उगाई जाने वाली फसलें खरीफ के मौसम में हरी खाद के लिए प्रयुक्त होने वाली फसलें जैसे-ढैंचा, सनई, ग्वार, मूंग, उड़द व लोबिया आदि बहुत ही लाभकारी होती हैं। इन फसलों के बीजों को वर्षा से पहले सूखे खेत में भी छिड़ककर बुआई कर सकते हैं। इस प्रकार मानसून आने पर बीज अंकुरित हो जाता है। हरी खाद के लिए प्रति हैक्टर 50-60 कि.ग्रा. ढैंचा, 60-80 कि.ग्रा. सनई, 20-25 कि.ग्रा. ग्वार, 15-20 कि.ग्रा. मूंग व उड़द एवं 30-35 कि.ग्रा. लोबिया का बीज पर्याप्त होता है। ढैंचे की फसल से 45 दिनों में लगभग 20-25 टन हरा पदार्थ 85-105 कि.ग्रा. नाइट्रोजन; सनई की फसल से 40-50 दिनों में 20-30 टन हरा पदार्थ तथा 85-125 कि.ग्रा. नाइट्रोजन; ग्वार की फसल से 20-25 टन हरा पदार्थ तथा 68-85 कि.ग्रा. नाइट्रोजन; मूंग व उड़द की फसल से 10-12 टन हरा पदार्थ तथा 41-49 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं लोबिया की फसल से 15-18 टन हरा पदार्थ तथा 74-88 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर मृदा को प्राप्त होता है। उर्वरक की मात्रा हरी खाद बोने के समय सामान्य उर्वरता वाली मिट्टी में 10-15 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 40-50 कि.ग्रा. फॉस्पफोरस प्रति हैक्टर उर्वरक के रूप में मिलाने से ये फसलें पारिस्थितिकीय संतुलन बनाये रखने में अत्यंत सहायक होती हैं। इसके बाद जो दूसरी फसल लेनी हो उसमें नाइट्रोजन में भी 50 प्रतिशत तक की बचत की जा सकती है। जब फसल की वृद्धि अच्छी हो गई हो तब फूल आने के पूर्व इसे हल या डिस्क हैरो द्वारा खेत में पलट कर पाटा चला देना चाहिए। पौधों का अपघटन यदि खेत में 5-6 सें.मी. पानी भरा हो, तो पलटने व मिट्टी में दबाने में कम मेहनत लगती है। जुताई उसी दिशा में करनी चाहिए, जिसमें पौधों के अपघटन में सुविधा होती है यदि पौधों को दबाते समय खेत में पानी की कमी हो या देरी से जुताई की जाती है तो पौधों के अपघटन में अधिक समय लगता है। ढैंचा ढैंचे की उन्नत प्रजाति जैसे-पंत ढैंचा-1, हिसार ढैंचा-1, सी.एस.डी. 123 एवं सी.एस.डी. 137 और सनई की प्रजाति नरेन्द्र सनई-1, के-12, एम.-18, एम.-35, बी.ई.-1, बेलगांव, दिनोंदवाड़ा, टी.-6, एस.टी.-55 तथा एस.एस.-2 आदि प्रमुख हैं, जिनसे पर्याप्त जैवपदार्थ मिलता है। ध्यान देने वाली बात है कि ढैंचा की फसल को 40-45 दिनों के भीतर ही खेत में मिला देना चाहिए। हरी खाद की पलटी में देरी होने से तना सख्त हो जाता है और इसका विघटन नहीं हो पाता। इस कारण से कई बार खेत में दीमक का प्रकोप बढ़ जाता है। स्त्रोत : खेत पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा रोड, नई दिल्ली ।