सरसों झुलसा या सफेद गेरुई रोग सरसों की फसल में झुलसा या सफेद गेरुई रोग पत्तियों की निचली सतह पर सपेफद फफूंद की वृद्धि के रूप में दिखाई देता है। इस रोग से ग्रसित पत्तियों पर हल्के भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। इस रोग के लक्षण दिखने पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या जाइनेब या मैंकोजेब या कैप्टाफाल (फोलटाफ) 2 ग्राम/लीटर पानी की दर से 500-800 लीटर पानी का घोल बनाकर 10-12 दिनों के अन्तराल पर दो छिड़काव अवश्य करें। सुरंग बनाने वाली सूंडी सरसों की फसल में सुंडियां पत्तियों में सुरंग बनाकर हरे पदार्थ को खाती हैं। इस सूंडी का आक्रमण पफरवरी में नीचे वाली पत्तियों पर अधिक होता है। इस कीट के लक्षण दिखने पर मैटासिस्टॉक्स (मिथाइल डेमेटान) 25 ई.सी. को 250-400 मि.ली. या रोगोर (डाइमेथोएट) 30ई.सी. को 250-400 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। यदि आवश्यकता हो तो 15 दिनों के अन्तराल पर दूसरा छिड़काव करें। चितकबरा (पेन्टेड बग) कीट ये कीट सरसों की फसल में प्रांरभिक (4-5 पत्तियां) अवस्था की फसल के छोटे-छोटे पौधों को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। वयस्क कीट तथा उसका निम्फ पौधे के तने व पत्तियों से रस चूसते हैं, जिससे पत्ते सफेद होकर मर जाते हैं। ये कीट कटाई के समय मार्च में ज्यादा हानि पहुंचाते हैं। इस कीट का प्रकोप होने पर क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत धूल 15-20 कि.ग्रा. या 2 प्रतिशत मिथाइल पैराथियान या 5 प्रतिशत मैलाथियान 20-25 कि.ग्रा. का प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। माहूं या चेंपा कीट राई-सरसों की फसल में लगने वाला यह प्रमुख कीट है। यह कीट प्रायः दिसंबर के अन्त में प्रकट होता है और जनवरी-फरवरी में इसका प्रकोप अधिक होता है। ये कीट कम तापमान व 60-80 प्रतिशत आर्द्रता में अत्यधिक वृद्धि करते हैं। इस कीट के शिशु व प्रौढ़ पौधों के तने, फूलों व फलियों से रस चूसते हैं तथा फसल को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। यह कीट मधुस्राव निकालते हैं, जिससे काले कवक का आक्रमण होता है और उपज कम हो जाती है। जब कीट का प्रकोप औसतन 25 कीट प्रति पौधा हो जाए तो इसमंे से किसी एक कीटनाशक जैसे-मैलाथियान 50 ई.सी. 1250 मि.ली. या फॉस्फाेसमिडान (85 डब्ल्यू.एस.सी.) 250 मि.ली. या थायोमिडान (25 ई.सी.) १००० मि.ली. या मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी. या डाईमेथोएट 30 ई.सी.या मोनोक्रोटोफाॅस 35 डब्ल्यू.एस.सी. का 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। सूरजमुखी बुआई का समय सूरजमुखी की फसल सभी मौसमों में उगायी जा सकती है। फिर भी बुआई का समय इस तरह से निश्चित कर लेना चाहिए कि फूल लगने के समय लगातार बूंदा-बांदी, बादल छाए रहने या तापमान 38 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहने की स्थिति से बचा जा सके। जहां इसकी पारंपरिक रूप से खेती नहीं होती है, वहां इसकी बुआई बसंत ऋतु में जनवरी से फरवरी के अन्त तक की जा सकती है। मृदा, बीज एवं सिंचाई सूरजमुखी की फसल के लिए मृदा एवं अच्छी तरह से छनी हुई उपजाऊ मृदा की आवश्यकता होती है। बीज दर मृदा की दशा, दानों के आकार, अंकुरण, बोने का समय एवं बोने की विधि पर निर्भर करता है। सिंचाई पर निर्भर फसल के लिए 4-5 कि.ग्रा./ हैक्टर बीज पर्याप्त होता है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सें.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 30 सें.मी. एवं बीज की गहराई 4-5 सें.मी. होनी चाहिए। किस्में सूरजमुखी की संकर किस्में जैसे-डीआर.एस.एच-1, के.बी.एस.एच.-44, पी.एस.एच.एफ.-118, पी.एस.एच.एफ-569, पी.ए.सी.-36, पी.ए.सी.-1091, के.बी.एस.एच.-1,एच.एस.एफ.एच-878, के.बी.एस.एच.-41, के.बीएस.एच.-53, आर.एस.एफ.एच-1, एल.एस.एफ.एच.-35, एम.एल.एस.एफएच.-47 और आर.एस.एफ.एच-130 एवं संकुल किस्में जैसे-माडर्न व सूर्या आदि संस्तुति की गई है। बीजों में उत्पन्न होने वाले रोगों की रोकथाम के लिए 3 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की मात्रा कैप्टॉन या थीरम से उपचारित कर लेना चाहिए। उर्वरकों का प्रयोग उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना उचित रहता है। सिंचाई पर आधारित फसल के लिए 60:90:30 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश की सिफारिश की जाती है। बुआई के समय सूरजमुखी की फसल के लिए 50 प्रतिशत नाइट्रोज फॉस्फोरस एवं पोटाश खाद की सम्पूर्ण मात्रा देनी चाहिए और शेष को दो बराबर-बराबर भाग करके बुआई के 30 और 55 दिनों के बाद डालना चाहिए। फास्फोरस को प्राप्त करने के लिए सिंगल सुपर फास्फेट को लेना चाहिए, जिससे गंधक की आवश्यकता भी पूर्ण होती है। अंतःफसल प्रणाली तुर+ सूरजमुखी (2:1/1:1/2), सूरजमुखी+ मूंगफली 5+1/3:1), सूरजमुखी + सोयाबीन+ सूरजमुखी (2:1) की दर से फसल बोना बहुत ही लाभदायक होता है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अवनि कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग एवं संरक्षित खेती और प्रौद्योगिकी, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012