आलू की फसल आलू की फसल में जनवरी के प्रथम सप्ताह तक पौधों के ऊपरी भाग को काट दें। उसके बाद आलू को 20-25 दिनों तक जमीन के अन्दर ही पड़े रहने दें। ऐसा करने से आलू का छिलका कड़ा हो जायेगा और खराब नहीं होगा। 20 से 25 दिनों बाद खुदाई करके साफ-सुथरे कन्दों का चयन करें। पत्तियों की कटाई आलू बीजोत्पादन वाली फसल में पत्तियों की कटाई का कार्य 15 जनवरी से पहले अवश्य कर दें। कटे हुए पत्तों को खेत से बाहर गड्ढे में दबा दें। टमाटर पहले रोपी गई टमाटर की फसल में आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई, सिंचाई व पौधों को सहारा देने का कार्य करें। नवंबर में रोपी गई टमाटर की उन्नत .किस्मों में प्रति हैक्टर 88 कि.ग्रा. यूरिया व संकर किस्मों के लिए 130 किग्रा. यूरिया की प्रथम टॉप ड्रेसिग के 20-25 दिनों बाद दूसरी टॉप ड्रेसिंग करें। टमाटर की नवंबर में लगाई गई नर्सरी जनवरी में रोपी जा सकती है, परंतु पाले से बचाव करते रहें। प्रत्येक 10 दिनों बाद हल्की सिंचाई देते रहें। टमाटर के खेत में खरपतवार बिल्कुल नहीं होने चाहिए। इन्हें समय-समय पर निकालते रहें। पुरानी फसल में यदि फलछेदक का संक्रमण हो जाए, तो खराब फलों को तुरंत तोड़कर नष्ट कर दें। अधिक संक्रमण की स्थिति में 0.1 प्रतिशत मैलाथियान या 0.1 प्रतिशत थायोडॉन 15 दिनों के अन्तराल पर छिड़कें या छिड़काव से पहले तैयार फल तोड़ लें। अगली तुड़ाई 17 दिनों बाद करें। रोपाई इस माह के अंत में ग्रीष्मकालीन टमाटर की फसल की रोपाई करें। टमाटर की रोपाई के समय उन्नत प्रजातियों के लिए प्रति हैक्टर 40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 60 कि.ग्रा. पोटाश, 20-25 कि.ग्रा. जिंक एवं 10-12 कि.ग्रा. बोरेक्स व संकर किस्मों में उर्वरक की अन्य मात्रा के साथ नाइट्रोजन की 60 कि.ग्रा. मात्रा का प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करना चाहिए। टमाटर की रोपाई 60X45 या 60X60 सें.मी. की दूरी पर करें। खरपतवार नियंत्रण टमाटर में खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रति हैक्टर 1.0 कि.ग्रा. स्टाम्प का रोपाई के दो दिनों बाद प्रयोग करें। सब्जियों में आवश्यकतानुसार सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई करते रहें। झुलसा तथा माहूं से बचाव आलू, टमाटर तथा मिर्च में पछेती झुलसा तथा माहूं से बचाव के लिए मैंकोजेब 0.2 प्रतिशत (2 ग्राम/लीटर पानी) के साथ मोनोक्रोटोफॉस 0.04 प्रतिशत (4 मि.ली. 10 लीटर पानी में) के घोल का छिड़काव करें। सब्जी मटर सब्जी मटर में फूल आते समय हल्की नमी होनी चाहिए। अन्यथा आवश्यकता होने पर हल्की सिंचाई करें। आवश्यकतानुसार दूसरी सिंचाई फलियां बनते समय करनी चाहिए। सेम (फ्रेंचबीन) सेम (फ्रेंचबीन) सभी प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है। मैदानी क्षेत्रों में 20 से 30 जनवरी तक बोया जा सकती है।झाड़ीनुमा किस्मों कोनटेनडर व पूसा सरस्वती के 37 कि.ग्रा. बीज को 2 फीट पंक्तियों में तथा 8 इंच पौधों में दूरी पर लगाएं। लम्बी ऊंची किस्में कैन्टुकी व हेमलता के 17 कि.ग्रा. बीज को 3 फीट पंक्तियों में तथा 1 फीट पौधे में दूरी पर लगाएं। बेले चढ़ने के लिए लकड़ी या लोहे के खंबे लगाएं। बिजाई से पहले खेत में 100 क्विटल गोबर की सड़ी खाद, 4 बोरे सिंगल सुपर फॉस्फेट, 1 बोरा म्यूरेट ऑफ पोटाश तथा 1 बोरा यूरिया डालें।पहली सिंचाई, बिजाई के 17 दिनों बाद करें। प्याज जिस खेत में प्याज की रोपाई करना चाहते हों, उसकी 2-3 बार जुताई करके पाटा चलाकर समतल कर लें। यदि मृदा की जांच उपलब्ध न हों, तो रोपाई से 15-20 दिनों पहले 20-25 टन गोबर की सड़ी हुई खाद डालें व रोपाई के समय 50 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस एवं 80-100 कि.ग्रा. पोटाश मृदा में मिलाएं। तैयार खेत में पंक्ति से पंक्ति एवं पौधे से पौधे के बीच की दूरी 15X10 सें.मी. रखते हुये 2 सें.मी. की गहराई पर रोपाई कर दें। रोपाई के समय खेत में नमी बनाये रखें एवं 3-4 बार हल्की सिंचाई करें। प्याज की रोपाई का काम भी किसान इस माह के प्रथम सप्ताह तक पूरा कर लें। लहसुन लहसुन की फसल में आवश्यकतानुसार समय पर सिंचाई तथा गुड़ाई करते रहें। लहसुन में नाइट्रोजन की दूसरी टॉप ड्रेसिंग बुआई के 50-60 दिनों बाद 74 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हैक्टर की दर से करें। मूली पूसा हिमानी मूली किस्म दिसंबर से फरवरी तक लगा सकते हैं। यह 40 से 70 दिनों में तैयार हो जाती है तथा हल्का तीखा स्वाद देती है।जापानी व्हाइट मूली खेत में है, तो सिंचाई तथा गुड़ाई समय-समय पर करें तथा खरपतवार निकाल दें। मूली व गाजर को तैयार होने पर उखाड़ने से 2-3 दिनों पहले हल्की सिंचाई करें। इन फसलों को उखाड़ने में देर न करें। देर से इनकी गुणवत्ता खराब हो जाती है तथा मूल्य भी कम मिलता है। गाजर गाजर की पूसा रुधिरा और पूसा आसिता किस्मों की सही समय पर बुआई करने पर इस माह में उपलब्ध होने लगती हैं। शिमला मिर्च इस माह में बोई गई शिमला मिर्च मई में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर,सस्य विज्ञान, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012; और अमन सिंह,आनुवंशिकी विभाग, आचार्य नरेंद्र देव कृषि और प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या-224229 (यूपी)।