सही प्रजाति का चुनाव धान की अच्छी पैदावार तथा उत्तम गुणवत्तायुक्त उत्पादन लेने के लिए अच्छी प्रजाति का चयन अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसलिए पानी के साधन, फसलचक्र व बाजार की मांग की स्थिति को ध्यान में रखकर उपयुक्त प्रजाति का चुनाव करें। बासमती धान की उन्नत प्रजातियां पूसा बासमती-1637, पूसा बासमती 1609, पूसा 1612, पूसा बासमती 1718, पूसा बासमती 1726, पूसा बासमती 1728, पूसा बासमती 1884, पूसा बासमती 1, उन्नत पूसा बासमती 1, पूसा बासमती 4 ;पूसा1121द्ध, पूसा बासमती 6, पूसा बासमती 1509, पंजाब बासमती-1, हरियाणा बासमती 1, तरावड़ी बासमती, सीएसआर-30 बासमती, मालवीय बासमती धान-2-1, मालवीय बासमती धान-1, पंजाब बासमती-2, बल्लभ बासमती-22, मालवीय बासमती धान 10-9, बल्लभ बासमती-21, बल्लभ बासमती-23 व सुंगधित धान की उन्नत प्रजातियां जैसे-पूसा सुगंध-2, पूसा सुंगध-3, पूसा सुगंध 5, पंत सुगंध 15, पंत सुगंध धान 17, माही सुगंध, मालवीय सुगंध 105, मालवीय सुगंध धान-4-3, सुगंध सम्बा मोटे धान की उन्नत प्रजातियां पूसा 44, पूसा 834, पूसा 677, सरजू 52, पीएनआर-381, नरेन्द्र धान 359, पीआर-111, पंत धान 12, पंत धान 16, एचकेआर-46, पीएनआर-519, पीआर-118, पीएनआर-546, मालवीय धान-3022, मालवीय धान-5-1, नवीन, नरेन्द्र धान 8002, जल्दी धान-13, पीआर-122, पंत धान 19, शुष्क सम्राट, सहभागी धान, स्वर्णा सब-1, मोती गोल्ड, मालवीय धान-46005 ऊसर धान की उन्नत प्रजातियां सीएसआर-10, नरेन्द्र ऊसर धान 2, सीएसआर-13, सीएसआर-27, नरेन्द्र ऊसर धान 3, सीएसआर-23, सीएसआर-36, नरेन्द्र ऊसर धान 2008 छोटे पतले धान की उन्नत प्रजातियां एमटीयू 7029, बीपीटी 5204, एमटीयू 1075, उन्नत सम्भा मंसूरी, नरेन्द्र लालमती, राजेन्द्र श्वेता व राजेन्द्र भागवती व धान की संकर किस्में जैसे-पीआरएच-10, कर्नाटक संकर धान 2, पी.ए. 6444, पी.ए. 6201, पी-एचबी. 71, आर.एच. 204, एच.आर. आई. 120, पंत संकर धान 1, नरेन्द्र संकर धान 2, नरेन्द्र ऊसर संकर धान 3, पीएसी. 835, पी.एसी. 837 एवं धान की कालानमक किस्में बौना कालानमक, कालानमक-101, कालानमक-102 व के.एन.-3 खाद एवं उर्वरक की मात्रा मृदा परीक्षण के बाद पोषक तत्वों की मात्राा निर्धारित करते हैं। धान की बौनी प्रजातियों के लिए 100-120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश एवं 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट/ हैक्टर की आवश्यकता होती है। बासमती की लंबी किस्मों में 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन पर्याप्त होती है। एसएसपी, एमओपी एवं जिंक की पूरी मात्रा आखिरी जुताई के समय देनी चाहिए। पौधा अच्छी तरह मृदा को पकड़ ले तो यूरिया की पहली तिहाई मात्रा रोपाई के पांच दिनों बाद समान रूप से छिड़क दें। दूसरी एक तिहाई मात्रा कल्ले फूटते समय रोपाई के 25-30 दिनों बाद तथा शेष एक तिहाई मात्रा को फूल आने से पहले 50-60 दिनों बाद खड़ी फसल में छिड़काव करें। यूरिया डालने के 24 घण्टे बाद ही पानी दें। यदि हरी खाद या गोबर की खाद का प्रयोग किया गया हो तो नाइट्रोजन की मात्रा 20-25 कि.ग्रा./ हैक्टर की दर से कम कर देनी चाहिए। अगर एसएसपी की जगह पर डीएपी का प्रयोग कर रहे हैं तो यूरिया की मात्रा 50 कि.ग्रा./हैक्टर कम कर दें। नील हरित शैवाल का प्रयोग नील हरित शैवाल की अधिकतर प्रजातियां नाइट्रोजन का मृदा में एकत्राीकरण करती हैं। नील हरित शैवाल के प्रयोग से करीब प्रतिवर्ष/ हैक्टर 20-30 कि.ग्रा. नाइट्रोजन मृदा में स्थापित होती है जिसका प्रयोग धान की फसल के द्वारा होता है। 10-15 कि.ग्रा. टीका रोपाई के एक सप्ताह बाद खड़े पानी में/हैक्टर की दर से बिखेर दें। शैवाल प्रयोग कम से कम तीन साल तक लगातार करें। शैवाल प्रयोग में इस बात का ध्यान रखें कि खेत में पानी सूखने न पाये। धान की फसल में इसके साथ 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन/हैक्टर देने पर अच्छी उपज प्राप्त होती है। निराई, गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण लेहयुक्त धान की फसल में खरपतवारों की विशेष समस्या नहीं होती है। खरपतवार निकलने पर उन्हें उखाड़कर खेत में गहरे गड्ढे में दबा देते हैं। धान में 47 से 86 प्रतिशत तक का नुकसान खरपतवार के द्वारा होता है। आजकल बहुत से खरपतवारनाशी रसायन बाजार में उपलब्ध हैं, जिनका समय