<h3 style="text-align: justify;"> तापमान, वर्षा,मृदा एवं सिंचाई</h3> <p style="text-align: justify;">कपास के उत्तम जमाव के लिए न्यूनतम 16 डिग्री सेल्सियस तापमान, फसल बढ़वार के समय 21-27 डिग्री सेल्सियस तापमान व उपयुक्त फलन के लिए दिन में 27 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा रात्रि में ठंडक का होना आवश्यक है। गूलरों के फटने के लिए चमकीली धूप व पालारहित ऋतु आवश्यक है। कपास के लिए कम से कम 50 सें.मी. वर्षा का होना जरूरी है। कपास के लिए उपयुक्त मृदा में अच्छी जलधारण एवं जल निकास क्षमता होनी चाहिए। जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध हों वहां बलुई और बलुई दोमट मृदा में इसकी खेती की जा सकती है। इसके लिए उपयुक्त पी-एच मान 5.5-6.0 है। इसकी खेती 8.5 पी-एच मान तक वाली मृदा में भी की जा सकती है। </p> <h3 style="text-align: justify;">बुआई </h3> <p style="text-align: justify;">अमेरिकी प्रजातियों की बुआई देसी प्रजातियों से कुछ पहले की जाती है। पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में इसकी बुआई आमतौर पर गेहूं की कटाई के बाद अप्रैल-मई में की जाती है। अप्रैल-मई में बुआई करना अधिक लाभकर रहता है। कपास की बुआई के लिए बीज को पंक्तियों में बोना सदैव अच्छा रहता है। पंक्तियों में बुआई के लिए सीडड्रिल या देसी हल के पीछे कूंड में बीज बोया जाता है। अमेरिकन, देसी और संकर कपास का क्रमशः 15-20, 15-16 और 2-2.5 कि.ग्रा./हैक्टर बीज पर्याप्त होता है। देसी अथवा अमेरिकन कपास के लिए 60×30 सें.मी. तथा संकर किस्मों के लिए 90×60 सें.मी. पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी रखनी चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">बीज उपचार </h3> <p style="text-align: justify;">बीज सुखाने के बाद कार्बेन्डाजिम फफूंदनाशक द्वारा 2.5 ग्राम/कि.ग्रा. की दर से बीज शोधन करना चाहिए। फफूंदनाशक दवाई के उपचार से फ्यूजेरियम उकठा, राइजोक्टोनिया जड़गलन और अन्य मृदाजनित फफूंद से होने वाली व्याधियों से बचाया जा सकता है। कार्बेन्डाजिम सिस्टेमिक रसायन है, इससे प्राथमिक अवस्था में रोगों के आक्रमण से बचाया जा सकता है। इमिडाक्लोप्रिड 7.0 ग्राम अथवा कार्बोसल्फान 20 ग्राम/कि.ग्रा. बीज उपचारित कर बोने से फसल को 40 से 60 दिनों तक रस चूसक कीटों से सुरक्षा मिलती है। दीमक से बचाव के लिए 10 मि.ली. पानी में 10 मि.ली. क्लोरपाइरीफॉस मिलाकर बीज पर छिड़क दें तथा 30-40 मिनट छाया में सुखाकर बुआई कर दें। </p> <h3 style="text-align: justify;">उन्नत किस्में</h3> <p style="text-align: justify;">मई माह कपास की बुआई के लिए सर्वोत्तम है, बशर्त सिंचाई की व्यवस्था हो। विभिन्न क्षेत्रों के लिए</p> <h4 style="text-align: justify;">अमेरिकन कपास</h4> <p style="text-align: justify;">अमेरिकन कपास (गोसीपियम हिर्सुटम) की उन्नत किस्में जैसे-पूसा 8-6, एल.एस. 886, एफ. 286, एफ. 414, एफ. 846, एफ. 1378, एफ. 1861, एल.एच. 1556, एस. 45, एच. 1098, एच. 1117, एच.एच.एस. 6, गंगानगर अगेती, बीकानेरी नरमा, आर.एस. 875, आर.एस. 2013, विकास, कंडवा 3, के.सी. 94-2, पी.के.वी. 081, एल.आर.के. 516, सी.एन.एच. 36, रजत, गुजरात कॉटन 12, गुजरात कॉटन 14, गुजरात कॉटन 16, एल.आर.के. 516, सी.एन.एच. 36, एल.आर.ए. 5166, एल.ए. 920, कंचन, शारदा, जे.के. 119, अबदीता, एम.सी.यू. 5, एम.सी.यू. 7, एम.सी.यू. 9 व सुरभि।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="181" height="159" /></p> <h4 style="text-align: justify;">संकर कपास</h4> <p style="text-align: justify;">संकर कपास की उन्नत किस्में जैसे-फतेह, एल.डी.एच. 11, एल.एच. 144, धनलक्ष्मी, एच.एच.एच. 223, सीएस.ए.ए. 2, उमा शंकर, राज.एच.एच. 116, जे.के.एच.वाई. 1, जे.के. एच.वाई. 2 (जीरो टिलेज), एन.एच.एच. 44, एचएच वी 12, एच. 8, डी.एच. 5, डी.एच. 7, एच. 10, लक्ष्मी, एच.एस. 45, एच.एस. 6, एच.एल. 1556, एफ. 846, एफ. 1378, एफ. 1861, सविता, एच.बी. 224, डी.सी.एच. 32, डी.एच.बी. 105, डी.डी.एच. 2, डी.डी.एच. 11, सूर्या, आर.सी.एच. 2 व डी.सी.एच. 32</p> <h4 style="text-align: justify;">देसी कपास</h4> <p style="text-align: justify;">देसी कपास (गोसीपियम आर्बोरिम) की उन्नत किस्में जैसे-एच.डी. 1, एच.डी. 107, एच. 777, एच. 974, डी.एस.5, एल.डी. 230, एल.डी. 327, एल.डी. 491, एल.डी. 694, पी.एयू. 626, मोती, डी.एस. 1, डी.एस. 5, एच.डी. 123, आर.जी. 8, लोहित यामली, माल्जरी, पी.ए. 183, ए.के.ए. 4, रोहिणी, गुजरात कॉटन 11, गुजरात कॉटन 15, श्रीसाइलर्म महानदी, एन.ए. 1315 जी. 22, ए.के. 235 के. 10 व के. 11 आदि प्रजातियां उत्तरी, मध्य एवं दक्षिण क्षेत्रा के लिए अनुमोदित की गयी हैं। सिंचित क्षेत्रों के लिए फसलचक्र जैसे-कपास-गेहूं/जौ कपास-बरसीम/सेंजी/जई, कपास-मूंगफली, कपास-सूरजमुखी, आदि। उत्तर भारत में कपास-गेहूं, कपास-मटर, कपास-ज्वार तथा दक्षिणी भारत में कपास-धान, कपास-मूंगफली, धान-कपास, कपास-ज्वार फसलचक्र मुख्य हैं। उत्तरी भारत में कपास के बाद गेहूं की फसल लेने के लिए कपास की जल्दी पकने वाली प्रजाति आरै गेहूं की देर से बोने वाली प्रजाति बोनी चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग</h3> <p style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जाना चाहिए। कपास की देसी प्रजातियों के लिये 50-70 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 20-30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, अमेरिकन प्रजातियों के लिये 60-80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 20-30 कि.ग्रा. पोटाश और संकर प्रजातियों के लिये 150-60-60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश प्रति हैक्टर की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर का प्रयोग लाभदायक पाया गया है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं बाकी उर्वरकों की पूरी मात्रा बुआई के समय डालनी चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">सिंचाई की सुविधा</h3> <p style="text-align: justify;">जहां सिंचाई की सुविधा हो, कपास की बुआई 15-25 मई के बीच कर दें। इससे सही समय पर फसल तैयार हो जायेगी। बारानी क्षेत्र में मानसून के साथ ही बुआई करना उचित होगा। कपास में 3-4 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। मृदा की नमी के अनुसार सिंचाई करें एवं अन्तिम सिंचाई एक तिहाई टिण्डे खुलने पर करें। </p> <h3 style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण </h3> <p style="text-align: justify;">कपास की अच्छी उपज लेने के लिए पूरी तरह खरपतवार नियंत्रण होना अति आवश्यक है। इसके लिए तीन-चार बार फसल बढ़वार के समय गुड़ाई बैलचालित त्रिवफाली कल्टीवेटर या ट्रैक्टरचालित कल्टीवेटर द्वारा करनी चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर ’सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-११००१२।</p>