किस्म और सिंचाई गन्ना की सी.ओ.एच-37 किस्म मई के पहले सप्ताह तक लगा सकते हैं। यह किस्म तेजी से बढ़ने वाली है, जिसका गन्ना मोटा, नरम व रसीला होता है। यह कमजोर मिट्टी पर तथा सिफारिश की गई नाइट्रोजन की आधी मात्रा से 320 क्विंटल पैदावार तथा 18-20 प्रतिशत खांड देती है। इसके गन्ने अधिक बढ़ने पर गिर जाते हैं इसलिए इसे दवि-पंक्ति विधि से बोना, मिट्टी चढ़ाना व बांधना बहुत जरूरी है। बीजाई के 6 सप्ताह बाद पहली सिंचाई दें तथा शदरकालीन, बसंतकालीन व मोढ़ी फसल की मई में 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। सी.ओ.जे.-64 को अधिक सिंचाई की जरूरत होती है। सी.ओ.-1148 व सी.ओ.एस.-767 किस्में सूखे को काफी सहन कर लेती हैं। मई में गन्ने पर हल्की मिट्टी चढ़ा दें, इससे खरपतवार नियंत्रण तो होता ही है, फसल भी गिरने से बच जाती है। ग्रीष्मकालीन गन्ने की बुआई मई में ग्रीष्मकालीन गन्ने की बुआई की जाती है, लेकिन इसकी पैदावार शरद व बसंतकालीन गन्ने से कम होती है। विभिन्न गन्ने की फसलों की उपयुक्तता इससे पहले ली जाने वाली फसल पर निर्भर करती है। यदि ग्रीष्मकालीन गन्ने की फसल की पैदावार बढ़ानी है, तो उपयुक्त किस्म तथा संतुलित पोषण अनिवार्य है। बुआई से पूर्व गन्ने के टुकड़ों को 24 घंटे पानी में भिगोकर रखना अंकुरण अच्छा होता है। इस समय बुआई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सें.मी. कर लें और कूंड के अंदर पेड़ों की संख्या भी बढ़ा दें। गन्ने में बुआई के लगभग 3 माह बाद 60-75 कि.ग्रा. नाइट्रोजन या 130-163 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हैक्टर की टॉप ड्रेसिंग करें। यदि गन्ना काटने के बाद गन्ने की बुआई करनी हो तो पलेवा करके गन्ना बोयें। विशेष ध्यान दें इस समय गन्ने की फसल पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है, खासतौर से सिंचाई प्रबंधन पर। इस महीने में बहुत गर्मी पड़ने के साथ तेज हवाएं भी चलती हैं। मृदा में पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए हर 15-20 दिनों के अंतराल पर पानी देना चाहिए। गन्ने की पेड़ी से अच्छी उपज लेने के लिए 75 कि.ग्रा. नाइट्रोजन या 163 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हैक्टर पहली फसल काटने के बाद एवं इतना ही यूरिया की मात्रा दूसरी व तीसरी सिंचाई के समय या फसल काटने के 60 दिनों बाद एवं साथ ही 75 कि.ग्रा. पोटाश का प्रयोग वांछनीय है। यदि कुछ कीटों का प्रकोप दिखे तो पफोरेट 10 जी की 30 कि.ग्रा. मात्रा का प्रयोग करना चाहिए। पानी की मात्रा पानी की कमी होने पर पताई की पंक्तियों के बीच में 7-8 सें.मी. मोटी परत बिछा देनी चाहिए। ऐसा करने से पेड़ी के खेत में सिंचाई के बाद नमी बनी रहेगी, खरपतवार भी कम उगेंगे, गन्ने की पताई धीरे-धीरे सड़ती रहती हैं तथा कम्पोस्ट खाद का काम करती हैं। बावक फसल की कटाई के बाद सभी मुंड से पेड़ी का पफुटाव नहीं होता, जिसके कारण खेत में जगह-जगह रिक्त स्थान बन जाते हैं। इन रिक्त स्थानों को भरने के लिए पहले से तैयार नर्सरी से पौधे उखाड़कर लगा देने चाहिए या पिफर दो-आंखों वाले टुकड़ों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कर दें। इससे खेत में पौधों की संख्या अधिक रहेगी और अधिक पैदावार मिलेगी। अंकुरबेधक व दीमक से बचाव गन्ने को अंकुरबेधक व दीमक से बचाने के लिए कूंड को ढकने से पहले बी.एच.सी. 20 ई.सी. दवा की 6 लीटर मात्रा का 1 लीटर पानी में घोलकर बोये गए टुकड़ों के ऊपर छिड़काव करें। अगोलाबेधक कीट की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस 40 ई.सी. की 1.5 लीटर या 30 कि.ग्रा. कार्बोफ्यूरॉन प्रति हैक्टर दवा 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। कीट नियंत्रण एवं प्रबंधन गन्ने की फसल में कीट नियंत्रण एवं प्रबंधन के लिए बुआई के समय एक एकड़ भूमि में 2 लीटर क्लारोपोयरीफॉस को 400 लीटर पानी में घोलकर बुआई की गयी पंक्तियों में डाल दें। अप्रैल से जुलाई के बीच 400 लीटर पानी में रैनेक्सीपैर 20 एस.सी. की 150 मि.ली. मात्रा घोलकर छिड़काव करें। जून के अंत में 13 कि.ग्रा. कार्बोफ्यूरॉन को प्रति एकड़ भूमि में डालें। पूर्ण जीवनकाल गन्ने की फसल को एक पूर्ण जीवनकाल के लिए 60 से 70 इंच पानी की आवश्यकता होती है। इसमें आधा पानी वर्षा से प्राप्त हो जाता है, सुविधानुसार 15 से 20 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करने से पेड़ी फसल की अच्छी पैदावार होती है। पेड़ी फसल में काला चिकटा (ब्लेक बग) तथा गुलाबी चिकटा कीट का प्रकोप अप्रैल से मई में होता है। ये गन्ने की पत्तियों का रस चूस जाते हैं, जिससे पत्तियां पीले रंग की हो जाती हैं और पौधे धीरे-धीरे मुरझाने लगते हैं। इसके नियंत्रण के लिए रॉकेट (प्रोफोनोफोस साइपर) 400 मि.ली. प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। रोगरोधी प्रजाति गन्ने की फसल को रोग से बचाने के लिए रोगरोधी प्रजातियों की बुआई करें। स्वस्थ बीज एवं समन्वित रोग प्रबंधन द्वरा रोगों से बचाव संभव है तथा अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। रोगग्रस्त गन्ने को खेत से निकालकर 0.1 प्रतिशत कार्बेंडाजिम का छिड़काव करें। स्त्रोत: खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), पूसा रोड,नई दिल्ली ।