<ul> <li style="text-align: justify;">पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में इसकी बुआई आमतौर पर गेहूं की कटाई के बाद अप्रैल-मई में की जाती है। अप्रैल-मई में बुआई करना अधिक लाभकर रहता है। कपास की बुआई के लिए बीज को पंक्तियों में बोना सदैव अच्छा रहता है। पंक्तियों में बुआई के लिए सीड ड्रिल या देसी हल के पीछे कूंड में बीज बोया जाता है। अमेरिकन, देसी और संकर कपास की क्रमशः 15-20, 15-16 और 2-2.5 कि.ग्रा./हैक्टर बीज पर्याप्त होता है। देसी कपास अथवा अमेरिकन कपास के लिए 60×30 सें.मी. तथा संकर किस्मों के लिए 90×60 सें.मी. पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी रखनी चाहिए।</li> <li style="text-align: justify;">सिंचित क्षेत्रों के लिए फसलचक्र जैसे कपास-सूरजमुखी, कपास-मूंगफली, कपास-बरसीम/सेंजी/जई, कपास-गेहूं/ जौ, कपास-बरसीम/सेंजी/जई आदि। उत्तर भारत में कपास-मटर, कपास-ज्वार और कपास-गेहूं तथा दक्षिणी भारत में कपास-ज्वार, कपास-मूंगफली, धान-कपास और कपास-धान फसल चक्र मुख्य हैं। उत्तरी भारत में कपास के बाद गेहूं की फसल लेने के लिए कपास की जल्दी पकने वाली प्रजाति और गेहूं की देर से बोने वाली प्रजाति बोनी चाहिए। </li> <li style="text-align: justify;">विभिन्न क्षेत्रों के लिए अमेरिकन कपास(गोसीपियम हिर्सुटम)की उन्नतशील किस्में जैसे-एफ. 286, एल.एस. 886, एफ. 414, एफ. 846, एफ. 1861, एल.एच. 1556, पूसा 8-6, एफ. 1378,एच. 1117, एच.एस. 45, एच.एस. 6, एच. 1098, गंगानगर अगेती, बीकानेरी नरमा। देसी कपास (गोसीपियम आर्बोरिम) की उन्नत किस्में जैसे-एच. 777, एच.डी. 1, एच. 974, एच.डी. 107, डी.एस. 5, एल.डी. 694, एल.डी. 327, एल.डी. 230, एवं संकर कपास की उन्नत किस्में जैसे-फतेह, एल.डी.एच. 11, एल.एच. 144, धनलक्ष्मी, एच.एचएच. 223, सी.एस.ए.ए. 2,उमा शंकर, राज.एच.एच. 116, जे.के.एच.वाई. 1, जे.के. एच.वाई. 2 (जीरोटिलेज), एन.एच.एच. 44, एच एच वी 12, एच. 8 आदि भारत के सभी क्षेत्रों में उगाई जाती हैं।</li> <li style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जाना चाहिए। कपास की देसी किस्मों के लिए 50-70 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 20-30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, अमेरिकन एवं देसी किस्मों के लिए 60-80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 30 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 20-30 कि.ग्रा. पोटाश और संकर किस्मों के लिए 150-60-60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश प्रति हैक्टर की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति हैक्टर का प्रयोग लाभदायक पाया गया है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं बाकी उर्वरकों की पूरी मात्रा बुआई के समय डालनी चाहिए। नाइट्रोजन की बाकी मात्रा फूल आने के समय सिंचाई के बाद देनी चाहिए।</li> <li style="text-align: justify;">जहां सिंचाई की सुविधा हो, कपास की बुआई 15-25 मई के बीच कर दें। इससे सही समय पर फसल तैयार हो जायेगी। बारानी क्षेत्रा में मानसून के साथ ही बुआई करना उचित होगा। कपास में 3-4 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। मृदा की नमी के अनुसार सिंचाई करें एवं अंतिम सिंचाई एक तिहाई टिंडे खुलने पर करें।</li> <li style="text-align: justify;">कपास की अच्छी उपज लेने हेतु पूरी तरह खरपतवार नियंत्रण होना अति आवश्यक है। इसके लिए तीन-चार बार फसल बढ़वार के समय गुड़ाई बैलचालित त्रिफाली कल्टीवेटर या ट्रैक्टर चालित कल्टीवेटर द्वारा करनी चाहिए। पहली गुड़ाई सूखी हो, जिसे पहली सिंचाई के पूर्व (बुआई के 30-35 दिनों पहले) ही कर लेना चाहिए। फूल व गूलर बनने पर कल्टीवेटर का प्रयोग न किया जाए। इन अवस्थाओं में खुर्पी द्वारा खरपतवार निकाल देना चाहिए। 3.3 कि.ग्रा. पेंडीमेथलीन प्रति हैक्टर जमाव से पूर्व या बुआई के 2-3 दिनों के अंदर प्रयोग करें।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत: खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), पूसा रोड, नई दिल्ली ।</p>