साेयाबीन खरपतवार सोयाबीन और तिल में भी खरपतवार नियंत्रण के साथ-साथ प्रमुख रोगों और कीटों को नष्ट करने के उपाय करने चाहिए। सोयाबीन की फसल में खरपतवार को रासायनिक विधि से नष्ट करने के लिए इमेजीक्राइपर (10 ई.सी.) 750-1000 मि.ली. मात्रा प्रति हैक्टर को 500-600 लीटर पानी में मिलाकर इसका बुआई के 10-20 दिनों बाद छिड़काव करें या क्विजैलोफॉप-9-टरफ्लूरॉइल (4.4 ई.सी.) पेन्टारा 750-1000 मि.ली. या फिनाक्साप्रोन 10 (ई.सी.) व्हिप सुपर 800-1000 मि.ली. मात्रा प्रति हैक्टर को 500-600 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के 20-25 दिनों बाद छिड़काव करें। निराई-गुड़ाई बुआई के 20-25 दिनों के अंदर कसोले से निराई-गुड़ाई कर खरपतवारों को नष्ट कर देना चाहिए। मोजेक रोग सोयाबीन की फसल पर पीले मोजेक रोग का विशेष प्रभाव पड़ता है। यह रोग वायरस द्वारा फैलता है, जिसे सफेद मक्खी फैलाती है। प्रभावित पौधों की पत्ती पीली और चित्तीदार दिखाई देती है। इसकी रोकथाम के लिए डाइमेथोएट (30 ई.सी.) या मिथाइल-ओ-डिमेटान (25 ई.सी.) की एक लीटर मात्रा को 800-1000 लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार 10-15 दिनों के अंतराल पर 1-2 छिड़काव करें। रोगरोधी किस्में रोगरोधी किस्में जैसे-पीके-262, पीके-327, पीके-416, पीके-472, पीके-1024 पीएस-564 को बोयें। चितकबरा पीले धब्बे एवं पत्ती धब्बा रोग चितकबरा पीले धब्बे के लिए कन्पफीडोर की 250 मि.ली./हैक्टर मात्रा 25 एवं 45 दिनों पर तथा पत्ती धब्बा रोग के लिए बाविस्टीन की 250 ग्राम मात्रा 600 लीटर पानी/हैक्टर की दर से छिड़काव करें। दीमक का प्रकोप खेत में दीमक का प्रकोप दिखाई देने पर मोनोक्रोटोफॉस (36 ई.सी.) 750 मि.ली. या क्लोरोपायरीफॉस (20 ई.सी.) की 2.5 लीटर या क्यूनालफॉस (25 ई.सी.) की 1.5 लीटर मात्रा को 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। तिल अल्पावधि प्रजातियों की बुआई जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह को तिल की अधिक उपज के लिए उपयुक्त पाया गया है। अगस्त में मानसून में देरी होने या खेत खाली होने की दशा में तिल की अल्पावधि प्रजातियों की बुआईं कर सकते हैं। ध्यान रहे तिल में पुष्पण एवं पफली में बीज भरने की अवस्था में मृदा में नमी की कमी न हो। इन अवस्थाओं पर नमी की कमी होने पर फसल की सिंचाई अवश्य करें। जल की निकासी खरीफ के मौसम में आवश्यकतानुसार अधिक जल की निकासी अथवा नमी संरक्षण के उचित उपाय करें। निराई-गुड़ाई सामान्यतः दो निराई-गुड़ाई करने से खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। पहली निराई-गुड़ाई फसल बोने के 15-20 दिनों के दौरान एवं दूसरी निराई-गुड़ाई बुआई के 35-40 दिनों के अंदर करनी चाहिए। दूसरी निराई-गुड़ाई पर नाइट्रोजन की शेष मात्रा का भी प्रयोग करें। निराई-गुड़ाई के लिए श्रमिकों की कमी होने पर, तिल में 1.0 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से फ्लूक्लोरेलिन सक्रिय दवा को 400-500 लीटर पानी में घोलकर बुआई से पहले खेत में छिड़कने से भी खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता है। एलाक्लोर (1.75 कि.ग्रा.) या पेन्डीमेथिलीन (1 कि.ग्रा.) के प्रयोग से भी खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। फाइलोडी यह रोग माइक्रो प्लाज्मा द्वारा होता है। इस रोग में पौधों का पुष्पविन्यास पत्तियों के विकृत रूप में बदलकर गुच्छेदार हो जाता है। इस रोग का वाहक फुदका कीट है। इसकी रोकथाम के लिए तिल की बुआई समय से पहले न की जाए। बुआई के समय कूंड़ में फोरेट 10 जी. 15 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से प्रयोग किया जाए। मिथाइल-ओ-डिमेटान 25 ई.सी. 1.0 लीटर/हैक्टर की दर से छिड़काव करना चाहिए। स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और ऋषि राज सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली।