<h3 style="text-align: justify;">अमरूद</h3> <p style="text-align: justify;">अमरूद के बीजू पौधे तैयार करने के लिए बीजों की पौधशाला में बुआई करें। अमरूद के एक वर्ष के पौधे के लिए 10 कि.ग्रा. कम्पोस्ट/गोबर खाद, 30 ग्राम नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं 60 ग्राम पोटाश व 6 वर्ष या उससे अधिक के पौधे के लिए यह मात्रा बढ़कर क्रमशः 10 कि.ग्रा. कम्पोस्ट/गोबर की खाद, 180 ग्राम नाइट्रोजन,फॉस्फोरस एवं 360 ग्राम पोटाश हो जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">अमरूद की फसल में एंथ्रेक्नोज रोग की रोकथाम के लिए ब्लाइटॉक्स (2 ग्राम/लीटर) का 20 दिनों के अन्तराल पर 2-3 छिड़काव करना चाहिए। सिंचाई की सुविधा होने पर अमरूद, आम, आंवला, कटहल, लीची व पपीता के बाग का रोपण करें। फलों के नये व पुराने बागानों में अन्तरासस्य के रूप में लोबिया, टमाटर, भिण्डी व मिर्च आदि की बुआई/रोपाई अवश्य करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">कटहल</h3> <p style="text-align: justify;">कटहल के फलदार बागों में नाइट्रोजनधारी व पोटाश उर्वरकों का प्रयोग करें। पत्ती के काले धब्बे की रोकथाम के लिए ब्लाइटॉक्स-50 के घोल का छिड़काव करें। आडू की फसल में पर्ण-कुंचन माहूं की रोकथाम के लिए ऑक्सीडिमेटॉन मिथाइल 25 ई.सी. (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव 15 दिनों के अन्तराल पर करें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="160" height="140" /></p> <h3 style="text-align: justify;">केला</h3> <p style="text-align: justify;">केले के बगीचों से सूखी पत्तियां निकालकर साफ-सफाई करें। इस माह के अन्त तक नाइट्रोजन व पोटाश उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई कर दें। माहूं की राकेथाम के लिए क्विनालफॉस (25 ई.सी.) 1.0 लीटर/हैक्टर की दर से छिड़काव कर दें।</p> <h3 style="text-align: justify;">लोकाट </h3> <p style="text-align: justify;">लोकाट की फसल में फलछेदक एवं फल विगलन कीट की रोकथाम के लिए मैलाथियान 0.2 प्रतिशत व ब्लाइटॉक्स-50 (0.25 प्रतिशत) के घोल का छिड़काव करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">पपीता</h3> <p style="text-align: justify;">पिछले मौसम में लगाये गये पपीता के पौधों में नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई करने के बाद एक सिंचाई कर दें। बेर के बाग को सापफ रखें। फलछेदक कीट की रोकथाम के लिए मैलाथियान 0.5 प्रतिशत का छिड़काव करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">आंवला</h3> <p style="text-align: justify;">आंवला के नये व पफलदार वृक्षों में नाइट्रोजनधारी व पोटाश उर्वरकों का प्रयोग करके गुड़ाई कर दें। </p> <h3 style="text-align: justify;">लीची</h3> <p style="text-align: justify;">लीची के एक वर्ष के पौधे में 5 कि.ग्रा. कम्पोस्ट/गोबर खाद, 50 ग्राम नाइट्रोजन, 25 ग्राम फास्फोरस एवं 25 ग्राम पोटाश की मात्रा दें, जिसे क्रमशः बढ़ाकर 10 वर्ष अथवा उससे अधिक आयु के पौधे में 50 कि.ग्रा. कम्पोस्ट/ गोबर खाद, 250 ग्राम नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं 500 ग्राम पोटाश का प्रयोग करें। फल वृक्षों में उर्वरक देने के लिए वृक्ष के मुख्य तने से 1-2 मीटर की दूरी पर लगभग 30 सें.मी. चैड़ी एवं 15-20 सें.मी. गहरी नाली बनाकर उसमें उर्वरकों का मिश्रण छिड़क दें। ऊपर से मिट्टी से ढक देने के बाद 10-15 सें.मी. सिंचाई कर दें।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अवनि कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग एवं संरक्षित खेती और प्रौद्योगिकी, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012</p>