<h3 style="text-align: justify;"> अधिक उपज </h3> <p style="text-align: justify;">मक्का, भारत की मुख्य फसलों में से एक है। इसका उपयोग मानव आहार, पशुओं को खिलाने वाले दाने एवं भूसे के रूप में होता है। इसके अतिरिक्त इससे औद्योगिक महत्व की वस्तुएं बनाई जाती हैं। भारत में साधारण रूप से रबी मौसम में मक्का की फसल से अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">निराई-गुड़ाई एवं बुआई</h3> <p style="text-align: justify;">पहली निराई-गुड़ाई, बुआई के 20-25 दिनों के बाद करें, जिससे खेत में खरपतवार न रहें। सिंचाई की सुनिश्चित व्यवस्था होने पर रबी मक्का की बुआई माह के मध्य तक पूरी कर लें। बुआई के लगभग 25-30 दिनों बाद पहली सिंचाई कर दें।</p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरक की मात्रा</h3> <p style="text-align: justify;">मृदा परीक्षण न होने पर बुआई के समय सामान्यतः प्रति हैक्टर 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फेट एवं 40 कि.ग्रा. पोटाश और यदि मृदा में जिंक की कमी हो, तो बुआई के पहले 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट भूमि में अवश्य मिलाना चाहिए। पौधे के लगभग घुटने तक की ऊंचाई के होने या बुआई के लगभग 30-35 दिनों बाद प्रति हैक्टर 87 कि.ग्रा. यूरिया की टॉप ड्रेसिंग कर<br />दें।</p> <h3 style="text-align: justify;">खरपतवार नियंत्रण</h3> <p style="text-align: justify;">मक्का की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए 3-4 बार निराई-गुड़ाई की आवश्यकता रहती है। खड़ी फसल में अधिक नमी के कारण, खरपतवारों का प्रकोप अधिक होता है। निराई-गुड़ाई की गहराई 4-5 सें.मी. से अधिक नहीं होनी चाहिए अन्यथा पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचने का भय रहता है। खरपतवार उगने के समय उखाड़ देना सबसे अच्छा उपचार माना जाता है। मक्का की फसल के लिए खरपतवारनाशी दवा का उपयोग भी किया जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">तनाछेदक कीट</h3> <p style="text-align: justify;">इसमें तनाछेदक कोट की सुंडियां पौधों में घुसकर अन्दर तने को खोखला करती हैं। इससे तना कमजोर हो जाता है तथा पौधे ऊपर से टूट जाते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">लीफ रोलर कीट, तना मक्खी </h3> <p style="text-align: justify;">इसमें लीफ रोलर कीट, तना मक्खी का भी प्रकोप रहता है। इन कीटों की रोकथाम के लिए प्रोफेनोफोस 40 प्रतिशत सायपरमेथ्रिन 4 प्रतिशत ई.सी./400 मि.ग्रा./एकड़ या इमामेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिशत एसजी/100 ग्राम/एकड़ या फ्लूबेंडामाइड 20 प्रतिशत डब्ल्यूजी/100 ग्राम/एकड़ इसमें तनाछेदक कोट की सुडियां पौधों में घुसकर अन्दर तने को खोखला करती हैं। इससे तना कमजोर हो जाता है तथा पौधे ऊपर से टूट जाते हैं। आवश्यकतानुसार छिड़काव दवा बदलकर दोहराएं।</p> <h3 style="text-align: justify;">कट वर्म कीट </h3> <p style="text-align: justify;">कट वर्म कीट का आक्रमण पौधों के अंकुरण के साथ-साथ ही आरम्भ हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए फोरेट का प्रयोग उचित माना गया है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत: खेती पत्रिका(आईसीएआर) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत*, प्रवीण कुमार उपाध्याय एस.एस. राठौर, और अमन सिंह सस्य विज्ञान, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012 एवं आनुवंशिकी विभाग, नितिन कुमार शुक्ला-आचार्य नरेंद्र देव कृषि और प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंब, अयोध्या-224229; श्री देव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय, पौड़ी गढ़वाल।</p>