ताेरिया सिंचाई तोरिया,दिसंबर के अंतिम सप्ताह से जनवरी के प्रथम सप्ताह तक आमतौर पर पक जाती है। पकी हुई फसल की कटाई करें तथा समय पर बोई गई सरसों में दाने भरने की अवस्था में यदि वर्षा न हो तथा प्रथम पखवाड़े में सिंचाई न की हो, तो सिंचाई करनी चाहिए। पाले के दुष्प्रभाव से बचाव दिसंबर के अंतिम सप्ताह में तापमान में तीव्र गिरावट के कारण पाले की भी आशंका रहती है। इससे फसल बढ़वार और फली विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे बचने के लिए सल्फरयुक्त रसायनों का प्रयोग लाभकारी होता है। डाई मिथाइल सल्फोऑक्साइड का 0.2 प्रतिशत, अथवा 0.1 प्रतिशत थायो यूरिया का छिड़काव लाभप्रद होता है। इसके साथ-साथ पाला पड़ने के समय सिंचाई करने से भी पाले का दुष्प्रभाव कम होता है। बीज एवं बुआई उन्नत किस्मों का स्वस्थ बीज, समय पर बुआई एवं फसल सुरक्षा तरीके अपनाकर इसकी उत्पादकता को और अधिक बढ़ाया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में समय पर बुआई नहीं हो पाई है, वहां मध्य दिसंबर तक पूसा सरसों 25, पूसा सरसों 26 और पूसा सरसों 28 की बुआई की जा सकती है। ये प्रजातियां कम अवधि की हैं और देरी से बुआई करने पर भी अच्छी पैदावार देने में सक्षम हैं। तोरिया में दाना झड़ने की आशंका रहती है इसलिए सही समय पर इसकी कटाई करें। खेत को अगली फसल के लिए तैयार करें। तोरिया के बाद पछेती गेहूं, गन्ना, प्याज आदि फसलें उगाई जा सकती हैं। सरसों सिंचाई सरसों में सिंचाई, जल की उपलब्धता के आधार पर करें। यदि एक सिंचाई उपलब्ध हो तो 50-60 दिनों की अवस्था पर करें। दो सिंचाई उपलब्ध होने की अवस्था पहली सिंचाई बुआई के 40-50 दिनों बाद एवं दूसरी 90-100 दिनों बाद करें। यदि तीन सिंचाइयां उपलब्ध हैं तो पहली 30-35 व अन्य दो 30-35 दिनों के अंतराल पर करें। बुआई के लगभग 2 माह बाद जब फलियों में दाने भरने लगे उस समय दूसरी सिंचाई करें। खरपतवारों से मुक्ति तिलहनी फसलों को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए 20-25 दिनों में एक बार निराई-गुड़ाई करने से सरसों की फसल अच्छी तरह और जल्दी से बढ़ती है। रसायनों द्वारा नियंत्रण करने पर बुआई से पूर्व फ्लूक्लोरेलिन (45 ई.सी.) 2.20 लीटर प्रति हैक्टर 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें अन्यथा बुआई के बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व पेन्डीमेथिलिन (30 ई.सी.) 3.30 लीटर प्रति हैक्टर की दर से 600 से 800 लीटर पानी में अच्छी प्रकार मिलाकर छिड़काव करें। बुआई के 15 से २० दिनों के अन्दर घने पौधों को निकालकर उनकी आपसी दूरी 15 सें.मी. कर देनी आवश्यक है। शेष आधी नाइट्रोजन की मात्रा का भी उपयोग सिंचाई के बाद करना होता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि अधिक सिंचाई जल और नाइट्रोजन का प्रयोग न करें। अधिक पानी और नाइट्रोजन का प्रयोग करने से कई प्रकार के रोग जैसे-सफेद रतुआ, मृदु रोमिल असिता और तना गलन आदि लगने से पैदावार और तेल की गुणवत्ता में गिरावट आ जाती है। सफेद रतुआ एवं अल्टरनेरिया/काला धब्बा इसके लक्षण दिखाई देने पर 0.2 प्रतिशत डाइथेन एम-45, मैन्कोजेब या रिडोमिल का छिड़काव करना चाहिए। यदि आवश्यकता पड़े तो 10-15 दिनों के अंतराल पर एक और छिड़काव कर सकते हैं। चारा फसलों के साथ 10 प्रतिशत भाग पर सरसों के बीज, जो मिश्रित कर बोए गए थे, की कटाई आवश्यक रूप से करनी चाहिए अन्यथा सरसों की अधिक बढ़वार चारा फसलों की पैदावार को घटा देती है। अलसी अलसी की खड़ी फसल में लीफ ब्लाइट तथा रतुआ रोग के नियंत्रण के लिए 2 ग्राम इंडोफिल एम-45 या 3 ग्राम ब्लाइटाकॉस का 50 प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। स्त्रोत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अजय कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012