<h3 style="text-align: justify;">जायद ऋतु एवं कद्दूवर्गीय सब्जियां</h3> <p style="text-align: justify;">कद्दूवर्गीय सब्जियां मुख्य रूप से गर्मी नहीं सहन कर सकतीं। इसलिए इन्हें जायद ऋतु में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इनकी खेती मुख्य रूप से अधिकतम 40 डिग्री सेल्सियस व न्यूनतम 20 डिग्री सेल्सियस के बीच के तापमान में ही की जा सकती है। इस वर्ग की सब्जियां सूर्य की रोशनी व तापमान के उतार-चढ़ाव से अत्यधिक प्रभावित होती हैं। रोशनी व गर्मी की अधिकता और लम्बे प्रकाश काल में मादा पफूलों की अपेक्षा नर पफूल अधिक बनते हैं, जिससे पैदावार कापफी कम हो जाती है। इसके लिए उपयुक्त तापमान 25-30 डिग्री सेल्सियस है। </p> <h3 style="text-align: justify;">मृदा </h3> <p style="text-align: justify;">इस वर्ग की सब्जियों के लिए दोमट या बलुई दोमट मृदा सबसे अधिक उपयोगी मानी जाती है। इसमें अधिक जैविक पदार्थ व अच्छे जल निकास वाली मृदा की आवश्यकता होती है। मृदा न ही अम्लीय और क्षारीय बल्कि उसका पी-एच मान 6-7 के बीच हाेनाा चाहिए। खेत की पहली जुताई किसी मृदा पलटने वाले हल से करनी चाहिए तथा उसके बाद 2 या 3 सामान्य जुताई कर सकते हैं। खेत में पाटा लगाकर मृदा को भुरभुरा व खेत को समतल बना लेना चाहिए। बीज की बुआई के लिए आवश्यकतानुसार नालियां बना लें। जायद ऋतु में उगाने के लिए कद्दूवर्गीय फसलों को जनवरी से मार्च तक बोया जाता है। परन्तु बीजों की सीधे खेत में बुआई फरवरी-मार्च में की जाती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">खाद व उर्वरकों का प्रयोग</h3> <p style="text-align: justify;">खाद व उर्वरकों का प्रयोग मृदा की जांच के अनुसार करना चाहिए। कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद 200 क्विंटल प्रति हैक्टर की दर से बीज की बुआई के लगभग एक महीने पहले खेत की तैयारी के समय अच्छी प्रकार से खेत में मिला देते हैं। इसके अलावा आवश्यकतानुसार 80-100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50-60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व इतनी ही पोटाश प्रति हैक्टर की दर से देनी चाहिए। फॉस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा व नाइट्रोजन की आधी या एक तिहाई मात्रा आपस में मिलाकर बोने वाली नालियों के स्थान पर डालकर मृदा में मिला दें। शेष नाइट्रोजन की मात्रा को दो हिस्सों में बांटकर बुआई के लगभग एक महीने बाद नालियों में टॉप ड्रेसिंग करें और गुड़ाई करके मृदा चढ़ायें। दूसरी मात्रा पौधों की बढ़वार के समय लगभग 45 से 50 दिनों बाद फूल निकलने के पहले टॉप ड्रेसिंग में प्रयोग करें। 5 ग्राम यूरिया प्रति लीटर पानी में मिलाकर पत्तियों पर छिड़काव करना भी अत्यन्त लाभदायक होता है। बीज को बोने से पहले खेत में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 40 सें.मी. चाैड़ी तथा 15-20 सें.मीगहरी नालियां बना लेते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">तोरई की फसल </h3> <p style="text-align: justify;">तोरई की फसल में खाद व उर्वरकों का प्रयोग मृदा की जांच के अनुसार करना चाहिए। कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद 200 क्विंटल प्रति हैक्टर की दर से बीज की बुआई के लगभग एक महीने<br />पहले खेत की तैयारी के समय अच्छी प्रकार से खेत में मिला देते हैं। अच्छी उपज के लिए 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फाॅस्फाेरस तथा 50 कि.ग्रापोटाश/हैक्टर खेत में अंतिम जुताई के समय मृदा में मिला देना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">करेला की फसल</h3> <p style="text-align: justify;">करेला की फसल में खाद व उर्वरकों का प्रयोग मृदा की जांच के अनुसार करना चाहिए। एक हैक्टर खेत के लिए 50 कि.ग्रा नाइट्रोजन, 25-30 कि.ग्रा. फाॅस्फाेरस तथा 25-30 कि.ग्रा. पोटाश/हैक्टर क दर से देनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">टिंडा फसल</h3> <p style="text-align: justify;">टिंडा फसल की बुआई फरवरी-मार्च में करते हैं। एक नाली से दूसरी नाली की दूरी फसल की बेल की बढ़वार के अनुसार 1.5-5 मीटर तक रख सकते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">चप्पन कद्दू </h3> <p style="text-align: justify;">चप्पन कद्दू फसल की बुआई फरवरी-मार्च में करते हैं। चप्पन कददू में 80 कि.ग्रा. नाइट्राेजेन, 50 कि.ग्रा. फास्फाेरस तथा 50 कि.ग्रा पाेटाश/हैक्टर और कद्दू में 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फास्फाेरस तथा 50 कि.ग्रा. पाेटाश/हैक्टर की दर से देनी चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग,भाकृअनुप-भारतीय कृषिअनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012</p>