<h3 style="text-align: justify;">बीज उपचार की सलाह</h3> <p style="text-align: justify;">मृदा एवं बीजजनित कई कवक एवं जीवाणुजनित रोग होते हैं, जो अंकुरण होते समय तथा अंकुरण होने के बाद बीजों को काफी क्षति पहुंचाते हैं। बीजों के अच्छे अंकुरण तथा स्वस्थ पौधों की पर्याप्त संख्या के लिए कवकनाशी से बीज उपचार करने की सलाह दी जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">दलहनी फसलों में उपयोग</h3> <p style="text-align: justify;">इसके लिए प्रति कि.ग्रा. बीज को 2 से 2.5 ग्राम थीरम तथा 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम से उपचार करने के बाद राइजोबियम कल्चर से बीजोपचार करना चाहिए। दलहनी फसलों में उपयोग की दृष्टि से जैव उर्वरकों में राइजोबियम जीवाणु, फॉस्फोरस को घुलनशील बनाने वाले सूक्ष्मजीव, पी.जी.पी.आर. एवं वर्मीकम्पोस्ट का अधिक महत्व है।</p> <h3 style="text-align: justify;">राइजोबियम कल्चर</h3> <p style="text-align: justify;">राइजोबियम कल्चर द्वारा जड़ों में गांठ बनाने की क्रिया केवल दलहनी फसलों में होती है, जो लेग्यूमिनोसी पैफमिली के अंतर्गत आती है। विभिन्न फसलों में गांठ बनाने वाले जीवाणु भिन्न-भिन्न होते हैं। विभिन्न दलहनी फसलों में गांठ बनाने वाले जीवाणुओं को क्रास-इनाकुलेंशन ग्रुुप कहते हैं। जब जीवाणु अपने उपयुक्त पौधे की जड़ों के सम्पर्क में आता है तो जड़ों द्वारा उत्सर्जित विशिष्ट पदार्थ से आकर्षित होकर यह जड़ों में गांठ बनाने की क्रिया प्रारंभ करता है। पौधे की जड़ों में गांठों का बनना एक बहुत ही जटिल क्रिया है। जब जीवाणु पौधे के अंदर प्रविष्ट कर जाता है तब उसका व्यवहार एवं क्रिया पौधे के द्वारा संचालित होने लगती है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="221" height="168" /></p> <p style="text-align: justify;">उपचार के लिए 500 मि.ली. स्वच्छ जल में 100 ग्राम गुड़ एवं 2 ग्राम गोंद में मिलाकर गर्म कर लेना चाहिए। इसके बाद इसे ठंडा करके एक पैकेट राइजोबियम कल्चर/टीका (10 कि.ग्रा. बीज) मिलाकर अच्छी तरह बीजों को उपचारित कर लेना चाहिए व बीजों को छाया में ही सुखाना चाहिए। बुआई के समय बीज डालने से पहले सल्फर धूल का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। इसी प्रकार फॉस्फट घुलनशील बैक्टीरिया (पीएसबी) से बीज का शोधन करना भी लाभदायक होता है। फॉस्फेट विलेयी सूक्ष्मजीव विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं का समूह है जो स्थिर/अघुलनशील अकार्बनिक पफॉस्पेफट जैसे-ट्राइकैल्शियम, फेरिक, एल्युमिनियम, रॉक फॉस्फेट एव हड्‌डी के चूर्ण को घुलनशील एवं उपलब्ध अवस्था में बदलते हैं। इस घुलनशील फॉस्फोरस का कुछ भाग स्वयं प्रयोग कर लेते हैं तथा शेष मात्रा को पौधों द्वारा उपयोग में ले लिया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत: राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012</p>