशनल कॉम्पीटेंस सेंटर फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर (नए विंडोज में खुलने वाली अन्य वेबसाइट लिंक)"> इंटरनेशनल कॉम्पीटेंस सेंटर फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर </a></div>