गेहूं की फसल सिंचाई गेहूं की फसल इस समय फूल निकलने से लेकर दाना भरने अथवा दाना सख्त होने की अवस्था में है। इस अवस्था में मृदा में नमी की कमी होने से उपज में भारी कमी आ जाती है, अतः किसान अपनी फसलों में आवश्यकतानुसार सिंचाई अवश्य करें। इससे गर्म हवाओं का दाने बनने पर बुरा असर कम होगा तथा तेज हवाओं से फसल गिरेगी भी नहीं। सामान्यतः बौने गेहूं की अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए हल्की एवं दोमट या भारी दोमट मृदा में जल की उपलब्धता के आधार पर सिंचाइयां करनी चाहिए। इन अवस्थाओं में जल की कमी का उत्पादन एवं उसकी गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ेगा। सिंचाई सदैव हल्की मृदा में 6 सें.मी. एवं दोमट या भारी दोमट मृदा में 8 सें.मी. गहरी करनी चाहिए। बौने गेहूं में बुआई के अनुसार पांचवीं दुग्धावस्था में सिंचाई करनी चाहिए। यह अवस्था बीज बोने के 100-105 दिनों बाद आ जाती है और छठी सिंचाई दाने भरने की अवस्था में करनी चाहिए। यह अवस्था बीज बोने के 115-120 दिनों बाद आ जाती है। पछेती गेहूं की बुआई मध्य दिसंबर के आसपास की गई हो तो उनमें चैथी सिंचाई बाली निकलने की अवस्था और पांचवीं सिंचाई दुधिया अवस्था पर करें। तेज हवा चलने की स्थिति में सिंचाई न करें अथवा रात में करें, क्योंकि फसल गिरने का डर रहता है। असिंचित क्षेत्रों में गेहूं की कटाई और मड़ाई का कार्य करें। अंगमारी या पर्णीय झुलसा रोग इस रोग के लक्षणों में सर्वप्रथम निचली पत्तियों पर छोटे-छोटे, अण्डाकार, भूरे रंग के और अनियमित रूप से बिखरे हुए धब्बे आपस में मिलकर पत्ती का अधिकांश भाग ढक देते हैं। थीरम एवं डाइथेन जैड-78 का 0.25 प्रतिशत छिड़काव करने से इस रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। चूर्णिल आसिता रोग प्रभावित पौधे की पत्तियों पर भूरे सपेफद रंग के चूर्ण के ढेर दिखायी देते हैं। रोग की उग्र अवस्था में पर्णच्छद, तना और तुषनिपत्र आदि भी भूरे-सफेद चूर्ण से ढक जाते हैं। रोगग्रसित पौधों पर दाने छोटे और सिकुड़े हुए उत्पन्न होते हैं। इसके नियंत्रण के लिए सल्फर का बुरकाव 20 कि.ग्रा./हैक्टर करना चाहिए। गेहूं के करनाल बंट रोग की रोकथाम करनाल बंट को गेहूं का कैंसर भी कहा जाता है। इसका प्रकोप अपेक्षाकृत ठंडे प्रदेशों जैसे-पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के मैदानी इलाके तथा उत्तरी राजस्थान में अधिक होता है। इस रोग का कारक एक कवक टिलेसिया इंडिका है। यह रोगजनक, मृदा में रहता है तथा संक्रमित बीज इस रोग को नये क्षेत्रों में फैलाते हैं। इस रोग से दानों के अन्दर काला चूर्ण बन जाता है तथा अंकुरण क्षमता कम हो जाती है। करनाल बंट रोग के नियंत्रण के लिए खेत में कम से कम पांच वर्षों तक फसलचक्र अपनायें, रोगग्रसित बालियों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए एवं साफ व स्वस्थ बीजों का चयन किया जाये एवं उन्नत प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें। बीटावैक्स, औरियोफन्जिन, थीरम, जीनेव, ऑक्सीकार्बोक्सिन 2.5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें। रसायनों जैसे-प्रोपिकोनेजोल (0.1 प्रतिशत), ट्राइएडिमेफोन (0.2 प्रतिशत), कार्बेंडाजिम (0.1 प्रतिशत), मैंकोजेब (0.25 प्रतिशत), पुष्प निकलने की अवस्था में छिड़काव करें। कीटों से नुकसान गेहूं के प्रमुख कीटों से नुकसान के कारण उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। कभी-कभी फसल पूरी तरह से नष्ट हो जाती है इसलिए किसान स्वयं समय से गेहूं के हानिकारक कीटों का प्रबंध कर अधिकतम पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। रस चूसने वाले कीट रस चूसने वाले कीट जैसे-चेंपा भी गेहूं की पत्तियों व बालियों से रस चूसते हैं। 