पर सही मात्रा में उपयोग कर खरपतवारों से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। खरपतवार प्रबंधन कोनोवीडर द्वारा खरपतवार प्रबंधन करने से खरपतवार, खेत में ही पलटकर मिट्टी में दबाने से सड़कर जैविक खाद का काम करते हैं। इस प्रकार पौधों को पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। कोनोवीडर का प्रयोग करने से मृदा में वायु संचार बढ़ जाता है। वायु संचार में वृद्धि फलस्वरूप भूमि में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवाणुओं की गतिविधियां बढ़ जाती हैं। जैविक पदार्थों को शीघ्र सड़ाकर पौधों को पोषक तत्व के रूप में उपलब्ध करवाती हैं। स्थानीय विधि के अंतर्गत जड़ में वायु संचार बढ़ने से जड़ों का विकास एवं फैलाव अधिक होता है। पौधरोपण के 10 दिनों बाद से 10 दिनों के अंतराल पर 3 से 4 बार कोनोवीडर चलाकर खरपतवारों का प्रबंध करना आवश्यक होता है। साथ ही साथ कोनोवीडर के चलाने के लिए खेत में पर्याप्त मात्रा में नमी होनी चाहिए। धान उत्पादन की श्री विधि नर्सरी तैयार करने में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। श्री विधि के अंतर्गत 8-12 दिनों पुरानी पौध को 25 ×25 सें.मी. की दूरी पर 2-3 सें.मी. की गहराई पर अंगूठे एवं अनामिका अंगुली की सहायता से दबा दें। पौधशाला नर्सरी से पौध निकालने के बाद 30 मिनट के अंदर रोपाई का प्रयास करना चाहिए। शीघ्र लगाने से जड़ों का विकास अच्छा होता है, जो स्वस्थ पौधों के विकास में सहायक होता है। ज्वार, बाजरा मक्का और अन्य मोटे अनाजों की बुआई एवं देखभाल ज्वार की खेती शुष्क जलवायु अर्थात कम वर्षा वाले क्षेत्राों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसके लिए तापमान 250-350 सेल्सियस उपयुक्त होता है। इसके लिए 40-60 सें.मी. वार्षिक वर्षा भी उपयुक्त रहती है। ज्वार के लिए हल्की दोमट, बलुई दोमट और भारी दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। इसके साथ में जल निकास अच्छा होना चाहिए। धान की सीधी बुआई वर्षा विलम्ब से शुरू होने की दशा में पैडीड्रम द्वारा धन की सीधी बुआई सिंचित और वर्षा जल की कमी को देखते हुए एरोबिक धान की सम्भावनाएं देश के विभिन्न धान उगाने वाले क्षेत्राों में बढ़ती जा रही हैं। उपयुक्त किस्म का चुनाव व उन्नत सस्य क्रियाएं अपनाकर धान की सीधी बुआई से कठिन परिस्थितियों में भी अधिक उत्पादकता एवं लाभ कमाया जा सकता है। इस विधि में अधिक उपज देने वाली किस्मों को लेवरहित या अनपडल्ड दशा में देसी हल या सीड ड्रिल या पैडीड्रम सीडर से सीधे खेत में बुआई करते हैं। इस विधि से धान की बुआई का उपयुक्त समय जून ही है। इस विधि में 25-30 कि.ग्रा. बीज/हैक्टर को 25×10 सें.मी. की दूरी पर, खेत में पलेवा कर सीधी बुआई करते हैं। एरोबिक धान के लिए 120 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस और 40 कि.ग्रा. पोटाश के साथ 25-30 कि.ग्रा./हैक्टर जिंक सल्फेट की संस्तुति की जाती है। धान की फसल में रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण सारणी 1. धान की फसल में रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण रसायन वास्तविक मात्रा कि.ग्रा., ली./है पानी की मात्रा ली./है छिड़काव करने का उपयुक्त समय बिस्पाइरिबैक सोडियम10 एस.सी. (नोमिनी गोल्ड) 250 मि.ली. 600-700 20 से 30 दिनों पर पाईराजोसल्फ्रयूरॉन ईथाइल 10 डब्ल्यू.पी 25 ग्राम 600-700 10 से 20 दिनों पर पेन्डिमेथलीन 30 ई.सी. 3.0-4.0 600-800 रोपाई/बुआई के एक से दो दिनों के अंदर अनिलोफॉस 30 ई.सी. 1.25-1.50 500-600 फसल रोपने के तीन से चार दिनों बाद करें। बासमती धान में इस दवा का प्रयोग न करें थायो बेनकार्ब 50 ई.सी. 2.0-3.0 500-600 फसल रोपने के तीन से चार दिनों बाद करें प्रोटिलाक्लोर 50 ई.सी. 1.0-1.50 600-700 रोपाई/बुआई के एक से दो दिनों के अंदर ब्यूटाक्लोर 5 जी. 25.0-40.0 500-600 रोपाई/बुआई के एक से दो दिनों के अंदर ब्यूटाक्लोर 50 ई.सी. 2.5-4.0 600-800 फसलें रोपने के दो से तीन दिनों के बाद ईथोक्सीसल्फ्यूरॉन15 डब्ल्यू डी.जी30 30 ग्राम 600-700 20-25 दिनों के बाद एजिमसल्फ्यूरॉन 50 डी.एफ. 70 70 600-700 50-60 दिनों के बाद साइहेलोफोप ब्यूटाईल 10 ई.सी75-80 75-80 600-700 10-20 दिनों के बाद स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), पूसा रोड, नई दिल्ली।