<h3 style="text-align: justify;">गेहूं की कटाई</h3> <p style="text-align: justify;">गेहूं की कटाई से लेकर बेचने तक की अवधि में कई प्रकार के कार्य किए जाते हैं, जिनका अलग-अलग महत्व है। यदि खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरे हुए हैं तो गेहूं के एक बड़े हिस्से की कटाई श्रमिकों द्वारा दरांती, हंसिये, रीपर या मोअर से की जाती है। इसमें जमीन की सतह से 3-6 सें.मी. ऊपर से कटाई की जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कम्बाइन प्रयोग</h3> <p style="text-align: justify;">बडे़ पैमाने पर कटाई के लिए कम्बाइन प्रयोग में लाई जाती है। फसल पकने के तुरंत बाद काट लेना चाहिए, क्योंकि फसल अधिक पकने पर कुछ प्रजातियों में दाने झड़ने लगते हैं। इसके अतिरिक्त पकने के बाद काटने में देरी करने से चिड़ियों तथा चूहों से भी नुकसान हो सकता है। कभी-कभी काटने में देरी करने से गेहूं की गुणवत्ता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। अप्रैल के अंत तक प्रायः सभी प्रजातियों को काट लेना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">कटाई के बाद हाेने वाली हानि काे कम करना</h3> <p style="text-align: justify;">गेहूं में कुल उत्पादन का लगभग 8 प्रतिशत भाग कटाई उपरांत नष्ट हो जाता है। उचित तरीकों को अपनाकर इस हानि को कम किया जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कटाई की सही अवस्था एवं समय</h3> <p style="text-align: justify;">जब दाने सुनहरे सख्त होने लगें तथा दानों में 18-20 प्रतिशत नमी हो, वह कटाई की सही अवस्था होती है। सुबह का समय कटाई के लिए ज्यादा उपयुक्त होता है। अगर कटाई हाथ से की जाती है, तो फसल के बंडल को 3-4 दिनों खेत में छोड़ देना चाहिए। बड़ी जोत वाली जगहों पर कम्बाइन हार्वेस्टर का प्रयोग करने से कटाई, मड़ाई तथा ओसाई एक साथ हो जाती है और भूसे को इकट्ठा करने के लिए भूसे बनाने की मशीन का उपयोग भी किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">उन्नत तकनीक से खेती करने पर सिंचित अवस्था में गेहूं की बोनी किस्मों से लगभग 50-60 क्विंटल दाने के अलावा 80-90 क्विंटल भूसा/हैक्टर प्राप्त होता है। जबकि देसी लम्बी किस्मों से इसकी लगभग आधी उपज प्राप्त होती है। देसी किस्मों से असिंचित अवस्था में 15-20 क्विंटल प्रति हैक्टर उपज प्राप्त होती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">भंडारण</h3> <p style="text-align: justify;">भंडारण के लिए दानों में 10-12 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं होनी चाहिए। भंडारण के पूर्व कोठियों तथा कमरों को साफ कर लें और दीवारों व फर्श पर मैलाथियान 50 प्रतिशत के घोल का 3 लीटर प्रति 100 वर्गमीटर की दर से छिड़काव करें। अनाज को बुखारी, कोठिलों या कमरे में रखने के बाद एल्यूमिनियम फॉस्फाइड 3 ग्राम की दो गोलियां प्रति टन की दर से रखकर बंद कर देना चाहिए। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भाकृअनुप) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001, विनोद कुमार सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोष नगर, हैदराबाद।</p>