12 प्रतिशत बालियों या ऊपर के पत्तों पर 10-12 चेंपा कीटों का समूह नजर आये तो रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल अथवा 20 ग्राम सक्रिय तत्व का छिड़काव खेत के चाराें तरफ दाे मीटर बॉर्डर पर करें। शुरु में पूरे खेत में उपचार की आवश्यकता नहीं होती। अधिक प्रकोप होने पर इस कीटनाशी का प्रयोग पूरे खेत में करें। किन्हीं दो छिड़काव के बीच 15-20 दिनों का अन्तर अवश्य रखें। माईट का प्रकोप असिंचित खेती में अधिक होता है। इसके प्रकोप से पत्तियां शिखर से पीली होने लगती हैं। इसका प्रकोप निचली पत्तियों पर अधिक होता है। इसकी रोकथाम के लिए फाॅस्फमिडान 2 मि.ली./प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिये। गेहूं का पर्ण या भूरा रतुआ रोग यह रोग सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है तथा पक्सीनिया रिकोंडिटा ट्रिटिसाई नामक कवक द्वारा होता है। इस रोग की पहचान यह है कि प्रारंभ में इस रोग के लक्षण नारंगी रंग के सुई की नोक के बिन्दुओं के आकार के बिना क्रम के पत्तियों की ऊपरी सतह पर उभरते हैं, जो बाद में और घने होकर पूरी पत्ती और पर्ण वृन्तों पर फैल जाते हैं। रोगी पत्तियां जल्दी सूख जाती हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण में भी कमी होती है और दाना हल्का बनता है। गर्मी बढ़ने पर इन धब्बों का रंग, पत्तियों की निचली सतह पर काला हो जाता है तथा इसके बाद यह रोग आगे नहीं फैलता है। इस रोग से गेहूं की उपज में 30 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है। रोग के नियंत्रण के लिए धब्बे दिखाई देने पर 0.1 प्रतिशत टिल्ट 25 ई.सी.(प्रोपीकोनेजोल) का एक या दो बार पत्तियों पर छिड़काव करें। जौ तीसरी व अंतिम सिंचाई पछेती जौ की बुआई में तीसरी व अंतिम सिंचाई, दुधिया अवस्था में बुआई के 95-100 दिनों बाद करें। जौ की फसल को पकने के तुरंत बाद ही काट लेना चाहिए, जिससे फसल गिरने एवं दाने झड़ने से नुकसान कम हो। जौ का दाना हवा से नमी सोखता है। अतः सही स्थान पर भंडारण करें, ताकि कीट न लगे। यह निमेटोड के कारण लगता है। बौने, पीले, सूखे पौधे इस रोग के आम लक्षण हैं। जड़ों में भी परिवर्तन दिखाई देने लगता है। रोगी जड़ें झाड़ीनुमा एवं अधिक फैलाव वाली हो जाती हैं। उन पर कहीं-कहीं उभार नजर आने लगता है। विभिन्न अवस्थाओं में रोग वाले खेत में से निमेटोड के फसल की बढ़ोतरी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। बालियां ठीक प्रकार से नहीं बनतीं व दाने अच्छी तरह नहीं बन पाते हैं। निमेटोड का नियंत्रण निमेटोड के नियंत्रण के लिए एक या दो साल के लिए चना, तोरिया, सरसों, गाजर, धनिया, मेथी और जौ की रोगरोधी किस्में ही लगाएं। मई और जून में खेत में 10-15 दिनों के अन्तराल पर 2-3 जुताई करें। निमेटोड के अधिक तथा एक समान आक्रमण की स्थिति में एल्डीकार्ब 5 कि.ग्रा. या 30 कि.ग्रा. कार्बोफ्रयूराॅन/हैक्टर की दर से बुआई के समय खाद में मिलाकर डाल दें। स्त्रोत : खेती पत्रिका(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर, सस्य विज्ञान संभाग,भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012